महाभारत की कथा

sn vyas
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5 days ago
#महाभारत की कथा यह कथा द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ की संधि की है, जब कुरुक्षेत्र का मैदान रक्त से लाल हो चुका था। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने राजपाट तो संभाल लिया, लेकिन उनके अंतर्मन में शांति नहीं थी। अपने ही बंधु-बांधवों और गुरुओं के वध के कारण उन पर 'गोत्र-हत्या' और 'ब्रह्म-हत्या' का दोष था। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर, पांडव महादेव से क्षमा याचना करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए निकल पड़े। पांडव सर्वप्रथम काशी पहुँचे, लेकिन भगवान शिव पांडवों द्वारा किए गए विनाश से रुष्ट थे। वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे गुप्त रूप से हिमालय चले गए। पांडव भी हार मानने वाले नहीं थे; वे उन्हें खोजते हुए केदारखंड (वर्तमान उत्तराखंड) की ऊँचाइयों तक पहुँच गए। भगवान शिव ने पांडवों को आते देख एक बैल (वृषभ) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी के पास चर रहे पशुओं के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों को आभास हो गया कि महादेव इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने एक युक्ति अपनाई: भीम ने अपना शरीर अत्यंत विशाल किया और दो पर्वतों पर अपने पैर फैला दिए। सारे पशु भीम के पैरों के नीचे से निकल गए, लेकिन महादेव (बैल रूपी) ने एक वीर पांडव के चरणों के नीचे से निकलना स्वीकार नहीं किया। जैसे ही भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, महादेव भूमि में समाने लगे। तभी भीम ने फुर्ती दिखाते हुए बैल की कूबड़ (पीठ का भाग) को कसकर पकड़ लिया। पांडवों की इस अडिग श्रद्धा को देखकर महादेव का हृदय पिघल गया और वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें पापमुक्त कर दिया। जब महादेव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके शरीर के अंग पाँच अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए। इन पाँचों स्थानों को पांडवों ने मंदिरों के रूप में स्थापित किया 1.केदारनाथ - यहाँ बैल की पीठ के आकार की शिला पूजी जाती है। 2.तुंगनाथ - यह विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है। 3.रुद्रनाथ - यहाँ महादेव के 'नीलकंठ' मुख के दर्शन होते हैं। 4.मध्यमहेश्वर - यहाँ शिवजी के मध्य भाग की पूजा होती है। 5.कल्पेश्वर - यहाँ महादेव की जटाओं की पूजा होती है; यह वर्षभर खुला रहता है। कहा जाता है कि जब शिव जी बैल रूप में धरती में समाए, तो उनका ऊपरी भाग (सिर) नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम पशुपतिनाथ के नाम से जानते हैं। केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही स्वरूप का हिस्सा माना जाता है। पांडवों द्वारा निर्मित ये मंदिर आज भी भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बाद अन्य चार केदारों की यात्रा करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। हर हर महादेव! 🙏
sn vyas
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6 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत का महान युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी और अधर्म का अंत हो चुका था। कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत था, लेकिन उस युद्ध की स्मृतियाँ अभी भी अर्जुन के मन में जीवित थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक चमत्कार देखे थे। भगवान श्रीकृष्ण का सखा होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त था। उन्होंने युद्ध के मध्य भगवान का विराट विश्वरूप भी देखा था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था। क्या वास्तव में भगवान के सभी स्वरूपों को कोई जान सकता है? क्या उनकी लीलाएँ और रूप केवल उतने ही हैं, जितने मनुष्य देख पाता है? अर्जुन जितना भगवान के निकट आते गए, उतना ही उन्हें यह अनुभव होने लगा कि श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप अनंत, असीम और मानव बुद्धि से परे है। एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक शांत वन में बैठे थे। वातावरण अत्यंत पवित्र था। मंद-मंद वायु बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था और चारों ओर प्रकृति की अद्भुत छटा फैली हुई थी। अर्जुन भगवान के चरणों में बैठे थे। कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने विनम्र भाव से कहा, "हे माधव! मैंने आपका विराट स्वरूप देखा, आपकी अनगिनत लीलाएँ देखीं, फिर भी मेरे मन में ऐसा लगता है कि मैं आपको पूर्ण रूप से कभी जान ही नहीं पाया। आपकी महिमा अनंत है। यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे अपने किसी ऐसे दिव्य रहस्य का दर्शन कराइए, जिसे आज तक किसी ने न देखा हो।" भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने अर्जुन की ओर प्रेम से देखा। वे जानते थे कि यह प्रश्न अहंकार से नहीं, बल्कि सच्ची जिज्ञासा और भक्ति से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, "पार्थ, परमात्मा को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता। मैं केवल मनुष्य नहीं हूँ, केवल देवता नहीं हूँ, केवल विराट ब्रह्मांड भी नहीं हूँ। मैं समस्त सृष्टि में विद्यमान हूँ। यदि तुम्हारा मन वास्तव में इस सत्य को समझने के लिए तैयार है, तो आज मैं तुम्हें अपना एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमय स्वरूप दिखाऊँगा।" इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया प्रकट की। अचानक वातावरण बदलने लगा। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृक्ष स्थिर हो गए, वायु रुक गई और समय मानो थम गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान का सामान्य मानवीय स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। उनके सामने जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य से स्तब्ध रह गए। उन्होंने ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था। भगवान का यह अद्भुत स्वरूप नवगुंजर कहलाया। यह किसी एक प्राणी का शरीर नहीं था, बल्कि नौ विभिन्न जीवों के दिव्य अंगों से निर्मित था। उनके मुख पर मुर्गे का सिर था, जो जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक था। उनकी गर्दन मोर की थी, जो सौंदर्य, दिव्यता और आनंद का प्रतीक मानी जाती है। उनके शरीर पर बैल का कूबड़ था, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था। उनकी कमर सिंह की थी, जो वीरता और निर्भीकता का प्रतीक थी। उनके तीन पैर हाथी के थे, जो स्थिरता, बुद्धिमत्ता और अपार शक्ति को दर्शाते थे। चौथा पैर बाघ का था, जो साहस, गति और संकल्प का प्रतीक था। उनकी पूँछ सर्प की भाँति लहराती थी, जो समय, ऊर्जा और अनंत शक्ति का संकेत देती थी। उनके शरीर में अन्य पशु-पक्षियों के दिव्य अंग भी समाहित थे, जो समस्त जीवों की एकता का प्रतीक थे। उनके एक हाथ में पूर्ण विकसित कमल का पुष्प सुशोभित था, जो पवित्रता, ज्ञान और परम चेतना का प्रतीक था। अर्जुन कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाए कि उनके सामने कौन खड़ा है। यह कोई देवता था, कोई दिव्य प्राणी था या स्वयं प्रकृति का अद्भुत रूप? उनके हाथ अनायास ही गांडीव पर चले गए, किंतु अगले ही क्षण उनकी दृष्टि भगवान के हाथ में धारण किए हुए कमल पर पड़ी। उसी क्षण उनके हृदय में दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने उस रूप से वही करुणा, वही प्रेम और वही अनंत तेज अनुभव किया, जो सदैव भगवान श्रीकृष्ण से अनुभव होता था। अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण का एक अत्यंत रहस्यमय दिव्य स्वरूप है। अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव नीचे रख दिया। वे दोनों हाथ जोड़कर भगवान के चरणों में झुक गए। उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं वास्तव में आपको कभी जान ही नहीं पाया। आप किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं। आपकी महिमा तो अनंत है।" भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में कहा, "पार्थ, यही इस रूप का रहस्य है। मनुष्य प्रायः यह सोचता है कि ईश्वर केवल किसी एक मूर्ति, एक शरीर, एक जाति या एक रूप में विद्यमान हैं। परंतु सत्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक जीवन मेरे ही अस्तित्व का अंश है। जो सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। नवगुंजर का यह स्वरूप इसी सत्य का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।" भगवान आगे बोले, "मुर्गे की जागरूकता, मोर की सुंदरता, सिंह का साहस, हाथी की बुद्धि, बैल का धैर्य, बाघ की शक्ति, सर्प की ऊर्जा और अन्य सभी जीवों के गुण एक ही परम सत्य में समाहित हैं। जब तक मनुष्य भेदभाव देखता है, तब तक वह मुझे पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। जब वह प्रत्येक जीव में उसी दिव्य चेतना का दर्शन करता है, तभी वह मेरे वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है।" अर्जुन का हृदय आनंद और विनम्रता से भर गया। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान वास्तव में समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। उन्होंने भगवान के उस दिव्य नवगुंजर स्वरूप की स्तुति की और पूर्ण समर्पण के साथ कहा, "हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ कि आपका स्वरूप किसी सीमा में बँधा हुआ नहीं है। आप ही समस्त प्राणियों में, समस्त जगत में और प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं।" कुछ ही क्षणों बाद वह रहस्यमय स्वरूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा। भगवान पुनः अपने मधुर मानवीय स्वरूप में प्रकट हुए। वन का वातावरण फिर सामान्य हो गया, पक्षियों का कलरव लौट आया और समय अपनी गति से चलने लगा। किंतु अर्जुन का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हो चुका था, जो केवल भगवान की विशेष कृपा से ही संभव था। समय बीतता गया। युग बदल गए। किंतु इस अद्भुत नवगुंजर स्वरूप की स्मृति विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में जीवित रही। ओड़िया साहित्य के महान कवि सरला दास द्वारा रचित सरला महाभारत में इस दिव्य प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति, समस्त जीवों की एकता और परम चेतना के प्रतीक के रूप में बताया गया है। ओडिशा की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ भी उसी अनंत और सर्वव्यापक परम तत्व के प्रतीक हैं। इसी कारण अनेक विद्वान और भक्त भगवान जगन्नाथ की परंपरा में नवगुंजर की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। विशेष रूप से श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पवित्र नीलचक्र को भगवान की अनंत, रहस्यमयी और सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अनेक श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि जैसे नवगुंजर रूप समस्त सृष्टि की एकता का संदेश देता है, वैसे ही भगवान जगन्नाथ भी किसी एक जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव-जगत के भगवान हैं। नवगुंजर की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि परमात्मा को केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीवन और संपूर्ण सृष्टि में समान रूप से विद्यमान हैं। जो व्यक्ति हर जीव में ईश्वर का दर्शन करता है, सभी के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान रखता है, वही वास्तविक भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यमय नवगुंजर स्वरूप का सबसे गहरा और सनातन संदेश है।
sn vyas
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7 days ago
#महाभारत की कथा द्वापर युग का समय था। भारतवर्ष अनेक शक्तिशाली राज्यों में विभाजित था। कहीं धर्म का शासन था तो कहीं अहंकार और सत्ता की लालसा राज कर रही थी। उसी समय विदर्भ नाम का एक समृद्ध और वैभवशाली राज्य था, जिसके राजा थे धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय भीष्मक। प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी। उनके महल में किसी वस्तु का अभाव नहीं था, परंतु उनके जीवन का सबसे बड़ा गर्व उनकी पुत्री रुक्मणी थीं। रुक्मणी केवल अद्वितीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ही नहीं थीं, बल्कि ज्ञान, विनम्रता, करुणा और धर्म पालन में भी अनुपम थीं। जो भी उन्हें देखता, यही कहता कि मानो स्वयं देवी लक्ष्मी ने मानव रूप धारण कर लिया हो। उनके स्वयंवर की चर्चा पूरे आर्यावर्त में होने लगी थी। दूर-दूर के राजा, महारथी और राजकुमार उन्हें अपनी रानी बनाने का स्वप्न देख रहे थे। लेकिन किसी को यह ज्ञात नहीं था कि रुक्मणी का हृदय पहले ही किसी और को समर्पित हो चुका था। रुक्मणी ने कभी श्रीकृष्ण को देखा नहीं था। फिर भी उनका मन उन्हीं में बस चुका था। इसका कारण था भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का श्रवण। जब-जब कोई ऋषि, ब्राह्मण, यात्री या साधु विदर्भ आता, वह मथुरा और द्वारका के उस अद्भुत पुरुष की कथाएं सुनाता जिसने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिसने असंख्य असुरों का संहार किया, जिसने धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और जो अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाते थे। रुक्मणी बड़े ध्यान से उन कथाओं को सुनतीं। धीरे-धीरे उनके मन में श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा जागी, श्रद्धा भक्ति में बदली और भक्ति प्रेम में परिवर्तित हो गई। उन्होंने मन ही मन संकल्प कर लिया कि यदि विवाह करेंगी तो केवल श्रीकृष्ण से, अन्यथा जीवन भर अविवाहित रहेंगी। उनके लिए कृष्ण केवल एक वीर राजा नहीं थे, वे उनके आराध्य, उनके स्वामी और उनके प्राणों के आधार बन चुके थे। राजा भीष्मक अपनी पुत्री के मन को समझते थे। वे स्वयं भी श्रीकृष्ण के गुणों से परिचित थे और चाहते थे कि रुक्मणी का विवाह उन्हीं से हो। लेकिन राजमहल में एक और शक्ति थी जो इस निर्णय के विरुद्ध खड़ी थी। वह था रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी। रुक्मी अत्यंत महत्वाकांक्षी और अहंकारी था। उसे श्रीकृष्ण से गहरा वैर था। वह चाहता था कि विदर्भ का संबंध उन राजाओं से बने जो कृष्ण के विरोधी थे। इसलिए उसने अपनी बहन का विवाह चेदी नरेश शिशुपाल से करने का निर्णय लिया। शिशुपाल स्वयं भी अहंकारी और अत्याचारी था, परंतु उसकी मित्रता मगध सम्राट जरासंध और अन्य शक्तिशाली राजाओं से थी। रुक्मी को यही राजनीतिक गठबंधन अधिक लाभदायक लगा। जब रुक्मणी को इस निर्णय का पता चला तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा। उनके सामने एक ओर परिवार की आज्ञा थी और दूसरी ओर उनके आराध्य श्रीकृष्ण। अंततः रुक्मणी ने वह साहसिक निर्णय लिया जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने अपने विश्वासपात्र ब्राह्मण को बुलाया और उसके हाथों श्रीकृष्ण के लिए एक गुप्त संदेश भेजा। वह पत्र किसी साधारण राजकुमारी का प्रेम-पत्र नहीं था, बल्कि एक भक्त की अपने भगवान से अंतिम पुकार थी। उसमें उन्होंने लिखा कि उन्होंने अपने मन, वचन और कर्म से श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार कर लिया है। यदि भगवान उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे तो वे किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं करेंगी। उन्होंने यह भी लिखा कि विवाह से एक दिन पूर्व वे देवी अंबिका के मंदिर में पूजा करने जाएंगी। यदि श्रीकृष्ण उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं, तो वहीं से उन्हें अपने साथ ले जाएं। अन्यथा वे अपने प्राण त्याग देंगी। पत्र के प्रत्येक शब्द में भक्ति, विश्वास और समर्पण की गहराई झलक रही थी। विश्वासपात्र ब्राह्मण कठिन यात्राएं पार करता हुआ अंततः द्वारका पहुंचा। जब उसने श्रीकृष्ण को रुक्मणी का संदेश सुनाया तो भगवान मुस्कुरा उठे। वे समझ गए कि यह केवल एक कन्या का प्रेम नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी का अपने नारायण को स्मरण है। उन्होंने ब्राह्मण का अत्यंत सम्मान किया और बिना विलंब किए विदर्भ जाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपना दिव्य रथ तैयार कराया और सारथि दारुक के साथ तीव्र गति से विदर्भ की ओर प्रस्थान किया। दूसरी ओर विदर्भ में विवाह की तैयारियां अपने चरम पर थीं। शिशुपाल अपने वैभव और सेना के साथ पहुंच चुका था। उसके साथ मगध सम्राट जरासंध, शाल्व, दंतवक्र तथा अनेक शक्तिशाली राजा भी उपस्थित थे। पूरा नगर सैनिकों से घिरा हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी युद्ध की तैयारी हो रही हो। विवाह से एक दिन पूर्व रुक्मणी देवी अंबिका के मंदिर पहुंचीं। उन्होंने देवी के चरणों में गिरकर प्रार्थना की, "हे जगदंबा! यदि मेरा प्रेम पवित्र है, यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो आज मेरे आराध्य अवश्य आएंगे।" पूजा समाप्त कर वे मंदिर से बाहर निकलीं। तभी दूर से धूल का विशाल गुबार उठा। देखते ही देखते एक दिव्य रथ बिजली की गति से मंदिर की ओर बढ़ता दिखाई दिया। रथ पर स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनका तेज देखकर लोग स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण बिना किसी भय के सीधे रुक्मणी के समीप पहुंचे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका हाथ थामा और उन्हें रथ पर बैठा लिया। यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि सैनिक और राजा कुछ समझ ही नहीं पाए। रुक्मणी ने तनिक भी विरोध नहीं किया, क्योंकि यह अपहरण नहीं था। यह उनकी प्रार्थना का उत्तर था, उनके जीवन का सबसे पवित्र क्षण था। जब शिशुपाल और अन्य राजाओं को इस घटना का समाचार मिला तो पूरा विदर्भ रणभूमि में बदल गया। शिशुपाल क्रोध से कांप उठा। जरासंध ने तुरंत अपनी सेना को आदेश दिया कि कृष्ण का पीछा किया जाए। हजारों रथ, हाथी, घोड़े और सैनिक श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ पड़े। कुछ ही समय में भयंकर युद्ध आरंभ हो गया। तभी श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम भी अपनी विशाल सेना लेकर वहां पहुंच गए। बलराम ने अपनी हल और गदा से अनेक महारथियों को परास्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने भी युद्धभूमि में ऐसा पराक्रम दिखाया कि बड़े-बड़े योद्धा उनके सामने टिक न सके। जरासंध और उसके सहयोगियों को पीछे हटना पड़ा। लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था। रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी कि यदि वह कृष्ण को पराजित किए बिना लौट आया तो कभी विदर्भ वापस नहीं जाएगा। वह अकेला ही अपनी सेना लेकर श्रीकृष्ण के पीछे निकल पड़ा। कुछ दूर जाकर उसने कृष्ण के रथ को रोक लिया और युद्ध की चुनौती दी। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। रुक्मी ने अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के सामने उसका पराक्रम टिक न सका। कुछ ही समय में उसका धनुष टूट गया, रथ नष्ट हो गया और वह भूमि पर गिर पड़ा। श्रीकृष्ण उसे दंड देने के लिए तैयार हुए। तभी रुक्मणी रथ से उतरकर भगवान के चरणों में गिर पड़ीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! यह मेरा बड़ा भाई है। इसके अपराध बड़े हैं, लेकिन कृपा करके इसके प्राण मत लीजिए।" भगवान ने रुक्मणी की करुणा का सम्मान किया। उन्होंने रुक्मी का वध नहीं किया, किंतु उसके अभिमान को तोड़ने के लिए उसका अपमान अवश्य किया। रुक्मी लज्जा से विदर्भ लौटने का साहस न कर सका और उसने एक नया नगर बसाकर वहीं जीवन व्यतीत किया। श्रीकृष्ण रुक्मणी को लेकर द्वारका पहुंचे। वहां वैदिक मंत्रों और शुभ मुहूर्त में दोनों का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। ऋषियों ने आशीर्वाद दिया और पूरी द्वारका उत्सव में डूब गई। यह केवल एक राजा और राजकुमारी का विवाह नहीं था। यह स्वयं लक्ष्मी और नारायण का पुनर्मिलन था। इसी कारण इस विवाह को दिव्य और सनातन प्रेम का प्रतीक माना जाता है। विवाह के बाद रुक्मणी द्वारका की प्रमुख महारानी बनीं। उन्होंने सदैव विनम्रता, सेवा और धर्म का पालन किया। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम इतना निष्कलंक था कि वे उनके बिना एक क्षण भी स्वयं को पूर्ण नहीं मानती थीं। एक बार श्रीकृष्ण ने परिहास करते हुए कहा कि रुक्मणी ने उनसे विवाह करके भूल कर दी है। यह सुनते ही रुक्मणी का हृदय टूट गया और वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उठाकर समझाया कि यह केवल हास्य था। इस घटना से संसार को यह ज्ञात हुआ कि रुक्मणी का प्रेम किसी सांसारिक आकर्षण पर नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति पर आधारित था। आज भी गुजरात की पवित्र नगरी द्वारका में स्थित रुक्मणी देवी मंदिर इस दिव्य कथा की स्मृति को जीवित रखे हुए है। लाखों श्रद्धालु वहां जाकर भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मणी के चरणों में प्रणाम करते हैं। यह कथा केवल एक राजकुमारी के विवाह की नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की है जिसमें एक भक्त अपने भगवान को बिना देखे भी अपना सर्वस्व मान लेता है। यह कथा सिखाती है कि जब भक्ति सच्ची हो, संकल्प अडिग हो और हृदय निर्मल हो, तब स्वयं भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए समस्त संसार को चुनौती देने में भी संकोच नहीं करते। प्रेम और भक्ति की यही शक्ति रुक्मणी हरण की इस अमर कथा को सनातन इतिहास में सदैव अमर बनाए रखती है। जय श्रीकृष्ण। जय माता रुक्मणी।
sn vyas
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9 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत के समय काशी नरेश ने अपनी तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका—का स्वयंवर आयोजित किया। उसी समय हस्तिनापुर के महान योद्धा भीष्म अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के विवाह के लिए वहाँ पहुँचे। उन्होंने अकेले ही सभी राजाओं को पराजित कर तीनों राजकुमारियों का हरण कर लिया और उन्हें हस्तिनापुर ले आए। हस्तिनापुर पहुँचकर अंबा ने भीष्म से कहा, “मैं मन ही मन राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी हूँ। कृपया मुझे उनके पास जाने दें।” भीष्म धर्म का पालन करने वाले थे। उन्होंने अंबा को सम्मानपूर्वक शाल्व के पास भेज दिया। लेकिन जब अंबा वहाँ पहुँची तो राजा शाल्व ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा, “तुम्हारा हरण भीष्म कर चुके हैं। अब मैं तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।” यह सुनकर अंबा का हृदय टूट गया। वह फिर भीष्म के पास लौटी और बोली, “मेरी यह दशा तुम्हारी वजह से हुई है। अब तुम्हें ही मुझसे विवाह करना होगा।” भीष्म ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “मैंने अपने पिता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है। मैं किसी भी परिस्थिति में विवाह नहीं कर सकता।” अब अंबा के पास कोई सहारा नहीं बचा। वह एक-एक राजा के पास न्याय की गुहार लेकर गई, लेकिन भीष्म जैसे अपराजेय योद्धा से शत्रुता मोल लेने का साहस किसी में नहीं था। अंत में वह भगवान परशुराम के पास पहुँची। परशुराम को उसकी पीड़ा पर दया आई। उन्होंने अपने शिष्य भीष्म को युद्ध की चुनौती दी। गुरु और शिष्य के बीच लगातार अट्ठाईस दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। धरती कांप उठी, देवता भी आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन अंत में कोई विजेता नहीं बना। परशुराम भी भीष्म को पराजित नहीं कर सके। अंबा समझ गई कि इस जन्म में उसे न्याय नहीं मिलेगा। उसने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। शिव प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा। अंबा ने कहा, “प्रभु! मुझे ऐसी शक्ति दें कि मैं स्वयं भीष्म के वध का कारण बन सकूँ।” भगवान शिव ने कहा, “अगले जन्म में तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।” यह सुनकर अंबा ने अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में वह राजा द्रुपद के घर शिखंडी के रूप में जन्मी। समय बीतता गया और अंततः महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ। कुरुक्षेत्र में जब शिखंडी अर्जुन के रथ के आगे खड़ा हुआ, तब भीष्म ने उसे पूर्व जन्म में स्त्री होने के कारण लक्ष्य बनाना उचित नहीं समझा। उसी अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने भीष्म पर असंख्य बाण चलाए। महान योद्धा भीष्म शरशय्या पर लेट गए और इस प्रकार अंबा का वर्षों पुराना प्रतिशोध पूरा हुआ। *शिक्षा:* अन्याय चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसका परिणाम एक दिन अवश्य सामने आता है। शक्ति के साथ न्याय, करुणा और सही निर्णय भी उतने ही आवश्यक हैं।
sn vyas
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17 days ago
कर्ण का कवच-कुंडल #महाभारत की कथा और इन्द्र का शक्ति-दान 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ महाभारत का यह प्रसंग दान, त्याग और वचन-पालन का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। इसी कारण कर्ण को आज भी "दानवीर कर्ण" के नाम से स्मरण किया जाता है। कर्ण, सूर्यदेव और माता कुंती के पुत्र थे। उनके जन्म के समय ही भगवान सूर्य ने उन्हें दिव्य कवच और कुंडल प्रदान किए थे। ये साधारण आभूषण नहीं थे, बल्कि दिव्य रक्षा-कवच थे। जब तक वे उनके शरीर पर रहते, कोई भी योद्धा उन्हें युद्ध में पराजित नहीं कर सकता था। महाभारत युद्ध निकट था। देवराज इन्द्र जानते थे कि उनका पुत्र अर्जुन और कर्ण आमने-सामने अवश्य आएँगे। उन्हें भय था कि दिव्य कवच-कुंडल के रहते अर्जुन कर्ण को कभी नहीं हरा पाएँगे। इसलिए उन्होंने कर्ण से उनका कवच-कुंडल प्राप्त करने का निश्चय किया। उधर सूर्यदेव ने स्वप्न में प्रकट होकर कर्ण को सावधान किया और कहा — «"पुत्र ! इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके तुमसे तुम्हारा कवच और कुंडल माँगेंगे। उन्हें मत देना, क्योंकि यही तुम्हारी सबसे बड़ी रक्षा है।"» कर्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया — «"यदि कोई याचक मेरे द्वार से खाली लौट जाए, तो मेरा दानवीर होना व्यर्थ है। मैं अपने वचन से कभी पीछे नहीं हटूँगा।"» कर्ण का नियम था कि वे प्रतिदिन सूर्य-पूजा के बाद किसी भी याचक को निराश नहीं लौटाते थे। एक दिन देवराज इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुँचे। उन्होंने दान में वही दिव्य कवच और कुंडल माँग लिए। कर्ण समझ गए कि यह साधारण ब्राह्मण नहीं, स्वयं देवराज इन्द्र हैं। फिर भी उन्होंने बिना किसी संकोच के अपना वचन निभाया। उन्होंने अपने शरीर से जुड़े हुए कवच और कुंडल को स्वयं काटकर निकाल लिया। शरीर से रक्त बहने लगा, असहनीय पीड़ा हुई, फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने दोनों हाथों से वह दिव्य कवच-कुंडल इन्द्र को दान कर दिए। कर्ण की अतुलनीय दानशीलता देखकर देवराज इन्द्र अत्यंत लज्जित और भाव-विभोर हो गए। उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर कहा— «"हे कर्ण ! तुम्हारे समान दानी संसार में कोई नहीं। मैं तुम्हारे त्याग से अत्यंत प्रसन्न हूँ।"» इसके बाद इन्द्र ने कर्ण को अपनी अमोघ वासवी शक्ति (एकाघ्नी शक्ति) प्रदान की। उन्होंने कहा — «"यह दिव्य अस्त्र कभी निष्फल नहीं होगा, पर इसका प्रयोग केवल एक बार ही किया जा सकता है। जिस पर यह छोड़ा जाएगा, उसका वध निश्चित होगा।"» कर्ण ने कृतज्ञतापूर्वक वह शक्ति स्वीकार कर ली। महाभारत के युद्ध में जब घटोत्कच अपनी मायावी शक्तियों से कौरव सेना का भारी विनाश करने लगे, तब दुर्योधन की रक्षा के लिए कर्ण को विवश होकर उसी वासवी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। घटोत्कच का वध तो हो गया, लेकिन कर्ण के पास अर्जुन के विरुद्ध उपयोग करने के लिए वह अमोघ अस्त्र नहीं बचा। इस प्रकार कर्ण ने अपने जीवन में दान, वचन और धर्म को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया। उनका यह त्याग आज भी भारतीय संस्कृति में दानवीरता की सर्वोच्च मिसाल माना जाता है। शिक्षा👇 - सच्चा दान वही है, जिसमें स्वार्थ का त्याग हो। - वचन का पालन महान व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण होता है। - त्याग और उदारता मनुष्य को अमर बना देते हैं। - दान का मूल्य वस्तु से नहीं, बल्कि त्याग की भावना से आँका जाता है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️