sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३९/१ मुझे कर्म भी नहीं करना है, और फल भी नहीं भोगना है: यह तो केवल उल्टी चाल और बदमाशी ही कहलाती है। इसलिए भगवान ने चौथी आज्ञा दी है कि---- *मा ते संगोऽस्तु अकर्मणि।* *तू कर्म से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म का जड़ मूल से त्याग नहीं हो सकता । छोटा बच्चा कहे कि मैं स्कूल नहीं जाऊंगा । मुझे पढ़ना भी नहीं है और खाना भी नहीं है। तो माता-पिता घबरा जाएंगे ।* *कोई कहे कि मुझे नौकरी भी नहीं करनी है और वेतन भी नहीं लेना है । मुझे व्यापार भी नहीं करना है और लाभ भी नहीं लेना है। तो ऐसी बेकार की बातें नहीं चलती है।* *बढ़ई कहें कि मैं बढ़ई का काम नहीं करूंगा और मुझे मेहनताना भी नहीं चाहिए। राज , मिस्त्री ,चमार , मजदूर दर्जी , सब ऐसा ही कहें कि हमे काम नहीं करना है और मेहनताना भी नहीं चाहिए । तो पूरा समाज मुश्किल में पड़ जाएगा और अराजकता, अंधाधुंध फैल जाएगी तथा प्रमाद , आलस्य , तमोगुण का ही प्रभाव बढ़ेगा।* *इसलिए भगवान ने गीता में कहा है कि ---* *नियतं कुरु कर्म त्वं, कर्म ज्यायो हि अकर्मण:।* *शरीर यात्राऽपि च ते, न प्रसिद्धयेत् अकर्मण:॥* *तुझे तेरा नियत कर्म करना ही पड़ेगा और ऐसा नहीं करेगा तो तेरी शरीर यात्रा रुक जाएगी। कर्म का जड़ मूल से त्याग करना तो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए खतरनाक होगा।* *भगवान कहते हैं कि-- इस संसार में और तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है। मुझे कोई वस्तु न प्राप्त करनी है और न छोड़नी है । राग और त्याग दोनों से मैं सदा के लिए मुक्त हू। मुझे इन तीनों लोकों में मिलने वाले समस्त आनंद और सुख सदैव प्राप्त हैं । मैं सदा तृप्त और आत्मकाम हू । कृतकृत्य हू। ऐसा होने पर भी मैं सदैव कर्म करता हूं।* क्रमश: ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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