प्रदीप मिश्रा द्वारा शिव महापुराण कथा

sn vyas
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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱बम बम भोले🙏 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी शिव पुराण की रुद्र संहिता (युद्ध खंड) में भगवान शिव के परम कृपालु और भक्त-वत्सल रूप का अलौकिक वर्णन मिलता है। यह कथा काशी (वाराणसी) के प्रसिद्ध 'कृत्तिवासेजेश्वर शिवलिंग' की स्थापना और उत्पत्ति से जुड़ी है। 1. महिषासुर के पुत्र गजासुर का कठिन तप जब भगवान विष्णु (दुर्गा रूप) ने महिषासुर का वध कर दिया, तो उसका पुत्र गजासुर (जिसे गजेंद्र या गजेश्वर भी कहा जाता है) अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने देवताओं से प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। गजासुर ने काशी क्षेत्र के समीप जाकर भगवान शिव की हज़ारों वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। उसने अपने शरीर को अग्नि में तपाया और जल तथा वायु त्याग कर ध्यान लगाया। उसकी भीषण तपस्या से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। गजासुर ने अपनी बुद्धि के छल से ऐसा वरदान माँगा: "हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे वरदान दीजिए कि मैं किसी भी देव, दानव, अस्त्र, शस्त्र, या मनुष्य द्वारा न मारा जाऊँ। और जब तक मेरा शरीर कामदेव की अग्नि (कामानल) से रहित रहे, तब तक कोई भी मुझे पराजित न कर सके।" भोलेनाथ ने 'तथास्तु' कह दिया। 2. गजासुर का अत्याचार और साधुओं की प्रताड़ना वरदान पाते ही गजासुर घमंड में अंधा हो गया। उसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली और इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया। वह काशी में निवास करने वाले ऋषियों, मुनियों और शिव-भक्तों को विशेष रूप से सताने लगा। वह गज़ (हाथी) का विशालकाय रूप धारण कर लेता था और तपस्या में लीन ऋषियों को अपने पैरों तले कुचल देता था। उसने शिव-पूजन पर प्रतिबंध लगा दिया और ऋषियों के आश्रम नष्ट कर दिए। जब गजासुर का अत्याचार सीमा पार कर गया, तब काशी के समस्त ऋषि-मुनि और देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे और रक्षा की गुहार लगाई। 3. भगवान शिव का प्रकट होना और युद्ध ऋषियों और देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रुद्ध हुए। वे स्वयं काशी पधारे। गजासुर ने जब भगवान शिव को देखा, तो वह अपने विशाल हाथी के रूप में उन पर झपटा। वरदान के प्रभाव से उस पर किसी भी साधारण अस्त्र-शस्त्र का असर नहीं हो सकता था। भगवान शिव ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग किए, अपने नखों (Trishul/Claws) से ही गजासुर के विशालकाय शरीर को चीर दिया और उसे अपने त्रिशूल की नोक पर उठा लिया। 4. गजासुर का पश्चाताप और अंतिम प्रार्थना जब गजासुर शिव जी के त्रिशूल पर टंगा हुआ मृत्यु की अंतिम घड़ियाँ गिन रहा था, तब शिव-स्पर्श के प्रभाव से उसके समस्त पाप भस्म हो गए और उसका अज्ञान दूर हो गया। उसे बोध हुआ कि सामने साक्षात देवाधिदेव महादेव खड़े हैं। गजासुर ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान शिव की स्तुति की और कहा: *"हे देवों के देव! आपकी उग्र कांति का दर्शन करके मेरा अज्ञान मिट गया है। मैं आपके हाथों मृत्यु पाकर धन्य हो गया। मेरी केवल दो अंतिम इच्छाएँ हैं— मेरी इस चर्म (हाथी की विशाल खाल) को आप अपने दिव्य शरीर पर वस्त्र की भांति धारण करें। जिस स्थान पर आपने मेरा विदारण किया है, वहाँ आपका नाम मेरे नाम से जोड़ा जाए।"* 5. 'कृत्तिवासेश्वर' नाम और शिव जी की कृपा दयालु महादेव अपने शत्रु रहे असुर की इस भक्ति और प्रार्थना से प्रसन्न हो गए। उन्होंने गजासुर की दोनों इच्छाएँ स्वीकार कीं: कृत्तिवासा: भगवान शिव ने गजासुर की खाल (कृत्ति) को ओढ़ लिया और तब से वे 'कृत्तिवासा' (गजचर्म धारण करने वाले) कहलाए। कृत्तिवासेश्वर: काशी में जिस स्थान पर गजासुर का मोक्ष हुआ, वहाँ स्वयं भगवान शिव एक दिव्य लिंग के रूप में स्थापित हुए, जिसे 'कृत्तिवासेश्वर शिवलिंग' कहा जाता है। शिव जी ने वरदान दिया कि जो भी मनुष्य काशी जाकर 'कृत्तिवासेश्वर' लिंग के दर्शन और पूजन करेगा, उसे गोजग (हाथी) या पशु योनि से मुक्ति मिलेगी और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। कथा का आध्यात्मिक संदेश: यह कथा दर्शाती है कि भगवान शिव अपने शरण में आए शत्रु को भी दंड देने के बाद अभय और मोक्ष प्रदान करते हैं। बाह्य रूप (अहंकार) का अंत ही वास्तविक मोक्ष का द्वार खोलता है।
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3 days ago
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 ---*⚜*--- *दीपप्रिय: कार्तवीर्यो मार्तण्डो नतिवल्लभ: ।* *स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गगणेशस्ततर्पणप्रियः* *दुर्गाऽर्चनप्रिया नूनमभिषेकप्रियः शिवः ।* *तस्मात्तेषां प्रतोषाय विदध्यात्तत्तदादृतः ।।* मन्त्रमहोदधि २७/११६-११७ "कार्तवीर्य को दीप प्रिय है, सूर्य को नमस्कार प्रिय है, विष्णुजी को स्तुति प्रिय है, गणेशजी को तर्पण प्रिय है,दुर्गाजी को अर्चना प्रिय है और *शिवजी को अभिषेक प्रिय है ।* अतः इन देवताओ को प्रसन्न करने के लिये इनके प्रिय कार्य ही करने चाहिये।" ---*⚜*--- *विना भस्मत्रिपुंड्रेण विना रुद्राक्षमालया ।* *बिल्वपत्रं विना नैव पूजयेच्छंकरं बुधः ।।* *भस्माप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठाः प्रवृत्ते शिवपूजने।* *तस्मान्मृदापि कर्तव्यं ललाटे च त्रिपुंड्रकम् ।।* शिवपुराण, वि० २१/५५,५६ ‘‘विद्वान पुरूष को चाहिये की बिना भस्म का त्रिपुण्ड्र लगाये, बिना रूद्राक्ष की माला धारण किये तथा बिल्वपत्र का बिना संग्रह किये भगवान शंकर की पूजा न करे । शिवपूजन आरम्भ करते समय यदि भस्म न मिल, तो मिट्टी से ही ललाट में त्रिपुण्ड्र अवश्य कर लेना चाहिये।‘‘ ---*⚜*--- 🙏 *जय मातादी* 🙏 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 #शिव महापुराण🙏 #श्री शिव महापुराण कथा #प्रदीप मिश्रा द्वारा शिव महापुराण कथा #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺
sn vyas
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4 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 यह अनूठी और रोचक कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में आती है। रामायण में शूर्पणखा को केवल एक दुष्ट राक्षसी के रूप में देखा जाता है, किंतु शिव पुराण उसके पूर्वजन्म की उस भूल और लालसा को उजागर करता है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भयानक राक्षसी का शरीर मिला। 1. पूर्वजन्म में 'नयन्ती' और उसकी लालसा अपने पूर्वजन्म में शूर्पणखा 'नयन्ती' नाम की एक अत्यंत रूपवती और गंधर्व-कन्या समान सुंदरी थी। वह अपने रूप-सौंदर्य पर अत्यंत गर्व करती थी। उसके मन में केवल एक ही प्रबल अभिलाषा थी—संसार का सबसे सुंदर, शक्तिशाली और कामदेव जैसा मनमोहक पुरुष उसका पति बने। जब उसने देखा कि ऐसा पति केवल ईश्वर की अनुकंपा से ही मिल सकता है, तो उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने का निर्णय लिया। 2. भगवान शिव की तपस्या और कामासक्ति नयन्ती वन में जाकर पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शिव की कठिन साधना करने लगी। वह वर्षों तक पंचाग्नि तप करती रही और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करती रही। किंतु, उसकी तपस्या में एक बहुत बड़ी त्रुटि थी—उसकी तपस्या में 'भक्ति' या 'मुक्ति' का भाव नहीं था, बल्कि केवल 'काम' (शारीरिक सौंदर्य और सुंदर पति) की तीव्र वासना थी। वह पूजा करते समय भी भगवान शिव के निष्काम स्वरूप का ध्यान करने के बजाय केवल एक अति-सुंदर पति की कल्पनाओं में खोई रहती थी। 3. भगवान शिव की परीक्षा और वरदान जब उसकी तपस्या की अवधि पूर्ण हुई, तब भगवान शिव एक दिव्य वृद्ध ब्राह्मण के रूप में नयन्ती के आश्रम में प्रकट हुए। वृद्ध ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उससे पूछा: "हे कल्याणी! तुम इस सुकुमार अवस्था में इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है?" नयन्ती ने बिना संकोच के अपने मन की कामना प्रकट करते हुए कहा: "हे महाराज! मैं इस ब्रह्मांड के सबसे सुंदर, कांतिमान और कामातुर पुरुष को अपने पति के रूप में पाना चाहती हूँ, जो केवल मुझसे ही प्रेम करे और उसके रूप की तुलना कोई न कर सके।" ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उसे समझाया कि केवल बाहरी रूप-सौंदर्य और काम-वासना के लिए की गई तपस्या जीव को अंत में दुख ही देती है। किंतु नयन्ती अपनी हठ पर अड़ी रही। तब शिव जी ने अपने असली स्वरूप में दर्शन दिए और कहा: "हे नयन्ती! तुम्हारी तपस्या के फलस्वरूप तुम्हें अगले जन्म में संसार का सबसे सुंदर पुरुष पति के रूप में पाने का अवसर मिलेगा, किंतु तुम्हारी इस अत्यधिक काम-लालसा और आसक्ति के कारण तुम्हें राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ेगा।" 4. शूर्पणखा के रूप में जन्म और फल अगले जन्म में वही नयन्ती महर्षि विश्रवा की पुत्री और रावण की बहन 'शूर्पणखा' के रूप में जन्मी। राक्षसी योनि में जन्म लेने के बाद भी उसके पूर्वजन्म का वह 'संस्कार' (सुंदर पति पाने की लालसा) वैसा ही बना रहा। जब त्रेतायुग में उसने पंचवटी में परम सुंदर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तो उसके पूर्वजन्म की वही काम-वासना पुनः जागृत हो गई। उसने श्रीराम और लक्ष्मण को अपने मोहिनी रूप से रिझाने का प्रयास किया। किंतु, प्रभु श्रीराम तो 'एकपत्नीव्रती' और मर्यादा पुरुषोत्तम थे तथा लक्ष्मण जी भी अपनी भ्रातृ-भक्ति में लीन थे। जब शूर्पणखा ने माता सीता पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, तो लक्ष्मण जी ने उसके नाक और कान काट दिए। 5. कथा का आध्यात्मिक रहस्य शिव पुराण में इस कथा के माध्यम से समझाया गया है कि शूर्पणखा की नाक-कान कटना केवल रामायण की एक घटना नहीं थी, बल्कि उसके पूर्वजन्म के अशुद्ध मनोरथ का परिणाम था। यदि उसने अपने पूर्वजन्म में शिव जी से 'सुंदर पति' के स्थान पर 'सच्ची भक्ति' माँगी होती, तो उसका उद्धार हो जाता। कथा का संदेश: ईश्वर की भक्ति सदैव निष्काम और पवित्र भाव से करनी चाहिए। यदि भक्ति में केवल भौतिक सुख, काम-वासना या शारीरिक सौंदर्य की कामना होगी, तो वह फल तो देती है, किंतु वह फल अंततः विनाश और कष्ट का कारण बनता है।
sn vyas
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5 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण रुद्रसंहिता यह प्रसंग शिव पुराण की शतरुद्र संहिता के अंतिम अध्यायों में आता है। यह संवाद एकादश रुद्रावतार भगवान हनुमान जी और ज्ञानवृद्ध महर्षि अर्जन (कुछ पांडुलिपियों में ऋज्जन या अर्जन मुनि) के बीच गंधमादन पर्वत पर हुआ था। यह प्रसंग शिव-भक्ति और राम-भक्ति के अभिन्न संबंध को बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है। 1. गंधमादन पर्वत पर हनुमान जी का निवास श्रीराम कथा के पूर्ण होने और प्रभु श्रीराम के साकेत धाम गमन के पश्चात्, भगवान हनुमान जी (जो रुद्र के 11वें अवतार हैं) को इस धराधाम पर अजर-अमर रहकर धर्म और राम-नाम की रक्षा का दायित्व मिला। हनुमान जी हिमालय के पावन गंधमादन पर्वत पर एक अत्यंत शांत, दिव्य आश्रम बनाकर एकांत में भगवान राम के ध्यान और शिव-तत्व के चिंतन में लीन रहने लगे। उस क्षेत्र का वातावरण हनुमान जी के तपोबल से निरंतर राम-नाम के गुंजन और शिव-मंत्रों की ध्वनियों से सुवासित रहता था। 2. अर्जन मुनि का आगमन और जिज्ञासा ज्ञान और मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले महर्षि अर्जन अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए गंधमादन पर्वत पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने भगवान हनुमान जी को एक विशाल वृक्ष के नीचे अचल, तेजस्वी और समाधिस्थ अवस्था में देखा। हनुमान जी के तेज से प्रभावित होकर महर्षि अर्जन ने उनके चरणों में प्रणाम किया। जब हनुमान जी ने समाधि से बाहर आकर मुनि का स्वागत किया, तो अर्जन मुनि ने अत्यंत विनम्रता से अपनी आत्मिक शंका रखी: "हे रुद्रावतार! हे महावीर! आप स्वयं देवाधिदेव महादेव के रुद्र अंश हैं। फिर भी आप निरंतर 'राम-नाम' का जप और स्मरण क्यों करते हैं? शिव-तत्व और राम-तत्व में क्या अंतर है? किस भक्ति से जीव का शीघ्र कल्याण संभव है?" 3. हनुमान जी द्वारा शिव और राम-तत्व का प्रकटीकरण महर्षि अर्जन का यह निष्काम प्रश्न सुनकर हनुमान जी प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए बोले: "हे मुनिश्रेष्ठ! जो अज्ञानी जन भगवान शिव और भगवान विष्णु (श्रीराम) में भेद देखते हैं, वे कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। शिव ही राम हैं और राम ही शिव हैं।" हनुमान जी ने अर्जन मुनि को गूढ़ रहस्य समझाते हुए बताया: शिव का हृदय विष्णु हैं: भगवान शिव निरंतर अपने हृदय में श्रीहरि के राम स्वरूप का ध्यान करते हैं। काशी में मरते हुए प्राणी के कान में जो 'तारक मंत्र' शिव जी फूंकते हैं, वह 'राम' नाम ही है। विष्णु का हृदय शिव हैं: प्रभु श्रीराम अपने प्रत्येक कार्य से पहले और बाद में शिवलिंग की स्थापना कर महादेव की पूजा करते हैं (जैसे रामेश्वरम में)। अवतार का कारण: "मैं शिव जी का ही अंश (रुद्र) हूँ, किंतु केवल इस परम आनंद रस (राम-भक्ति) का स्वाद लेने और संसार को निष्काम सेवा का मार्ग दिखाने के लिए मैंने दास्य-भाव से हनुमान अवतार धारण किया है।" 4. अर्जन मुनि को उपदेश और दिव्य दर्शन हनुमान जी ने अर्जन मुनि को शिव-राम भक्ति का मुख्य सूत्र देते हुए कहा कि जो व्यक्ति शिव जी की पूजा करता है किंतु श्रीराम से द्वेष करता है, उसकी पूजा शिव जी कभी स्वीकार नहीं करते। ठीक उसी प्रकार जो राम-भक्त शिव जी का अनादर करता है, उसे राम कृपा कभी नहीं मिलती। संवाद के अंत में, हनुमान जी ने महर्षि अर्जन पर कृपा करते हुए उन्हें अपने वक्षस्थल (छाती) के भीतर साक्षात भगवान शिव और प्रभु श्रीराम को एक-दूसरे का ध्यान करते हुए दिव्य दर्शन कराया। 5. संवाद का फल हनुमान जी का यह उपदेश सुनकर अर्जन मुनि का संपूर्ण संशय मिट गया। उनका मन शिव और राम के अभिन्न रूप में लीन हो गया। हनुमान जी के आशीर्वाद से वे परम ज्ञान और भक्ति प्राप्त कर सिद्ध पुरुष बने। कथा का संदेश: हरि (विष्णु/राम) और हर (शिव) एक ही परमब्रह्म के दो स्वरूप हैं। जो साधक हनुमान जी के मार्ग पर चलकर दोनों के प्रति निष्काम भक्ति और आदर भाव रखता है, वही संसार के आवागमन से मुक्त होकर शिवलोक और साकेत धाम का अधिकारी बनता है।
sn vyas
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6 days ago
*यह कथा शिव पुराण के उमा संहिता तथा रुद्र संहिता में वर्णित है, जो महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र के मध्य के प्रसिद्ध मतभेद, विश्वामित्र की घोर तपस्या और अंततः भगवान शिव की कृपा से उन्हें प्राप्त 'ब्रह्मर्षि' पद की गाथा है।* *1. कामधेनु नंदिनी को लेकर विवाद* *प्रारंभ में विश्वामित्र एक प्रतापी और शक्तिशाली राजा थे। एक बार वे अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी अलौकिक कामधेनु गाय (नंदिनी) की सहायता से राजा विश्वामित्र और उनकी विशाल सेना का अभूतपूर्व आदर-सत्कार किया।* *नंदिनी की सामर्थ्य देखकर राजा विश्वामित्र के मन में लोभ आ गया। उन्होंने वशिष्ठ जी से नंदिनी को माँगना चाहा, परंतु वशिष्ठ जी ने कहा कि गौ माता आश्रम की संपत्ति नहीं, बल्कि पूजनीय है। इस पर विश्वामित्र ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने का प्रयास किया, किंतु नंदिनी के दिव्य तेज और वशिष्ठ जी के ब्रह्मबल के आगे विश्वामित्र की संपूर्ण सेना पराजित हो गई।* *2. 'क्षत्रिय बल' पर 'ब्रह्मबल' की विजय* *अपनी पराजय से दुःखी होकर विश्वामित्र को बोध हुआ कि शारीरिक और सैन्य बल (क्षत्रिय बल) आत्मबल और तपोबल (ब्रह्मबल) के सामने अत्यंत तुच्छ है।* *उन्होंने विचार किया:* *"धिक्कार है क्षत्रिय बल को! असली बल तो ब्रह्मबल है। मैं भी घोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करूँगा।"* *3. भगवान शिव की घोर तपस्या* *विश्वामित्र ने अपना राज-पाट त्याग दिया और भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए कठोर तपस्या प्रारंभ की। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर महादेव का ध्यान किया।* *उनकी निष्ठा और उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और वेदों के गूढ़ ज्ञान का वरदान माँगा। शिवजी ने उन्हें समस्त दिव्यास्त्र प्रदान किए।* *दिव्यास्त्र प्राप्त करने के अहंकार में विश्वामित्र ने पुनः महर्षि वशिष्ठ पर आक्रमण कर दिया। परंतु महर्षि वशिष्ठ ने अपने 'ब्रह्मदंड' से विश्वामित्र के सभी अस्त्रों को निष्फल कर दिया। विश्वामित्र को समझ आ गया कि केवल अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर लेने से कोई 'ब्रह्मर्षि' नहीं बनता, जब तक कि मन से क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या का नाश न हो जाए।* *4. अहंकार का त्याग और शिव कृपा से 'ब्रह्मर्षि' पद* *विश्वामित्र पुनः भगवान शिव की शरण में गए। इस बार उन्होंने किसी अस्त्र या पद की लालसा के बिना केवल* *आत्म-शुद्धि और शिव-भक्ति के लिए तपस्या की। धीरे-धीरे उनके मन से अहंकार, क्रोध और वशिष्ठ जी के प्रति ईर्ष्या पूरी तरह समाप्त हो गई।* *जब विश्वामित्र का हृदय पूर्णतः निर्मल हो गया, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और स्वयं महर्षि वशिष्ठ ने आगे बढ़कर विश्वामित्र को गले लगाया तथा उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया।* *कथा का संदेश: सच्चा ज्ञान और उच्च पद बल या छल से नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग, नम्रता और भगवान शिव की निष्काम भक्ति से ही प्राप्त होता है।* #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱हर हर महादेव #शिव महापुराण🙏 #श्री शिव महापुराण कथा
sn vyas
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7 days ago
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 यह कथा शिव पुराण के शतरुद्र संहिता तथा कोटिरुद्र संहिता में आती है। यह प्रसंग लंकापति रावण की अनन्य एवं उग्र शिव-भक्ति, उसकी भूल और भगवान शिव के 'वैद्यनाथ' (परम चिकित्सक) रूप में प्राकट्य की अद्भुत गाथा है। 1. रावण का कठोर तप और कैलाश हिलाने का दुस्साहस रावण भगवान शिव का परम भक्त था, किंतु उसका स्वभाव अत्यंत अहंकारी भी था। एक बार उसने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। जब बहुत समय बीत जाने पर भी शिवजी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने अपनी उग्र भक्ति का परिचय दिया। उसने एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवजी के चरणों में अर्पित करना शुरू कर दिया। जब वह अपना दसवाँ सिर काटने ही वाला था, तब आशुतोष महादेव अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़ दिया तथा उसे अतुलित शक्ति प्रदान की। 2. अचल शिवलिंग प्राप्त करने की हठ वरदान पाने के बाद भी रावण संतुष्ट नहीं हुआ। उसने भगवान शिव से प्रार्थना की: "हे महादेव! मैं आपको केवल कैलाश पर ही नहीं, अपनी राजधानी लंका में सदा के लिए स्थापित करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ लंका चलें।" भगवान शिव भक्तों के वश में हैं, इसलिए उन्होंने रावण की प्रार्थना स्वीकार की और उसे एक अत्यंत दिव्य शिवलिंग (अचल लिंग) प्रदान करते हुए एक शर्त रखी: "हे रावण! तुम इस शिवलिंग को लंका ले जा सकते हो, परंतु ध्यान रखना—यदि मार्ग में तुमने इसे कहीं भी पृथ्वी पर रख दिया, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा और पुनः नहीं उठेगा।" रावण ने सहर्ष यह शर्त स्वीकार की और शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चल पड़ा। 3. देवताओं की चिंता और वरुण-विष्णु की माया देवता भली-भांति जानते थे कि यदि रावण इस दिव्य शिवलिंग को लंका में स्थापित करने में सफल हो गया, तो वह पूरी तरह अजेय हो जाएगा और उसका अत्याचार और बढ़ जाएगा। इसलिए देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता माँगी। जब रावण शिवलिंग लेकर चित्राभूमि (वर्तमान में देवघर/झारखंड या पारली) के समीप से गुजर रहा था, तब भगवान विष्णु की प्रेरणा से वरुण देव ने रावण के पेट में तीव्र जल (लघुशंका) का वेग उत्पन्न कर दिया। रावण अत्यंत व्याकुल हो उठा। उसने सोचा कि शिवलिंग को हाथ में लेकर अशौच अवस्था में खड़ा होना उचित नहीं है। तभी उसे पास ही 'वैजू' (वैजनाथ) नाम का एक ग्वाला (गड़रिया) दिखाई दिया (जो वास्तव में भगवान विष्णु/गणेश जी की माया से वहाँ था)। रावण ने उस ग्वाले से शिवलिंग को थोड़ी देर हाथ में थामे रखने का अनुरोध किया और चेतावनी दी कि इसे ज़मीन पर मत रखना। 4. ज्योतिर्लिंग की स्थापना रावण जैसे ही लघुशंका के लिए गया, वरुण देव के प्रभाव से उसे अत्यधिक समय लग गया। उधर ग्वाले बने देवदूत ने भार का बहाना बनाकर शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। शिवलिंग भूमि का स्पर्श करते ही वहीं पाताल तक गहराई से स्थापित हो गया। जब रावण लौटकर आया और उसने देखा कि शिवलिंग भूमि पर रखा हुआ है, तो वह अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, किंतु वह एक इंच भी नहीं हिला। क्रोध और निराशा में रावण ने अपने हाथों से उस शिवलिंग को नीचे की ओर दबा दिया, जिससे उस पर अँगूठे का निशान बन गया। 5. रावण का सिर-छेदन और 'वैद्यनाथ' प्राकट्य अपने मनोरथ को विफल देखकर रावण अत्यंत दुःखी हो गया। उसने अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए वहीं पुनः घोर तपस्या शुरू कर दी। उसने एक कुंड खोदा और पुनः अपने सिर काट-काटकर शिवजी को अर्पित करने लगा। जब नौ सिर कट चुके और दसवाँ सिर काटने का समय आया, तब भगवान शिव अत्यंत द्रवित हो गए। वे एक 'वैद्य' (चिकित्सक) के रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने: रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़कर औषधियों व दिव्य स्पर्श से उसका उपचार किया और उसे पूर्णतः स्वस्थ कर दिया। वैद्य बनकर रावण के अंगों को आरोग्य प्रदान करने के कारण भगवान शिव का वह रूप और वह ज्योतिर्लिंग 'वैद्यनाथ' (वैजनाथ) कहलाया। कथा का संदेश: भक्ति यदि अहंकार से युक्त हो, तो वह ईश्वर के दिव्य नियमों को बदल नहीं सकती। भगवान शिव भाव के भूखे हैं—वे अपने भक्त के कटे शीश भी जोड़ देते हैं, परंतु धर्म और संसार के संतुलन को सदा बनाए रखते हैं।
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7 days ago
#नागेश्वर ज्योतिर्लिंग 🙏🌹 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 यह कथा शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में आती है, जो नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना, दारुका राक्षसी के अत्याचार और दारुक वन के ऋषियों के अहंकार-भंग से जुड़ी हुई है। 1. दारुका का वरदान और राक्षसों का अत्याचार प्राचीन काल में 'दारुका' नाम की एक राक्षसी थी, जो देवी पार्वती की परम भक्त थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसे एक दिव्य वन (दारुका वन) वरदान में दिया था और उसे यह शक्ति दी थी कि वह इस वन को जहाँ चाहे ले जा सकती है। दारुका का पति 'दारुक' एक क्रूर राक्षस था। दारुका और दारुक ने उस वन का उपयोग करके धार्मिक लोगों, ऋषियों और शिव-भक्तों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वे ऋषियों को बंदी बनाकर उस वन में कैद कर लेते थे। 2. ऋषियों का अहंकार और भगवान शिव की लीला इसी वन के निकट कई ज्ञानी ऋषि-मुनि भी रहते थे। समय के साथ उन ऋषियों को अपने ज्ञान, तपस्या और कर्मकांडों पर अहंकार हो गया था। वे सोचने लगे थे कि उनके तपोबल के आगे ईश्वर की भक्ति भी गौण है। उनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान शिव ने 'भिक्षुक' (अवधूत) रूप धारण किया और दारुका वन में पहुँचे। भगवान शिव का वह दिव्य और अलौकिक रूप देखकर ऋषियों की पत्नियाँ मोहित हो गईं और ऋषियों का ध्यान भंग हो गया। क्रोधित होकर ऋषियों ने शिवजी को पहचाने बिना उन्हें श्राप दे दिया कि उनका लिंग भूमि पर गिर जाए। जैसे ही वह लिंग भूमि पर गिरा, उसमें से संपूर्ण ब्रह्मांड को दग्ध कर देने वाली अग्नि उत्पन्न हो गई। तीनों लोक तपने लगे। तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने ऋषियों को उनकी भूल का अहसास कराया: "तुम्हारे अहंकार ने तुम्हें अंधा कर दिया था। जिन्हें तुमने साधारण भिक्षुक समझा, वे स्वयं देवाधिदेव महादेव थे।" ऋषियों को अपनी भूल पर भारी पश्चाताप हुआ। उन्होंने माता पार्वती और शिवजी की स्तुति की, जिसके बाद माता पार्वती ने उस लिंग को धारण किया और संसार की रक्षा हुई। 3. शिव-भक्त सुपार्श्व की रक्षा उधर, दारुक और दारुका राक्षसों ने सुपार्श्व (कुछ ग्रंथों में 'सुप्रिय') नाम के एक परम शिव-भक्त वैश्य को अपने अन्य साथियों के साथ दारुका वन के कारागार में बंदी बना रखा था। सुपार्श्व कारागार में भी भयभीत नहीं हुआ। उसने मिट्टी का एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और 'ॐ नमः शिवाय' का निरंतर जाप करने लगा। उसके प्रभाव से अन्य बंदी भी शिव-भक्ति में लीन हो गए। जब दारुक राक्षस को यह पता चला, तो वह क्रोधित होकर सुपार्श्व का वध करने दौड़ा। सुपार्श्व ने सच्चे हृदय से भगवान शिव को पुकारा: "हे नागेश्वर! हे सर्वेश्वर! इस अधर्मी राक्षस से हमारी रक्षा करें!" 4. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य भक्त की करुण पुकार सुनते ही कारागार के भीतर भूमि फटी और स्वयं भगवान शिव एक दिव्य रत्नजटित सिंहासन पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए। भगवान शिव ने अपने पाशुपतास्त्र से दारुक और उसकी पूरी राक्षस सेना का संहार कर दिया। माता पार्वती के वरदान के कारण दारुका राक्षसी की रक्षा तो हो गई, लेकिन उसने अपना अधर्म का मार्ग त्याग दिया। 5. ज्योतिर्लिंग की स्थापना भगवान शिव ने सुपार्श्व और सभी ऋषियों को अभय दान दिया। ऋषियों का अहंकार पूरी तरह नष्ट हो चुका था और उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे समस्त संसार के कल्याण के लिए सदैव उसी स्थान पर विराजमान रहें। तभी से भगवान शिव वहाँ 'नागेश्वर' (नागों के ईश्वर) के नाम से ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हुए और वह पावन क्षेत्र नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया। कथा का संदेश: कितना भी ज्ञान या तपोबल प्राप्त हो जाए, अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है। भगवान शिव केवल अपने भक्त की सच्ची और निष्काम भक्ति देखते हैं, ज्ञान का अहंकार नहीं।
sn vyas
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7 days ago
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱बम बम भोले🙏 #🔱हर हर महादेव #प्रदीप मिश्रा द्वारा शिव महापुराण कथा #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी यह कथा शिव पुराण के उमा संहिता तथा रुद्र संहिता में वर्णित है, जो महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र के मध्य के प्रसिद्ध मतभेद, विश्वामित्र की घोर तपस्या और अंततः भगवान शिव की कृपा से उन्हें प्राप्त 'ब्रह्मर्षि' पद की गाथा है। 1. कामधेनु नंदिनी को लेकर विवाद प्रारंभ में विश्वामित्र एक प्रतापी और शक्तिशाली राजा थे। एक बार वे अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी अलौकिक कामधेनु गाय (नंदिनी) की सहायता से राजा विश्वामित्र और उनकी विशाल सेना का अभूतपूर्व आदर-सत्कार किया। नंदिनी की सामर्थ्य देखकर राजा विश्वामित्र के मन में लोभ आ गया। उन्होंने वशिष्ठ जी से नंदिनी को माँगना चाहा, परंतु वशिष्ठ जी ने कहा कि गौ माता आश्रम की संपत्ति नहीं, बल्कि पूजनीय है। इस पर विश्वामित्र ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने का प्रयास किया, किंतु नंदिनी के दिव्य तेज और वशिष्ठ जी के ब्रह्मबल के आगे विश्वामित्र की संपूर्ण सेना पराजित हो गई। 2. 'क्षत्रिय बल' पर 'ब्रह्मबल' की विजय अपनी पराजय से दुःखी होकर विश्वामित्र को बोध हुआ कि शारीरिक और सैन्य बल (क्षत्रिय बल) आत्मबल और तपोबल (ब्रह्मबल) के सामने अत्यंत तुच्छ है। उन्होंने विचार किया: "धिक्कार है क्षत्रिय बल को! असली बल तो ब्रह्मबल है। मैं भी घोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करूँगा।" 3. भगवान शिव की घोर तपस्या विश्वामित्र ने अपना राज-पाट त्याग दिया और भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए कठोर तपस्या प्रारंभ की। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर महादेव का ध्यान किया। उनकी निष्ठा और उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और वेदों के गूढ़ ज्ञान का वरदान माँगा। शिवजी ने उन्हें समस्त दिव्यास्त्र प्रदान किए। दिव्यास्त्र प्राप्त करने के अहंकार में विश्वामित्र ने पुनः महर्षि वशिष्ठ पर आक्रमण कर दिया। परंतु महर्षि वशिष्ठ ने अपने 'ब्रह्मदंड' से विश्वामित्र के सभी अस्त्रों को निष्फल कर दिया। विश्वामित्र को समझ आ गया कि केवल अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर लेने से कोई 'ब्रह्मर्षि' नहीं बनता, जब तक कि मन से क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या का नाश न हो जाए। 4. अहंकार का त्याग और शिव कृपा से 'ब्रह्मर्षि' पद विश्वामित्र पुनः भगवान शिव की शरण में गए। इस बार उन्होंने किसी अस्त्र या पद की लालसा के बिना केवल आत्म-शुद्धि और शिव-भक्ति के लिए तपस्या की। धीरे-धीरे उनके मन से अहंकार, क्रोध और वशिष्ठ जी के प्रति ईर्ष्या पूरी तरह समाप्त हो गई। जब विश्वामित्र का हृदय पूर्णतः निर्मल हो गया, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और स्वयं महर्षि वशिष्ठ ने आगे बढ़कर विश्वामित्र को गले लगाया तथा उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। कथा का संदेश: सच्चा ज्ञान और उच्च पद बल या छल से नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग, नम्रता और भगवान शिव की निष्काम भक्ति से ही प्राप्त होता है।