sn vyas
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#पौराणिक कथा #🌺🌺श्रीनाथ जी ✨यमुना महारानी 🌺🌺 #🙏🌺जय यमुना मैया मथुरा🌺🙏 पद्म पुराण के सृष्टि खंड से इंद्रप्रस्थ और देवी यमुना के प्रादुर्भाव की पूरी कथा: १. देवी यमुना का प्रादुर्भाव भगवान सूर्यदेव का विवाह देवशिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ था। सूर्यदेव का तेज इतना प्रचंड और असह्य था कि देवी संज्ञा उनके रूप और ताप को सहन नहीं कर पाती थीं। सूर्यदेव के इस असह्य ताप से मुक्ति पाने के लिए देवी संज्ञा ने अपने तपोबल से अपनी ही एक छाया उत्पन्न की, जिसका नाम 'छाया' रखा। संज्ञा ने छाया को सूर्यदेव की सेवा का भार सौंपा और स्वयं तपस्या करने के लिए वन में चली गईं। सूर्यदेव और छाया के संयोग से दो दिव्य संतानों का जन्म हुआ: यमराज (धर्मराज): जो जीवों को उनके कर्मों का फल देने वाले देवता बने। देवी यमुना: जो श्यामल वर्ण की परम पवित्र जलधारा के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुईं। २. यम-द्वितीया का अलौकिक वरदान यमराज अपनी बहन यमुना से बहुत प्रेम करते थे। जब यमुना जी पृथ्वी पर प्रवाहित होने लगीं, तो यमराज ने उन्हें एक अद्भुत वरदान दिया: "हे कल्याणी! जो भी मनुष्य कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (भाई दूज) के दिन तुम्हारे जल में स्नान करेगा, उसे कभी यमलोक का मुँह नहीं देखना पड़ेगा और न ही अकाल मृत्यु का भय सताएगा।" पद्म पुराण में वर्णन है कि गंगा जी में स्नान से मुक्ति मिलती है, किंतु यमुना जी के जल का केवल स्मरण, दर्शन या स्पर्श करने मात्र से ही यमदूत प्राणी के पास भटकते भी नहीं हैं। ३. इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) तीर्थ का प्रादुर्भाव यमुना जी के तट पर स्थित इंद्रप्रस्थ क्षेत्र को पद्म पुराण में एक अति-पावन महातीर्थ बताया गया है। इसकी कथा इस प्रकार है: एक समय देवराज इंद्र से अज्ञानवश एक बड़ा अपराध हो गया, जिसके कारण उनका दिव्य तेज क्षीण होने लगा और उनके इंद्र-पद पर संकट आ गया। अपने इस पाप के निवारण के लिए देवगुरु बृहस्पति की आज्ञा से इंद्रदेव पृथ्वी पर आए। इंद्रदेव ने यमुना जी के उत्तर तट पर एक सुंदर वन में जाकर कठिन तपस्या की। वे प्रतिदिन यमुना जी के पवित्र जल में स्नान करते और भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करते। इंद्र की इस निष्काम भक्ति और यमुना जी के पावन जल के प्रभाव से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने इंद्रदेव को पापमुक्त कर दिया और उनका खोया हुआ देवलोक व ऐश्वर्य वापस लौटा दिया। चूँकि देवराज इंद्र ने इसी स्थान पर तपस्या करके अपना इंद्र-पद पुनः प्राप्त किया था, इसलिए यमुना तट के इस पावन क्षेत्र को 'इंद्रप्रस्थ' नाम से जाना गया (जो आज की दिल्ली का क्षेत्र है)। कथा का सार पद्म पुराण का यह प्रसंग बताता है कि यमुना जी साक्षात सूर्य की पुत्री और भगवान विष्णु की परम प्रिय हैं। उनके तट पर स्थित इंद्रप्रस्थ में स्नान, जप और दान करने से बड़े से बड़े पाप भी भस्म हो जाते हैं।
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