sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_४२/१ कर्म - भक्ति - ज्ञान योग समन्वय :* उपरोक्त दृष्टि में गीता एक योग शास्त्र है । इसमें योग के तीन प्रकार बताए गए हैं :* (1) कर्मयोग (2) भक्तियोग (3) ज्ञान योग । *जीवन में केवल ज्ञानयोग, केवल भक्तियोग या केवल कर्मयोग काम नहीं आता है। इन तीनों योगो का समन्वय होने पर ही जीवन सुंदर बनता है और तब ही प्रत्येक कर्म प्रकाशमान होता है।* *केवल ज्ञानयोग व्यक्ति को शुष्क वेदांती बना सकता है। "अहम् ब्रह्मास्मि सर्वं खलु इदं ब्रह्म " ऐसा कहने वाले को पागलों के अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा ।* *केवल भक्तियोग व्यक्ति को बुजदिल बना सकता है, वह जिम्मेदारियों से मुक्त होने की आकांक्षा में भटक सकता है और कितनों को ही भटका भी सकता है ।* *केवल कर्मयोगी भी जिम्मेदारियों और पाप की गठरी उठाये घूमेगा ।* *इसलिए प्रत्येक कर्म में कर्म योग , भक्तियोग , ज्ञानयोग का विवेकपूर्ण समन्वय होगा तो ही वह कर्म विशेष बनेगा।* *उदाहरण के लिए एक स्त्री घर में दाल आदि भोजन बनाती है । दाल बनाने की क्रिया करना उसका कर्मयोग हुआ ।* *किंतु यह दाल मेरा पति खाएगा , मेरा पुत्र खाएंगे , मेरे अतिथि खाएंगे , इस भक्ति भाव से दाल को अच्छी तरह से दो- तीन बार धोकर , बर्तन को अच्छी तरह से साफ करके उपयोग करेगी , पानी भी स्वच्छ कपड़े से छानकर उपयोग करेगी , तो उसका भक्ति योग होगा ।* *और दाल के प्रमाण में कितना नमक डालना है, कितनी मिर्ची डालनी है , कितनी इमली , गुड आदि मसाला डालना है , दाल कितने देर तक उबालना है ।इसका ध्यान रखना उसका ज्ञानयोग होगा ।* *इस प्रकार कर्मयोग , भक्ति योग तथा ज्ञानयोग में तीनों का समन्वय होगा तो ही दाल बनने की क्रिया में सफलता मिलेगी, अन्यथा नहीं । वैसे तो होटलों में भी स्वादिष्ट दाल बनते हैं। लेकिन उनमें केवल कर्मयोग और ज्ञानयोग ही होता है । भक्तियोग नहीं होता , इसलिए उसमें मक्खियां भी उबाल देते हैं।* क्रमश: कल इसका दुसरा भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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