sn vyas
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#पौराणिक कथा प्राचीन काल में देवर्षि नारद विचरण करते हुए विंध्याचल पर्वत के पास पहुँचे। नारद जी ने विंध्याचल की विशालता की प्रशंसा तो की, परंतु बातों-बातों में कह दिया हे विंध्याचल! तुम विशाल तो हो, परंतु सुमेरु पर्वत की बराबरी नहीं कर सकते। साक्षात भगवान सूर्य और चंद्र नित्य सुमेरु की परिक्रमा करते हैं, जिससे उसका मान तुमसे कहीं अधिक है नारद जी की यह बात विंध्याचल के अहंकार को चुभ गई। ईर्ष्या की ज्वाला में जलते हुए विंध्याचल ने आकाश की ओर बढ़ना प्रारंभ किया। विंध्याचल पर्वत प्रतिदिन बढ़ता गया। वह इतना ऊँचा उठ गया कि उसने सूर्य, चंद्रमा और समस्त नक्षत्रों का मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया आकाश में सूर्य का रथ रुक गया संसार का आधा भाग निरंतर अंधकार और बर्फीली ठंड में डूब गया, जबकि दूसरा भाग सूर्य की भीषण तपन से जलने लगा ऋतु-चक्र नष्ट हो गया, यज्ञ-हवन बंद हो गए और पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच गई समस्त देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि घबराकर देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुँचे। भगवान शिव ने देवताओं से कहा: विंध्याचल के इस बढ़ते हुए अहंकार को कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं रोक सकता। विंध्याचल केवल अपने गुरु महर्षि अगस्त्य का मान करता है। इस समय केवल अगस्त्य मुनि ही इस प्रलय से जगत की रक्षा कर सकते हैं देवताओं की प्रार्थना पर महर्षि अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ उत्तर भारत (काशी) को छोड़कर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हो गए। जैसे ही महर्षि अगस्त्य विंध्याचल पर्वत की तलहटी में पहुँचे, उनका प्रचंड तपो-तेज देखकर विंध्याचल पर्वत थर-थर कांप उठा अपने गुरुदेव को सामने खड़े देखकर विंध्याचल का सारा अहंकार क्षण भर में मिट गया। उसने तुरंत अपना शीश झुकाया और अगस्त्य मुनि के चरणों में पूरी तरह साष्टांग लेट गया। अगस्त्य मुनि जानते थे कि जैसे ही वे यहाँ से आगे बढ़ेंगे, विंध्याचल पुनः आकाश को छूने के लिए खड़ा हो जाएगा मुनि ने मुस्कुराते हुए अपने कमंडलु से जल का आचमन किया और अत्यंत शांत किंतु दृढ़ वाणी में कहा: "हे विंध्य! मैं धर्म-कार्य के निमित्त अपनी पत्नी सहित दक्षिण दिशा की यात्रा पर जा रहा हूँ। जब तक मैं दक्षिण से उत्तर की ओर वापस लौटकर न आऊँ, तब तक तुम इसी प्रकार मेरे चरणों में झुके रहोगे और तनिक भी ऊपर नहीं उठोगे विंध्याचल ने हाथ जोड़कर वचन दिया—"जैसी आपकी आज्ञा, गुरुदेव! महर्षि अगस्त्य विंध्याचल को पार करके दक्षिण भारत में प्रविष्ट हुए। दक्षिण में जाकर उन्होंने धर्म, संस्कृति और वेद-ज्ञान की स्थापना की। इसके बाद महर्षि अगस्त्य कभी भी उत्तर की ओर वापस नहीं लौटे; वे सदा के लिए दक्षिण भारत (अगस्त्यकूट पर्वत) में ही बस गए अपने गुरु को दिए वचन के कारण विंध्याचल पर्वत आज भी उसी प्रकार झुका हुआ स्थित है। सूर्य और चंद्रमा का मार्ग पुनः खुल गया और संपूर्ण सृष्टि अंधकार से मुक्त होकर प्रकाशमान हो गई। !! जय श्री कृष्णा!!
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