।। ॐ ।।
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।।
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जो संसार के संयोग और वियोग से रहित है, उसी का नाम योग है। जो आत्यन्तिक सुख है, उसके मिलन का नाम योग है। जिसे परमतत्त्व परमात्मा कहते हैं, उसके मिलन का नाम योग है। वह योग न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्त्तव्य है। धैर्यपूर्वक लगा रहनेवाला ही योग में सफल होता है।