sn vyas
674 views • 8 days ago
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
विदुर के भेजे हुए खनक द्वारा लाक्षागृह में सुरंग का निर्माण...(दिन 432)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य सुहृत् कश्चित् खनकः कुशलो नरः । विविक्ते पाण्डवान् राजन्निदं वचनमब्रवीत् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! एक सुरंग खोदनेवाला मनुष्य विदुरजीका हितैषी एवं विश्वास-पात्र था। वह अपने काममें बड़ा चतुर था। एक दिन वह एकान्तमें पाण्डवोंसे मिला और इस प्रकार कहने लगा ।। १ ।।
प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम् । पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ।। २ ।।
प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तः श्रेयस्त्वमिति पाण्डवान् । प्रतिपादय विश्वासादिति किं करवाणि वः ।। ३ ।।
'मुझे विदुरजी ने भेजा है। मैं सुरंग खोदनेके काममें बड़ा निपुण हूँ। मुझे आप पाण्डवोंका प्रिय कार्य करना है, अतः आपलोग बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? विदुरने गुप्तरूपसे मुझसे यह कहा है कि तुम वारणावतमें जाकर विश्वासपूर्वक पाण्डवोंका हित सम्पादन करो। अतः आप आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ? ।। २-३ ।।
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः ।
भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम् ।। ४ ।।
'इसी कृष्णपक्षकी चतुर्दशीकी रातको पुरोचन आपके घरके दरवाजेपर आग लगा देगा ।। ४ ।।
मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ।
इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ।। ५ ।।
'दुर्बुद्धि दुर्योधनकी यह चेष्टा है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ जला दिये जायें ।। ५ ।।
किंचिच्च विदुरेणोक्तो म्लेच्छवाचासि पाण्डव ।
त्वया च तत् तथेत्युक्तमेतद् विश्वासकारणम् ।। ६ ।।
'पाण्डुनन्दन ! विदुरजी ने म्लेच्छभाषा में आपको कुछ संकेत किया था और आपने 'तथास्तु' कहकर उसे स्वीकार किया था। यह बात मैं विश्वास दिलानेके लिये कहता हूँ' ।। ६ ।।
उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ।। ७ ।।
शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम् ।
न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ।। ८ ।।
तब सत्यवादी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने उससे कहा- 'सौम्य ! मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुम विदुरजीके हितैषी, ईमानदार, विश्वसनीय, प्रिय तथा उनके प्रति सदा अविचल भक्ति रखनेवाले हो। हमारा कोई भी ऐसा प्रयोजन नहीं है, जो परम ज्ञानी विदुरजीको ज्ञात न हो ।। ७-८ ।।
यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि । भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान् यथा कविः ।। ९ ।।
'तुम विदुरजीके लिये जैसे आदरणीय और विश्वसनीय हो, वैसे ही हमारे लिये भी हो। तुमसे हमारा कोई अन्तर नहीं है। हमलोग जिस प्रकार विदुरजीके पालनीय हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं। जैसे वे हमारी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी करो ।। ९ ।।
इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः । पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ।। १० ।।
'यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है। हमारा विश्वास है कि दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनने हमारे लिये ही इसे बनवाया है ।। १० ।।
स पापः कोषवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः ।
अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते ।। ११ ।।
'पापी दुर्योधनके पास खजाना है और उसके बहुत-से सहायक भी हैं; इसीलिये वह दुर्बुद्धि पापात्मा सदा हमें सताया करता है ।। ११ ।।
स भवान् मोक्षयत्वस्मान् यत्नेनास्माद् हुताशनात् ।
अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात् सुयोधनः ।। १२ ।।
'तुम यत्न करके हमलोगोंको इस आगसे बचा लो; अन्यथा हमलोगोंके यहाँ दग्ध हो जानेपर दुर्योधनका मनोरथ सफल हो जायगा ।। १२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
14 likes
14 shares