महाभारत की कथा

sn vyas
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14 hours ago
#महाभारत की कथा यह कथा द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ की संधि की है, जब कुरुक्षेत्र का मैदान रक्त से लाल हो चुका था। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने राजपाट तो संभाल लिया, लेकिन उनके अंतर्मन में शांति नहीं थी। अपने ही बंधु-बांधवों और गुरुओं के वध के कारण उन पर 'गोत्र-हत्या' और 'ब्रह्म-हत्या' का दोष था। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर, पांडव महादेव से क्षमा याचना करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए निकल पड़े। पांडव सर्वप्रथम काशी पहुँचे, लेकिन भगवान शिव पांडवों द्वारा किए गए विनाश से रुष्ट थे। वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे गुप्त रूप से हिमालय चले गए। पांडव भी हार मानने वाले नहीं थे; वे उन्हें खोजते हुए केदारखंड (वर्तमान उत्तराखंड) की ऊँचाइयों तक पहुँच गए। भगवान शिव ने पांडवों को आते देख एक बैल (वृषभ) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी के पास चर रहे पशुओं के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों को आभास हो गया कि महादेव इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने एक युक्ति अपनाई: भीम ने अपना शरीर अत्यंत विशाल किया और दो पर्वतों पर अपने पैर फैला दिए। सारे पशु भीम के पैरों के नीचे से निकल गए, लेकिन महादेव (बैल रूपी) ने एक वीर पांडव के चरणों के नीचे से निकलना स्वीकार नहीं किया। जैसे ही भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, महादेव भूमि में समाने लगे। तभी भीम ने फुर्ती दिखाते हुए बैल की कूबड़ (पीठ का भाग) को कसकर पकड़ लिया। पांडवों की इस अडिग श्रद्धा को देखकर महादेव का हृदय पिघल गया और वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें पापमुक्त कर दिया। जब महादेव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके शरीर के अंग पाँच अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए। इन पाँचों स्थानों को पांडवों ने मंदिरों के रूप में स्थापित किया 1.केदारनाथ - यहाँ बैल की पीठ के आकार की शिला पूजी जाती है। 2.तुंगनाथ - यह विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है। 3.रुद्रनाथ - यहाँ महादेव के 'नीलकंठ' मुख के दर्शन होते हैं। 4.मध्यमहेश्वर - यहाँ शिवजी के मध्य भाग की पूजा होती है। 5.कल्पेश्वर - यहाँ महादेव की जटाओं की पूजा होती है; यह वर्षभर खुला रहता है। कहा जाता है कि जब शिव जी बैल रूप में धरती में समाए, तो उनका ऊपरी भाग (सिर) नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम पशुपतिनाथ के नाम से जानते हैं। केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही स्वरूप का हिस्सा माना जाता है। पांडवों द्वारा निर्मित ये मंदिर आज भी भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बाद अन्य चार केदारों की यात्रा करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। हर हर महादेव! 🙏
sn vyas
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1 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत का महान युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी और अधर्म का अंत हो चुका था। कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत था, लेकिन उस युद्ध की स्मृतियाँ अभी भी अर्जुन के मन में जीवित थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक चमत्कार देखे थे। भगवान श्रीकृष्ण का सखा होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त था। उन्होंने युद्ध के मध्य भगवान का विराट विश्वरूप भी देखा था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था। क्या वास्तव में भगवान के सभी स्वरूपों को कोई जान सकता है? क्या उनकी लीलाएँ और रूप केवल उतने ही हैं, जितने मनुष्य देख पाता है? अर्जुन जितना भगवान के निकट आते गए, उतना ही उन्हें यह अनुभव होने लगा कि श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप अनंत, असीम और मानव बुद्धि से परे है। एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक शांत वन में बैठे थे। वातावरण अत्यंत पवित्र था। मंद-मंद वायु बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था और चारों ओर प्रकृति की अद्भुत छटा फैली हुई थी। अर्जुन भगवान के चरणों में बैठे थे। कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने विनम्र भाव से कहा, "हे माधव! मैंने आपका विराट स्वरूप देखा, आपकी अनगिनत लीलाएँ देखीं, फिर भी मेरे मन में ऐसा लगता है कि मैं आपको पूर्ण रूप से कभी जान ही नहीं पाया। आपकी महिमा अनंत है। यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे अपने किसी ऐसे दिव्य रहस्य का दर्शन कराइए, जिसे आज तक किसी ने न देखा हो।" भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने अर्जुन की ओर प्रेम से देखा। वे जानते थे कि यह प्रश्न अहंकार से नहीं, बल्कि सच्ची जिज्ञासा और भक्ति से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, "पार्थ, परमात्मा को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता। मैं केवल मनुष्य नहीं हूँ, केवल देवता नहीं हूँ, केवल विराट ब्रह्मांड भी नहीं हूँ। मैं समस्त सृष्टि में विद्यमान हूँ। यदि तुम्हारा मन वास्तव में इस सत्य को समझने के लिए तैयार है, तो आज मैं तुम्हें अपना एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमय स्वरूप दिखाऊँगा।" इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया प्रकट की। अचानक वातावरण बदलने लगा। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृक्ष स्थिर हो गए, वायु रुक गई और समय मानो थम गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान का सामान्य मानवीय स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। उनके सामने जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य से स्तब्ध रह गए। उन्होंने ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था। भगवान का यह अद्भुत स्वरूप नवगुंजर कहलाया। यह किसी एक प्राणी का शरीर नहीं था, बल्कि नौ विभिन्न जीवों के दिव्य अंगों से निर्मित था। उनके मुख पर मुर्गे का सिर था, जो जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक था। उनकी गर्दन मोर की थी, जो सौंदर्य, दिव्यता और आनंद का प्रतीक मानी जाती है। उनके शरीर पर बैल का कूबड़ था, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था। उनकी कमर सिंह की थी, जो वीरता और निर्भीकता का प्रतीक थी। उनके तीन पैर हाथी के थे, जो स्थिरता, बुद्धिमत्ता और अपार शक्ति को दर्शाते थे। चौथा पैर बाघ का था, जो साहस, गति और संकल्प का प्रतीक था। उनकी पूँछ सर्प की भाँति लहराती थी, जो समय, ऊर्जा और अनंत शक्ति का संकेत देती थी। उनके शरीर में अन्य पशु-पक्षियों के दिव्य अंग भी समाहित थे, जो समस्त जीवों की एकता का प्रतीक थे। उनके एक हाथ में पूर्ण विकसित कमल का पुष्प सुशोभित था, जो पवित्रता, ज्ञान और परम चेतना का प्रतीक था। अर्जुन कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाए कि उनके सामने कौन खड़ा है। यह कोई देवता था, कोई दिव्य प्राणी था या स्वयं प्रकृति का अद्भुत रूप? उनके हाथ अनायास ही गांडीव पर चले गए, किंतु अगले ही क्षण उनकी दृष्टि भगवान के हाथ में धारण किए हुए कमल पर पड़ी। उसी क्षण उनके हृदय में दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने उस रूप से वही करुणा, वही प्रेम और वही अनंत तेज अनुभव किया, जो सदैव भगवान श्रीकृष्ण से अनुभव होता था। अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण का एक अत्यंत रहस्यमय दिव्य स्वरूप है। अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव नीचे रख दिया। वे दोनों हाथ जोड़कर भगवान के चरणों में झुक गए। उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं वास्तव में आपको कभी जान ही नहीं पाया। आप किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं। आपकी महिमा तो अनंत है।" भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में कहा, "पार्थ, यही इस रूप का रहस्य है। मनुष्य प्रायः यह सोचता है कि ईश्वर केवल किसी एक मूर्ति, एक शरीर, एक जाति या एक रूप में विद्यमान हैं। परंतु सत्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक जीवन मेरे ही अस्तित्व का अंश है। जो सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। नवगुंजर का यह स्वरूप इसी सत्य का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।" भगवान आगे बोले, "मुर्गे की जागरूकता, मोर की सुंदरता, सिंह का साहस, हाथी की बुद्धि, बैल का धैर्य, बाघ की शक्ति, सर्प की ऊर्जा और अन्य सभी जीवों के गुण एक ही परम सत्य में समाहित हैं। जब तक मनुष्य भेदभाव देखता है, तब तक वह मुझे पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। जब वह प्रत्येक जीव में उसी दिव्य चेतना का दर्शन करता है, तभी वह मेरे वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है।" अर्जुन का हृदय आनंद और विनम्रता से भर गया। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान वास्तव में समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। उन्होंने भगवान के उस दिव्य नवगुंजर स्वरूप की स्तुति की और पूर्ण समर्पण के साथ कहा, "हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ कि आपका स्वरूप किसी सीमा में बँधा हुआ नहीं है। आप ही समस्त प्राणियों में, समस्त जगत में और प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं।" कुछ ही क्षणों बाद वह रहस्यमय स्वरूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा। भगवान पुनः अपने मधुर मानवीय स्वरूप में प्रकट हुए। वन का वातावरण फिर सामान्य हो गया, पक्षियों का कलरव लौट आया और समय अपनी गति से चलने लगा। किंतु अर्जुन का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हो चुका था, जो केवल भगवान की विशेष कृपा से ही संभव था। समय बीतता गया। युग बदल गए। किंतु इस अद्भुत नवगुंजर स्वरूप की स्मृति विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में जीवित रही। ओड़िया साहित्य के महान कवि सरला दास द्वारा रचित सरला महाभारत में इस दिव्य प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति, समस्त जीवों की एकता और परम चेतना के प्रतीक के रूप में बताया गया है। ओडिशा की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ भी उसी अनंत और सर्वव्यापक परम तत्व के प्रतीक हैं। इसी कारण अनेक विद्वान और भक्त भगवान जगन्नाथ की परंपरा में नवगुंजर की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। विशेष रूप से श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पवित्र नीलचक्र को भगवान की अनंत, रहस्यमयी और सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अनेक श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि जैसे नवगुंजर रूप समस्त सृष्टि की एकता का संदेश देता है, वैसे ही भगवान जगन्नाथ भी किसी एक जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव-जगत के भगवान हैं। नवगुंजर की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि परमात्मा को केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीवन और संपूर्ण सृष्टि में समान रूप से विद्यमान हैं। जो व्यक्ति हर जीव में ईश्वर का दर्शन करता है, सभी के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान रखता है, वही वास्तविक भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यमय नवगुंजर स्वरूप का सबसे गहरा और सनातन संदेश है।
sn vyas
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6 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 456) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनमेजय उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः ।। १ ।। जनमेजय ने पूछा- द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ।। २ ।। रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च । पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ।। ३ ।। चेरुर्भेक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते । बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ।। ४ ।। जनमेजय ! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणों के कारण वे सभी नागरिकों के प्रीति-पात्र हो गये थे ।। ३-४ ।। (दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः । भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ।। सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः । कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ।। बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः । भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ।। मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः । माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः । त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ।।) उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे - 'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी-यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे। निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि । तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ।। ५ ।। प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक् पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ।। ५ ।। अर्ध ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः । अर्ध सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ।। ६ ।। वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ।। ६ ।। तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्र महात्मनाम् । अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ।। ७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ।। ७ ।। ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः । संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथया सह ।। ८ ।। तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ।। ८ ।। अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने । भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ।। ९ ।। भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना ।। ९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
Saurabh Bhatia
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18 days ago
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