पौराणिक अनसुनी कहानियाँ

sn vyas
2.9K views
23 hours ago
#पौराणिक कथा राजा भरथरी ने सन्यास क्यों लिया था? उज्जैन में भरथरी की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा। यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है। पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :- उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे। कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी। यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी। राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी। भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है। उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’ शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए। गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो। ‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’। अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’ गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’
sn vyas
548 views
1 days ago
#जय श्री कृष्ण #पौराणिक कथा कंस वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी को वेद-शास्त्र, धनुर्विद्या और ६४ कलाओं का अध्ययन करने के लिए उज्जयिनी (उज्जैन) में अवंतिका नगरी के परम ज्ञानी महर्षि सांदीपनि के आश्रम में भेजा गया साक्षात सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान श्रीकृष्ण ने एक साधारण शिष्य की भांति गुरु सांदीपनि की सेवा की—लकड़ियाँ चुनीं, आश्रम की सफाई की और केवल ६४ दिनों में संपूर्ण वेद, शास्त्र और ६४ कलाओं में निपुणता प्राप्त कर ली। शिक्षा पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण और बलराम जी हाथ जोड़कर गुरु सांदीपनि के सामने खड़े हुए और बोले: "हे गुरुदेव! आपने हमें संपूर्ण विद्याएँ प्रदान की हैं। अब कृपा करके अपनी मनोवांछित गुरु-दक्षिणा माँगिए।" महर्षि सांदीपनि जानते थे कि ये दोनों बालक साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि साक्षात जगन्नायक हैं। उन्होंने अपनी पत्नी (गुरुमाता) से परामर्श किया गुरुमाता की आँखों में अश्रु आ गए। उन्होंने कहा: "कई वर्ष पूर्व हमारा इकलौता पुत्र प्रभास-क्षेत्र (समुद्र तट) में स्नान करते समय एक प्रचंड समुद्री लहर में बह गया था और उसका कोई पता नहीं चला। यदि ये सर्वसमर्थ हैं, तो मुझे मेरा 'मृत पुत्र' वापस ला दें। यही हमारी गुरु-दक्षिणा होगी। श्रीकृष्ण और बलराम जी तुरंत अपने रथ पर सवार होकर प्रभास-क्षेत्र (समुद्र तट) पहुँचे समुद्र देव ने प्रकट होकर प्रणाम किया। जब श्रीकृष्ण ने गुरुपुत्र के बारे में पूछा, तो समुद्र देव ने कांपते हुए कहा: "हे प्रभु! मैंने उस बालक का हरण नहीं किया। मेरे जल में 'पांचजन्य' नाम का एक भयानक असुर रहता है, जो शंख के रूप में रहता है। वही उस बालक को निगल गया था श्रीकृष्ण ने तुरंत समुद्र में प्रवेश करके उस पंचजन असुर का वध कर दिया और उसके पेट की जाँच की, परंतु गुरुपुत्र वहाँ नहीं मिला। प्रभु ने उस असुर की अस्थियों से बना हुआ अलौकिक 'पांचजन्य शंख' अपने पास रख लिया। जब बालक समुद्र में नहीं मिला, तो श्रीकृष्ण और बलराम जी समझ गए कि उसकी मृत्यु हो चुकी है। वे सीधे साक्षात यमराज की नगरी 'संयमनी पुरी' (यमलोक) पहुँचे वहाँ पहुँचकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपना 'पांचजन्य शंख' फूंका। शंख की गूंज से संपूर्ण यमलोक कांप उठा यमराज स्वयं दौड़ते हुए आए और भगवान के चरणों में गिर पड़े। यमराज ने हाथ जोड़कर कहा: हे सर्वेश्वर! हे अच्युत! इस यमलोक में आपका आगमन कैसे हुआ? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? भगवान श्रीकृष्ण ने दृढ़ स्वर में कहा: "हे यमराज! हमारे गुरुदेव सांदीपनि का बालक अपने कर्म-चक्र के कारण तुम्हारे वश में आकर यहाँ आया है। तुम तुरंत उस बालक की आत्मा को उसके पूर्व शरीर के साथ हमारे हवाले कर दो! यमराज ने कहा—"हे प्रभु! काल और कर्म के सिद्धांत के अनुसार जो एक बार यहाँ आ जाता है, वह वापस नहीं लौट सकता। परंतु आपकी आज्ञा ही काल और कर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत है। यमराज ने तुरंत उस बालक की आत्मा को पुनः जीवित करके सुंदर, दिव्य शरीर के साथ भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दिया। श्रीकृष्ण और बलराम जी अपने गुरुपुत्र को रथ में बैठाकर वापस उज्जैन में गुरु सांदीपनि के आश्रम पहुँचे। जब गुरु सांदीपनि और गुरुमाता ने अपने मृत पुत्र को हँसते-खेलते जीवित वापस देखा, तो उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले। उन्होंने अपने पुत्र को छाती से लगा लिया और श्रीकृष्ण-बलराम को गद्गद होकर आशीर्वाद दिया हे कृष्ण! तुमने संसार में गुरु-भक्ति का सबसे महान आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारे द्वारा सीखी गई विद्याएँ सदा अमर रहेंगी और तीनों लोकों में तुम्हारी यह गुरु-दक्षिणा युगों-युगों तक गाई जाएगी। !! जय श्री कृष्णा!!
sn vyas
606 views
1 days ago
#पौराणिक कथा दैत्यराज बलि के वंश में जन्मा बाणासुर अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी असुर था। वह हजार भुजाओं का स्वामी था और अपनी शक्ति के कारण तीनों लोकों में उसका नाम भय के साथ लिया जाता था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी विशेषता केवल उसकी शक्ति नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उसकी गहरी भक्ति थी। बाणासुर ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए ऐसी कठोर तपस्या की कि देवता तक उसकी तपस्या देखकर आश्चर्यचकित हो गए। वह लंबे समय तक भगवान शिव का ध्यान करता रहा और अपने मन, वचन और कर्म से स्वयं को महादेव के चरणों में समर्पित कर दिया। कहा जाता है कि जब भगवान शिव तांडव करते थे, तब बाणासुर अपनी हजारों भुजाओं से अलग-अलग वाद्य यंत्र बजाकर महादेव की स्तुति करता था। उसकी भक्ति में इतनी तीव्रता थी कि स्वयं भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए। महादेव ने प्रसन्न होकर कहा, “बाण, मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, तुम्हें क्या वरदान चाहिए?” बाणासुर ने अपने लिए असाधारण शक्ति और हजार भुजाओं का वरदान मांगा। भगवान शिव ने उसकी इच्छा पूरी कर दी। बाणासुर की शक्ति इतनी बढ़ गई कि वह स्वयं को अजेय समझने लगा। महादेव ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी नगरी शोणितपुर की रक्षा करने का भी वचन दिया। लेकिन यहीं से बाणासुर के जीवन में भक्ति के साथ अहंकार का प्रवेश हुआ। जिस शक्ति ने उसे भगवान का प्रिय भक्त बनाया था, वही शक्ति धीरे-धीरे उसके अभिमान का कारण बनने लगी। उसे लगने लगा कि तीनों लोकों में उसके समान शक्तिशाली कोई नहीं है। देवता उससे भयभीत रहने लगे और अनेक राजा उसके नाम मात्र से कांपने लगे। बाणासुर के पास हजार भुजाएं थीं, लेकिन उसके मन में एक शिकायत रहने लगी थी। उसके पास युद्ध करने की शक्ति तो थी, लेकिन उसके सामने कोई ऐसा योद्धा नहीं था जो उसकी शक्ति को चुनौती दे सके। एक दिन बाणासुर भगवान शिव के सामने पहुंचा और बोला, “हे महादेव, आपने मुझे हजार भुजाओं का वरदान तो दे दिया, लेकिन अब यही भुजाएं मेरे लिए बोझ बन गई हैं। मेरे पास युद्ध करने की शक्ति है, पर ऐसा कोई योद्धा नहीं जो मेरे सामने टिक सके। मैं किससे युद्ध करूं?” भगवान शिव ने उसके शब्दों में छिपा अहंकार पहचान लिया। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बाण, तुम्हारा समय आने वाला है। जिस दिन तुम्हारे महल की ध्वजा बिना किसी प्रयास के टूटकर गिर जाएगी, उसी दिन समझ लेना कि तुम्हारा वास्तविक प्रतिद्वंद्वी तुम्हारे सामने आने वाला है।” बाणासुर ने महादेव के वचन को सुना, लेकिन अपने अहंकार में उसे भी अपनी विजय का संकेत समझ लिया। उसे क्या पता था कि भगवान शिव के मुख से निकले ये शब्द उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा की शुरुआत हैं। उधर बाणासुर की एक अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान पुत्री थी, जिसका नाम था उषा। उषा अपने पिता की शक्ति और वैभव के बीच पली-बढ़ी थी, लेकिन उसके हृदय में संसार की शक्ति और राजसी वैभव से अधिक प्रेम और भावनाओं का स्थान था। वह अपने महल के ऊंचे कक्षों में बैठकर अक्सर दूर आकाश को देखा करती थी। उसे नहीं पता था कि उसके जीवन में ऐसा प्रेम आने वाला है जो उसके पिता के साम्राज्य और भगवानों के बीच भीषण संघर्ष का कारण बनेगा। एक रात उषा ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। स्वप्न में उसने एक तेजस्वी युवक को देखा। उसका चेहरा दिव्य था, आंखों में असाधारण शांति थी और उसके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था जिसे उषा शब्दों में समझा नहीं सकती थी। वह युवक उसके सामने आया और दोनों के बीच ऐसा भाव उत्पन्न हुआ मानो वे एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों। कुछ ही क्षणों बाद उषा की आंख खुल गई। लेकिन उसका मन उसी युवक की स्मृति में अटक गया। सुबह होते ही उषा बेचैन हो उठी। वह बार-बार उसी युवक का चेहरा याद करने लगी। उसने अपनी प्रिय सखी चित्रलेखा को बुलाया और कहा, “मैंने रात में एक अद्भुत युवक को देखा है। मैं उसका नाम नहीं जानती, उसका राज्य नहीं जानती और यह भी नहीं जानती कि वह कौन है। लेकिन मेरे मन में ऐसा लगता है जैसे मेरा हृदय उसी का हो चुका है।” चित्रलेखा केवल उषा की सखी ही नहीं, बल्कि चित्रकला और योगविद्या में भी अत्यंत निपुण थी। उसने उषा से कहा, “यदि तुमने उसे देखा है तो मैं उसका चेहरा बनाकर तुम्हें दिखा सकती हूं। शायद हम उसके बारे में पता लगा सकें।” चित्रलेखा ने अनेक राजाओं, देवताओं और योद्धाओं के चित्र बनाए। उषा हर चित्र को ध्यान से देखती, लेकिन हर बार सिर हिला देती। फिर चित्रलेखा ने यादव वंश के वीरों के चित्र बनाने शुरू किए। जब उसने एक तेजस्वी युवक का चित्र बनाया, तो उषा अचानक ठिठक गई। उसके चेहरे पर लज्जा और आश्चर्य एक साथ दिखाई देने लगे। उसने चित्र की ओर देखते हुए कहा, “यही है… यही वह युवक है जिसे मैंने स्वप्न में देखा था।” चित्रलेखा ने पूछा, “क्या तुम निश्चित हो?” उषा ने धीरे से कहा, “हां, यही है। मेरा हृदय इसे पहचानता है।” वह युवक कोई साधारण राजकुमार नहीं था। वह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र और प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध थे। अनिरुद्ध यादव वंश के अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी योद्धा थे। उषा के मन में उनके प्रति प्रेम जाग चुका था, लेकिन वह उनसे कभी मिली तक नहीं थी। चित्रलेखा ने अपनी योगविद्या के बल पर अनिरुद्ध का पता लगाया और कथा के अनुसार उन्हें शोणितपुर ले आई। जब अनिरुद्ध की आंख खुली तो उन्होंने स्वयं को एक अनजान स्थान पर पाया। सामने उषा खड़ी थी। दोनों की आंखें मिलीं और जैसे उषा के स्वप्न की दुनिया वास्तविकता बन गई। दोनों के बीच प्रेम का संबंध स्थापित हुआ। कुछ समय तक यह बात गुप्त रही, लेकिन महल में छिपी कोई बात हमेशा छिपी नहीं रहती। बाणासुर को जब पता चला कि उसकी पुत्री के महल में एक अजनबी युवक मौजूद है, तो वह क्रोधित हो उठा। सैनिकों को आदेश दिया गया कि उस युवक को पकड़ लिया जाए। अनिरुद्ध ने अकेले ही बाणासुर के सैनिकों का सामना किया और अपनी वीरता का परिचय दिया। उन्होंने अनेक योद्धाओं को परास्त कर दिया। लेकिन अंततः बाणासुर की विशाल शक्ति और उसके असंख्य सैनिकों ने अनिरुद्ध को घेर लिया। उन्हें बंदी बना लिया गया। जब यह समाचार द्वारका पहुंचा कि अनिरुद्ध लापता हैं, तो श्रीकृष्ण और यादवों को चिंता हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पौत्र की खोज शुरू की। तभी उन्हें पता चला कि अनिरुद्ध शोणितपुर में बाणासुर के कब्जे में हैं। यह सुनते ही श्रीकृष्ण ने यादव सेना के साथ शोणितपुर की ओर प्रस्थान किया। उधर बाणासुर को यह पता चला कि श्रीकृष्ण स्वयं उसकी नगरी की ओर बढ़ रहे हैं। उसके भीतर फिर वही अहंकार जाग उठा। उसे लगा कि उसके पास स्वयं भगवान शिव का संरक्षण है, हजार भुजाओं की शक्ति है और उसकी नगरी अभेद्य है। उसने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। शोणितपुर की सीमाओं पर विशाल सेना खड़ी कर दी गई। जब श्रीकृष्ण की सेना शोणितपुर पहुंची, तब भयंकर युद्ध शुरू हुआ। यादवों और बाणासुर की सेना के बीच घमासान संघर्ष होने लगा। धरती रणभूमि में बदल गई। शंखनाद हुआ, धनुषों की टंकार गूंजी और दोनों पक्षों के योद्धा अपनी पूरी शक्ति से युद्ध करने लगे। बाणासुर स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसकी हजार भुजाओं में असंख्य अस्त्र-शस्त्र चमक रहे थे। लेकिन इस युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बाणासुर अकेला नहीं था। उसके पक्ष में स्वयं भगवान शिव खड़े थे। महादेव अपने भक्त के प्रति दिए गए वचन के कारण उसकी रक्षा कर रहे थे। भगवान शिव और श्रीकृष्ण आमने-सामने आए तो देवताओं तक के हृदय में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। यह किसी सामान्य युद्ध जैसा नहीं था। एक ओर महादेव थे और दूसरी ओर स्वयं श्रीकृष्ण। भगवान शिव ने अपने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया और श्रीकृष्ण ने भी उनका सामना किया। कथा के अनुसार दोनों के बीच ऐसा दिव्य संघर्ष हुआ जिसे देखकर देवता भी स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण ने अंततः बाणासुर की सेना को परास्त करना शुरू कर दिया। बाणासुर ने अपनी हजारों भुजाओं से लगातार युद्ध किया, लेकिन धीरे-धीरे उसकी शक्ति कमजोर पड़ने लगी। तभी श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ बाणासुर की ओर बढ़ा और उसकी अनेक भुजाओं को काटता चला गया। जो बाणासुर अपनी हजारों भुजाओं पर गर्व करता था, उसकी शक्ति देखते ही देखते समाप्त होने लगी। उसके भीतर का अहंकार भी टूटने लगा। जब बाणासुर की अंतिम कुछ भुजाएं ही बचीं, तब भगवान शिव ने देखा कि उनका भक्त अब मृत्यु के निकट है। महादेव ने श्रीकृष्ण के सामने आकर अपने भक्त के लिए प्रार्थना की। उन्होंने कहा, “हे प्रभु, बाणासुर ने अपराध किए हैं और उसके भीतर अहंकार भी आया है, लेकिन वह मेरा भक्त है। मैंने उसकी रक्षा का वचन दिया है। कृपया उसे क्षमा कर दीजिए।” यही वह क्षण था जब भगवान शिव ने अपने भक्त के लिए श्रीकृष्ण के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की। बाणासुर भी अब समझ चुका था कि उसकी शक्ति, उसकी हजार भुजाएं और उसका अभिमान उसे बचाने में सक्षम नहीं हैं। उसे अपने किए हुए कर्मों का बोध हो चुका था। वह श्रीकृष्ण के सामने झुक गया। श्रीकृष्ण ने महादेव की ओर देखा और कहा, “महादेव, मैं आपके वचन का सम्मान करता हूं। बाणासुर का अहंकार टूट चुका है। मैंने उसकी शक्ति का अंत किया है, उसके प्राणों का नहीं। आपका भक्त होने के कारण मैं उसे जीवनदान देता हूं।” भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर को क्षमा कर दिया और उसकी बची हुई भुजाओं को रहने दिया। बाणासुर की आंखों से आंसू बहने लगे। जिस शक्ति पर उसे गर्व था, वही शक्ति उससे छीन ली गई थी, लेकिन उसी क्षण उसे सबसे बड़ा ज्ञान मिला। उसने श्रीकृष्ण के चरणों में झुककर कहा, “प्रभु, आज मुझे समझ में आ गया कि शक्ति का अर्थ दूसरों को दबाना नहीं है। मेरी भक्ति में अहंकार मिल गया था और मैं अपने ही वरदान का दुरुपयोग करने लगा था। आपने मेरी भुजाएं काटकर मेरे अहंकार को काट दिया।” उषा और अनिरुद्ध का मिलन भी अब स्वीकार कर लिया गया। बाणासुर ने अपनी पुत्री के प्रेम को समझा और अनिरुद्ध को सम्मान के साथ स्वीकार किया। इस प्रकार जिस प्रेम ने युद्ध को जन्म दिया था, वही अंत में दो परिवारों को एक रिश्ते में जोड़ने का कारण बना। इस कथा में भगवान शिव और श्रीकृष्ण के बीच किसी वैर का संदेश नहीं है। इसके विपरीत यह कथा भक्त और भगवान के संबंध, वचन की मर्यादा और अहंकार के परिणाम को समझाने वाली पौराणिक परंपरा का हिस्सा है। भगवान शिव ने अपने भक्त के लिए वचन निभाया और भगवान श्रीकृष्ण ने महादेव के वचन का सम्मान करते हुए बाणासुर को क्षमा कर दिया। यही इस कथा का सबसे सुंदर पक्ष है कि देवताओं के बीच संघर्ष दिखाई देने पर भी अंत में धर्म, करुणा और भक्त के कल्याण की ही विजय होती है। बाणासुर के पास हजार भुजाएं थीं, लेकिन वह अपने अहंकार को नहीं संभाल पाया। श्रीकृष्ण ने उसकी भुजाओं की शक्ति कम कर दी, लेकिन उसे जीवन का अवसर दिया। महादेव ने अपने भक्त के लिए प्रार्थना की, लेकिन उसके अहंकार का समर्थन नहीं किया। और बाणासुर ने अंततः समझ लिया कि भगवान से मिला वरदान तभी कल्याणकारी होता है जब उसके साथ विनम्रता भी हो। इसलिए बाणासुर की कथा हमें यह याद दिलाती है कि भक्ति के साथ यदि अहंकार जुड़ जाए तो वही भक्ति मनुष्य को पतन की ओर ले जा सकती है। लेकिन जब भक्त अपनी भूल स्वीकार कर ले और भगवान की शरण में लौट आए, तो क्षमा का मार्ग भी खुल सकता है। सच्ची शक्ति वही है जो विनम्रता सिखाए, सच्ची भक्ति वही है जो अहंकार मिटाए और सच्चा भगवान वही है जो भक्त की भूल के बाद भी उसके सुधार का अवसर देता है। यही कारण है कि बाणासुर की कथा आज भी केवल युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम, वचन, अहंकार और क्षमा की अद्भुत पौराणिक गाथा के रूप में सुनाई जाती है। जय श्री कृष्ण। हर हर महादेव।
sn vyas
490 views
1 days ago
#पौराणिक कथा इस कथा को खूब मन से पढ़े : प्राचीन काल में 'क्षुप' नाम के एक अत्यंत शक्तिशाली और धर्मनिष्ठ राजा हुए, जो ब्रह्मा जी के पुत्र 'रुचि' के वंशज थे। वहीं दूसरी ओर, 'दधीचि' महर्षि भृगु के पौत्र और ऋषि अथर्वा के पुत्र थे। वे अत्यंत तपस्वी, निष्पाप और साक्षात वेद-ज्ञान के पुंज थे। प्रारंभ में राजा क्षुप और महर्षि दधीचि के बीच अटूट मित्रता थी। दोनों प्रायः एक-दूसरे के आश्रम व महल में आया-जाया करते थे और धर्म-चर्चा करते थे। एक बार राजसभा में अनेक ऋषियों और मंत्रियों के सामने राजा क्षुप और महर्षि दधीचि में श्रेष्ठता को लेकर बहस छिड़ गई: राजा क्षुप अपने राजसी वैभव के मद में बोले—हे ऋषिवर! शास्त्रों में राजा को आठों लोकपालों (इंद्र, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, वायु, कुबेर, चंद्रमा) के अंश से निर्मित माना गया है। राजा ही प्रजा का रक्षक है और राजा के भय से ही धर्म टिका है। इसलिए राजा वर्णों में सबसे श्रेष्ठ है और ब्राह्मणों को भी राजा का आदर करना चाहिए। दधीचि जी ने अत्यंत शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा—हे राजन्! आपका विचार गलत है। राजा का कार्य केवल भौतिक राज्य की सुरक्षा करना है, परंतु ब्राह्मण (ऋषि) अपने तपोबल, त्याग और वेदों के ज्ञान से संपूर्ण ब्रह्मांड का मार्गदर्शन करते हैं। राजा तो स्वयं ऋषियों के आशीर्वाद से सत्ता पाता है। इसलिए 'ज्ञान और तपोबल' सदा सत्ता और धनबल से ऊपर होता है। तर्क-वितर्क इतना बढ़ा कि राजा क्षुप आपा खो बैठे। उन्होंने अहंकार में आकर अपना वज्र जैसा हाथ उठाकर महर्षि दधीचि के मस्तक पर भयंकर प्रहार कर दिया दधीचि जी ने भी प्रत्युत्तर में अपनी मुट्ठी बाँधकर राजा क्षुप की छाती पर ऐसा मुक्का मारा कि राजा मूर्छित होकर सिंहासन से नीचे गिर पड़े मूर्छा से उठते ही राजा क्षुप अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी तीखी तलवार निकाली और क्षण भर का विचार किए बिना महर्षि दधीचि का मस्तक काट दिया। दधीचि जी का शरीर कटकर दो टुकड़ों में धरती पर गिर पड़ा। मरते-मरते महर्षि दधीचि ने अपने आध्यात्मिक बल से दैत्यगुरु शुक्राचार्य का ध्यान किया। शुक्राचार्य जी भगवान शिव की उग्र तपस्या करके 'संजीवनी विद्या' (मृतक को जीवित करने का ज्ञान) प्राप्त कर चुके थे शुक्राचार्य जी तुरंत वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने दधीचि के कटे हुए मस्तक और धड़ को आपस में जोड़ा और संजीवनी मंत्र का जप करके महर्षि दधीचि को पुनः जीवित कर दिया। जीवित होने पर दधीचि जी फिर से क्षुप से युद्ध करने जाने लगे, परंतु शुक्राचार्य जी ने उन्हें रोक लिया और कहा: "हे दधीचि! राजा क्षुप ने भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की है और विष्णु जी उनकी रक्षा करते हैं। जब तक तुम्हारे पास भगवान शिव का अजेय तपोबल नहीं होगा, तुम विष्णु के भक्त को परास्त नहीं कर सकोगे। इसलिए तुम वन में जाकर साक्षात भगवान शिव की शरण लो। शुक्राचार्य का उपदेश मानकर महर्षि दधीचि घने वन में चले गए। वहाँ उन्होंने पार्थिव (मिट्टी का) शिवलिंग बनाकर 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का निरंतर जप और घोर तपस्या की। दधीचि की निष्काम और उग्र भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान आशुतोष (शिव) भगवती पार्वती के साथ प्रकट हुए और बोले—"हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ, मनोवांछित वर माँगो।" दधीचि जी ने हाथ जोड़कर तीन वरदान माँगे: मेरी हड्डियां (अस्थियाँ) वज्र से भी अधिक कठोर हो जाएँ, जिस पर संसार का कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रहार न कर सके। मुझे देवताओं, दैत्यों, नागों या मनुष्यों में से कोई भी पराजित न कर सके। मेरे जीवन में कभी दीनता (लाचारी या बेबसी) न आए। भगवान शिव ने "एवमस्तु" (ऐसा ही हो) कहा और अंतर्ध्यान हो गए। शिव जी से वरदान पाकर महर्षि दधीचि सीधे राजा क्षुप के महल पहुँचे। उन्होंने राजा के मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया। क्रोधित होकर राजा क्षुप ने दधीचि पर अनेक दिव्य अस्त्र, तोमर और बाण चलाए, परंतु दधीचि के शरीर से टकराते ही सारे अस्त्र-शस्त्र खिलौनों की तरह टूटकर गिर पड़े जब राजा क्षुप को समझ आया कि वे अपनी शक्ति से दधीचि को नहीं हरा सकते, तो वे बैकुंठ पहुँचे और अपने इष्ट भगवान श्रीविष्णु की शरण में जाकर रोने लगे। भगवान विष्णु ने अपनी अंतर्दृष्टि से देखा कि दधीचि को भगवान शिव का अभेद्य वरदान प्राप्त है। श्रीविष्णु ने राजा क्षुप से कहा—"हे राजन्! शिव-भक्त दधीचि को कोई पराजित नहीं कर सकता। परंतु तुमने मेरी शरण ली है, इसलिए मैं तुम्हारा मान रखने के लिए स्वयं युद्ध-स्थल पर चलूँगा। भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके महर्षि दधीचि के पास पहुँचे और उनसे दान में 'अभय' (जीवन-रक्षा) माँगने लगे। दधीचि जी अंतर्यामी थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा: "हे जनार्दन! आप अपने भक्त क्षुप की रक्षा के लिए वृद्ध ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करके आए हैं? आप तो साक्षात भगवान विष्णु हैं। आपको रूप बदलने की आवश्यकता नहीं है, आप जो चाहें मुझसे साक्षात माँग सकते हैं। मैं शिव-कृपा से पूरी तरह निर्भय हूँ। भगवान विष्णु अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। जब दधीचि ने राजा क्षुप के समक्ष झुकने से मना कर दिया, तो भगवान विष्णु ने दधीचि को डराने और राजा की प्रतिज्ञा रखने के लिए युद्ध शुरू कर दिया। भगवान विष्णु ने अपने दाहिने हाथ में अत्यंत उग्र और प्रज्वलित 'सुदर्शन चक्र' धारण किया और उसे महर्षि दधीचि पर चला दिया। सुदर्शन चक्र प्रलय की अग्नि उगलता हुआ तेज़ी से महर्षि दधीचि की छाती की ओर बढ़ा। परंतु जैसे ही वह चक्र दधीचि के शरीर के पास पहुँचा, भगवान शिव के दिए वरदान के कारण सुदर्शन चक्र की धार कुंठित (ठिठक) हो गई! वह चक्र दधीचि का एक बाल भी बाँका न कर सका और उनके चरणों में गिर पड़ा। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपना अत्यंत भयानक 'वैष्णवास्त्र' और ब्रह्मा जी का 'ब्रह्मास्त्र' चलाया, परंतु महर्षि दधीचि के तपोबल की प्रचंड ज्वाला के सामने सारे दिव्य अस्त्र-शस्त्र जलकर शांत हो गए। तभी दधीचि के तपोबल से अनेक शिवदूत और शक्तियाँ प्रकट हो गईं, जिससे पूरी सेना भयभीत हो गई। जब युद्ध भयंकर रूप लेने लगा, तब साक्षात ब्रह्मा जी वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने भगवान विष्णु और महर्षि दधीचि दोनों को शांत किया। ब्रह्मा जी ने राजा क्षुप से कहा: "हे क्षुप! तुम्हारा यह अहंकार व्यर्थ है कि राजा सबसे बड़ा होता है। देखो, साक्षात श्रीविष्णु के अस्त्र भी दधीचि के तपोबल के सामने निष्फल हो गए। ज्ञान, त्याग और शिव-भक्ति से बढ़कर इस संसार में कोई सत्ता नहीं है। तुम्हें महर्षि दधीचि से क्षमा माँगनी चाहिए। राजा क्षुप का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। वे तुरंत दधीचि जी के चरणों में गिर पड़े और अश्रु बहाते हुए क्षमा माँगने लगे। परम दयालु महर्षि दधीचि ने राजा क्षुप को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। उन्होंने कहा—"हे राजन्! मेरा आपसे कोई व्यक्तिगत वैर नहीं था, मैं केवल सत्य की रक्षा कर रहा था दोनों मित्रों का पुराना प्रेम पुनः लौट आया और राजा क्षुप ने दधीचि जी को अपना गुरु स्वीकार किया। !!जय श्री कृष्णा!!
sn vyas
546 views
1 days ago
#पौराणिक कथा #भगवान विष्णु हर कोई भगवान राम और श्रीकृष्ण के अवतारों के बारे में जानता है, लेकिन भगवान विष्णु के एक ऐसे अद्भुत अवतार की कथा बहुत कम लोग जानते हैं, जिनका संबंध सीधे वेदों, ज्ञान और सृष्टि के मूल रहस्य से जुड़ा हुआ माना जाता है। यह कथा है भगवान हयग्रीव की, जिनका स्वरूप इतना अद्भुत था कि उनका शरीर दिव्य पुरुष का और मुख एक श्वेत अश्व यानी सफेद घोड़े के समान था। पुराणों की विभिन्न परंपराओं में हयग्रीव अवतार की कथा के अलग-अलग रूप मिलते हैं, लेकिन मुख्य भाव यही है कि भगवान विष्णु ने ज्ञान और वेदों की रक्षा के लिए यह दिव्य रूप धारण किया। यह वही समय था जब सृष्टि का विस्तार प्रारंभ हो रहा था और ब्रह्मा जी को संसार की रचना का महान दायित्व सौंपा गया था। सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा जी कमल पर विराजमान होकर भगवान की आज्ञा से सृष्टि की रचना में लगे हुए थे। उनके पास वे दिव्य ज्ञान था जिसके आधार पर जीवों, देवताओं, ऋषियों और समस्त संसार की व्यवस्था स्थापित होनी थी। यही ज्ञान वेदों में निहित था। वेद केवल कुछ मंत्रों का संग्रह नहीं थे, बल्कि उस समय की धार्मिक और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का मूल ज्ञान माने जाते थे। ब्रह्मा जी इसी दिव्य ज्ञान के आधार पर सृष्टि के नियमों को व्यवस्थित कर रहे थे। इसी समय मधु और कैटभ नाम के दो अत्यंत शक्तिशाली असुरों का प्रकट होना हुआ। दोनों असुरों में असाधारण बल था और उनके भीतर देवताओं के प्रति घोर विरोध की भावना थी। उन्होंने जब देखा कि ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना में लगे हुए हैं और उनके पास वेदों का दिव्य ज्ञान है, तो उनके मन में उन वेदों को प्राप्त करने की इच्छा जाग उठी। कथा के अनुसार दोनों असुरों ने वेदों को ब्रह्मा जी से छीन लिया और उन्हें लेकर गहरे जल अथवा पाताल लोक की ओर चले गए। वेदों के अचानक लुप्त हो जाने से ब्रह्मा जी अत्यंत चिंतित हो उठे। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वेदों के बिना सृष्टि की व्यवस्था कैसे चलेगी। सृष्टि की रचना केवल भौतिक पदार्थों से नहीं हो सकती थी। उसके लिए धर्म, ज्ञान, कर्म और नियमों का बोध आवश्यक था। ब्रह्मा जी ने चारों दिशाओं में दृष्टि डाली, लेकिन वेद कहीं दिखाई नहीं दिए। उन्हें समझ आ गया कि यह साधारण घटना नहीं है। ज्ञान पर संकट आया है और इस संकट का समाधान केवल भगवान विष्णु ही कर सकते हैं। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अत्यंत श्रद्धा से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा, “हे जगतपालक, सृष्टि का कार्य आपके आदेश से प्रारंभ हुआ है, लेकिन अब वेद ही हमारे पास नहीं हैं। यदि यह दिव्य ज्ञान वापस नहीं आया तो सृष्टि की व्यवस्था अधूरी रह जाएगी। प्रभु, आप ही मेरी और समस्त सृष्टि की रक्षा कर सकते हैं।” ब्रह्मा जी की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य दृष्टि से पूरी स्थिति को देखा। उन्हें पता चल गया कि वेद मधु और कैटभ के अधिकार में हैं और उन्हें जल अथवा पाताल के गहरे क्षेत्र में छिपाया गया है। भगवान विष्णु ने निश्चय किया कि वे केवल युद्ध के बल से नहीं, बल्कि अपनी दिव्य लीला से वेदों को वापस लाएंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक अत्यंत अद्भुत स्वरूप धारण किया, जिसे हयग्रीव अवतार के नाम से जाना गया। भगवान हयग्रीव का स्वरूप देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो उठे। उनका शरीर दिव्य और तेजस्वी था तथा उनका मुख श्वेत अश्व के समान बताया जाता है। उनके शरीर से ऐसा प्रकाश निकल रहा था मानो असंख्य सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। उनके स्वरूप में शक्ति, ज्ञान और दिव्यता का अद्भुत संगम था। हयग्रीव नाम का संबंध संस्कृत के “हय” अर्थात घोड़े और “ग्रीव” अर्थात गर्दन या मुख से माना जाता है। भगवान हयग्रीव ने पाताल की ओर प्रस्थान किया। वहां चारों ओर अंधकार था। गहरे जल, रहस्यमय मार्ग और असुरों की शक्तियां उस स्थान को अत्यंत दुर्गम बना रही थीं। लेकिन भगवान विष्णु के लिए कोई स्थान असंभव नहीं था। वे धीरे-धीरे उस स्थान तक पहुंचे जहां मधु और कैटभ ने वेदों को छिपाकर रखा था। दोनों असुर वेदों को अपने अधिकार में लेकर स्वयं को विजयी समझ रहे थे। उन्हें विश्वास था कि देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं है जो उनसे वेदों को वापस छीन सके। लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि स्वयं भगवान विष्णु उनके सामने आने वाले हैं। भगवान हयग्रीव ने वहां ऐसी दिव्य और मधुर ध्वनि उत्पन्न की जिसकी गूंज पाताल लोक तक फैल गई। वह ध्वनि साधारण नहीं थी। उसमें ऐसा आकर्षण था कि मधु और कैटभ का ध्यान अपनी ओर खिंच गया। दोनों असुरों ने सोचा कि आखिर यह कैसी अद्भुत ध्वनि है और यह कहां से आ रही है। वे उस ध्वनि का पीछा करते हुए अपने स्थान से दूर जाने लगे। इसी अवसर का उपयोग भगवान हयग्रीव ने किया। उन्होंने वेदों को अपने अधिकार में लिया और उन्हें लेकर वहां से निकल पड़े। कुछ समय बाद मधु और कैटभ को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे वापस लौटे तो देखा कि वेद वहां नहीं हैं। दोनों असुर क्रोध से भर उठे। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि कोई दिव्य शक्ति उन्हें छल करके वेदों को ले गई है। मधु और कैटभ ने भगवान हयग्रीव का पीछा किया। जैसे ही उन्होंने भगवान को देखा, दोनों ने उन पर आक्रमण कर दिया। अब पाताल लोक की धरती पर एक भयंकर युद्ध प्रारंभ हुआ। असुर अपनी पूरी शक्ति से भगवान पर प्रहार कर रहे थे, लेकिन भगवान हयग्रीव शांत भाव से उनका सामना कर रहे थे। उनके लिए यह युद्ध केवल विजय प्राप्त करने का साधन नहीं था, बल्कि सृष्टि के ज्ञान की रक्षा का दायित्व था। मधु और कैटभ ने अनेक अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति के सामने उनकी कोई भी चाल सफल नहीं हुई। अंततः भगवान हयग्रीव ने दोनों असुरों का वध कर दिया और वेदों को सुरक्षित लेकर ब्रह्मा जी के पास लौट आए। जब ब्रह्मा जी ने वेदों को वापस अपने सामने देखा तो उनके हृदय में अपार प्रसन्नता उत्पन्न हुई। उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आपने केवल मेरे ज्ञान की रक्षा नहीं की, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के भविष्य की रक्षा की है। यदि वेद वापस नहीं आते तो सृष्टि के नियम और ज्ञान की परंपरा अधूरी रह जाती।” भगवान हयग्रीव ने वेदों को ब्रह्मा जी को सौंप दिया। इसके बाद ब्रह्मा जी ने फिर से सृष्टि की रचना का कार्य प्रारंभ किया। वेदों का दिव्य ज्ञान पुनः स्थापित हुआ और संसार में धर्म, ज्ञान, कर्म तथा जीवन के नियमों की व्यवस्था आगे बढ़ी। इसी कारण भगवान हयग्रीव को ज्ञान और विद्या के दिव्य स्वरूप से जोड़ा जाता है। विशेष रूप से दक्षिण भारत की वैष्णव परंपराओं में भगवान हयग्रीव की पूजा का विशेष महत्व है। कई भक्त उन्हें विद्यार्थियों, विद्वानों और ज्ञान की साधना करने वालों के आराध्य के रूप में पूजते हैं। भगवान हयग्रीव का स्वरूप यह संदेश देता है कि ज्ञान केवल प्राप्त करने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसकी रक्षा करना और उसे योग्य लोगों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हयग्रीव अवतार की कथा को केवल एक देवता और दो असुरों के बीच युद्ध की कहानी के रूप में देखना इसके गहरे भाव को छोटा कर देना होगा। इसके पीछे एक प्रतीकात्मक संदेश भी देखा जाता है। जब अज्ञान और अहंकार ज्ञान को अपने अधिकार में लेने का प्रयास करते हैं, तब दिव्य चेतना उस ज्ञान की रक्षा करती है। मधु और कैटभ यहां केवल दो असुरों के रूप में नहीं, बल्कि उस अंधकार के प्रतीक भी माने जा सकते हैं जो मनुष्य को सत्य और ज्ञान से दूर ले जाता है। भगवान हयग्रीव का श्वेत अश्व के समान मुख भी कई परंपराओं में ज्ञान की तीव्रता और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। जैसे घोड़ा गति का प्रतीक है, वैसे ही ज्ञान भी मनुष्य के जीवन को अज्ञान से समझ की ओर ले जाता है। जिस प्रकार अंधकार में रास्ता दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार ज्ञान के बिना जीवन का सही मार्ग समझना कठिन हो जाता है। इसीलिए भगवान हयग्रीव की कथा में सबसे बड़ा संदेश युद्ध नहीं बल्कि ज्ञान की महिमा है। भगवान विष्णु ने यह दिखाया कि संसार की रक्षा केवल शत्रुओं को हराने से नहीं होती, बल्कि उस ज्ञान की रक्षा से भी होती है जिसके आधार पर धर्म और व्यवस्था आगे बढ़ती है। वेदों की रक्षा करके हयग्रीव अवतार ने ब्रह्मा जी को सृष्टि का कार्य पूर्ण करने में सहायता दी और ज्ञान की उस परंपरा को सुरक्षित रखा जिसे सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से ज्ञान की खोज करता है, अपने अज्ञान को दूर करने का प्रयास करता है और विद्या का सम्मान करता है, उसके लिए भगवान हयग्रीव की कथा प्रेरणा का स्रोत बन सकती है। क्योंकि इस कथा का सार यही है कि शक्ति से बड़ा ज्ञान है, और ज्ञान तभी महान है जब उसका उपयोग सृष्टि के कल्याण के लिए किया जाए। इसलिए जब भी भगवान हयग्रीव का स्मरण किया जाता है, तो केवल उनके अद्भुत अश्वमुखी स्वरूप को याद करना पर्याप्त नहीं है। उनके पीछे छिपे उस संदेश को भी याद करना चाहिए कि अज्ञान कितना भी गहरा क्यों न हो, ज्ञान का प्रकाश उससे अधिक शक्तिशाली होता है। मधु और कैटभ जैसे असुर वेदों को छिपा सकते थे, लेकिन ज्ञान को हमेशा के लिए समाप्त नहीं कर सकते थे। भगवान हयग्रीव ने उस ज्ञान को वापस लाकर यह सिद्ध किया कि सत्य और विद्या की ज्योति को जितना भी छिपाया जाए, दिव्य चेतना उसे फिर से संसार के सामने ला सकती है। यही भगवान हयग्रीव अवतार की दिव्य कथा का सबसे गहरा संदेश है।
sn vyas
548 views
2 days ago
#पौराणिक कथा कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब न कोई आकाश था, न धरती, न सूर्य, न चंद्रमा, न दिन था और न रात। समय भी जैसे अपने जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था और चारों ओर केवल अनंत मौन और अथाह शून्यता व्याप्त थी। लेकिन उस शून्य के भीतर एक ऐसी सत्ता विद्यमान थी, जिसका न कोई आरंभ था और न कोई अंत। पुराणों में उसी परम सत्ता को नारायण कहा गया है। अनंत कारण जल के ऊपर शेषनाग की दिव्य शैया पर योगनिद्रा में विराजमान भगवान विष्णु, जिनके भीतर मानो संपूर्ण सृष्टि अपने अव्यक्त रूप में समाई हुई थी। यह योगनिद्रा साधारण निद्रा नहीं थी, बल्कि ऐसी अवस्था थी जिसमें चेतना पूर्ण रूप से जागृत होते हुए भी सृष्टि का विस्तार अभी प्रकट नहीं हुआ था। सब कुछ शांत था, लेकिन उस शांति के भीतर आने वाले अनंत ब्रह्मांड की संभावना छिपी हुई थी। समय के अनंत प्रवाह में वह क्षण आया जब सृष्टि के पुनः प्रकट होने का संकल्प हुआ। भगवान नारायण की दिव्य चेतना में एक सूक्ष्म स्पंदन उत्पन्न हुआ और उसी के साथ कारण जल में सृष्टि की पहली हलचल दिखाई देने लगी। भगवान विष्णु की नाभि से धीरे-धीरे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। वह साधारण कमल नहीं था। वह प्रकाश से भरा हुआ था और उसके भीतर पूरी सृष्टि के बीज के समान एक महान रहस्य छिपा था। इसी दिव्य कमल को हिरण्यगर्भ से जोड़ा जाता है और इसी पर प्रकट हुए चार मुखों वाले ब्रह्मा। जब ब्रह्मा ने पहली बार अपनी आंखें खोलीं तो उन्होंने चारों ओर देखा। सामने केवल अनंत जल था और उनके अलावा कोई दिखाई नहीं दे रहा था। उनके मन में प्रश्न उठा कि मैं कौन हूं? मेरा जन्म कैसे हुआ? मेरा उद्देश्य क्या है और इस अनंत संसार की शुरुआत कहां से हुई? अपने अस्तित्व का रहस्य जानने के लिए ब्रह्मा कमल के तने के भीतर उतरने लगे। उन्होंने उस कमल की जड़ और उसके स्रोत को खोजने का प्रयास किया, लेकिन जितना आगे बढ़ते गए, रहस्य उतना ही गहरा होता गया। उन्हें उस यात्रा का कोई अंत नहीं मिला। अंततः वे वापस लौट आए और समझ गए कि केवल बाहरी खोज से उस सत्य को नहीं पाया जा सकता। तभी उनके भीतर तपस्या का विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने अपने मन को एकाग्र किया और लंबे समय तक कठोर तप में लीन हो गए। उनकी तपस्या से ब्रह्मांडीय चेतना में कंपन उत्पन्न हुआ और अंततः उनके सामने भगवान नारायण का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। ब्रह्मा ने विनम्र होकर अपने जन्म का रहस्य पूछा। तब नारायण ने उन्हें बताया कि उनका प्राकट्य सृष्टि की दिव्य योजना का हिस्सा है और उन्हें संसार की रचना का दायित्व सौंपा गया है। यहीं से सृष्टि के महान चक्र का आरंभ हुआ। ब्रह्मा को सृजन का कार्य मिला, भगवान विष्णु को पालन और संरक्षण का दायित्व तथा भगवान शिव को संहार और पुनर्निर्माण की शक्ति से जोड़ा गया। भारतीय दर्शन में इन तीनों को केवल तीन अलग-अलग देवताओं के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि सृष्टि के तीन मूल कार्यों के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है। जन्म होता है, जीवन चलता है और समय आने पर परिवर्तन होता है। यही परिवर्तन आगे नए सृजन का कारण बनता है। इस प्रकार सृष्टि का चक्र निरंतर चलता रहता है। अलग-अलग परंपराओं में इस परम सत्य को अलग-अलग रूपों में समझाया गया है। वैष्णव परंपरा भगवान विष्णु को सर्वोच्च मानती है, शैव परंपरा भगवान शिव को परम तत्व मानती है और शाक्त परंपरा आदि शक्ति को मूल चेतना के रूप में देखती है। इन विविध दृष्टिकोणों में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गहराई दिखाई देती है। भगवान विष्णु के स्वरूप को समझने के लिए उनके दिव्य निवास की कल्पना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुराणों में क्षीरसागर का वर्णन मिलता है, जहां भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विराजमान दिखाई देते हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा करती हैं। उनका नील वर्ण अनंत आकाश और अथाह समुद्र की याद दिलाता है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म दिखाई देते हैं। शंख को दिव्य नाद और चेतना के जागरण से जोड़ा जाता है, चक्र समय और धर्म की गति का प्रतीक माना जाता है, गदा शक्ति और व्यवस्था का संकेत देती है तथा कमल निर्मलता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। शेषनाग के अनंत फन समय के अनंत प्रवाह का प्रतीक समझे जाते हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु का पूरा स्वरूप केवल एक धार्मिक चित्र नहीं बल्कि गहरे प्रतीकों से भरी हुई आध्यात्मिक अवधारणा भी है। क्षीरसागर से आगे विष्णु के दिव्य धाम वैकुंठ का वर्णन मिलता है। वैकुंठ को ऐसा लोक माना गया है जहां भगवान विष्णु अपनी दिव्य सत्ता में विराजमान रहते हैं। इसी संदर्भ में जय और विजय की प्रसिद्ध कथा भी आती है। जय और विजय भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। एक बार सनकादि ऋषियों के साथ हुए प्रसंग के कारण उन्हें श्राप मिला कि उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा। कहा जाता है कि उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और अंततः यह स्वीकार किया कि वे बार-बार जन्म लेकर भगवान के हाथों मुक्ति प्राप्त करेंगे। इसी कथा से हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप जैसे असुरों से लेकर रावण और कुंभकर्ण तथा आगे शिशुपाल और दंतवक्र तक की परंपराओं को जोड़ा जाता है। इस प्रसंग में एक गहरा संदेश छिपा है कि दिव्य व्यवस्था में कर्म का नियम सभी पर लागू होता है और मुक्ति भी अंततः उसी परम सत्य की ओर लौटने का मार्ग बन जाती है। लेकिन जब-जब संसार में धर्म का संतुलन बिगड़ता है, तब भगवान विष्णु के अवतारों की कथाएं सामने आती हैं। दशावतार की प्रसिद्ध परंपरा में मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और भविष्य में माने जाने वाले कल्कि अवतार का वर्णन मिलता है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में सूची और विवरण में कुछ अंतर भी पाए जाते हैं, लेकिन मूल विचार यही है कि जब धर्म संकट में पड़ता है और अधर्म बढ़ने लगता है, तब दिव्य शक्ति किसी न किसी रूप में संतुलन स्थापित करती है। मत्स्य अवतार में जल से जुड़ी कथा सामने आती है, कूर्म अवतार में समुद्र मंथन का आधार बनता है, वराह पृथ्वी की रक्षा करते हैं और नरसिंह भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अद्भुत स्वरूप धारण करते हैं। नरसिंह अवतार की कथा भगवान विष्णु के अवतारों में सबसे रहस्यमय कथाओं में से एक है। हिरण्यकश्यप को वरदान प्राप्त था कि वह न दिन में मरेगा, न रात में, न घर के भीतर और न बाहर, न मनुष्य से और न पशु से तथा न किसी अस्त्र से। उसे अपने बल पर इतना अहंकार हो गया कि उसने स्वयं को ही सर्वोच्च मान लिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि तुम्हारा भगवान कहां है, तो प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि भगवान हर जगह हैं। क्रोध में हिरण्यकश्यप ने स्तंभ की ओर संकेत करके पूछा कि क्या तुम्हारा भगवान इसमें भी है। तभी उस स्तंभ से नरसिंह का अद्भुत स्वरूप प्रकट हुआ। न पूर्ण मनुष्य, न पूर्ण पशु। संध्या के समय, महल की दहलीज पर, अपने नखों से उन्होंने हिरण्यकश्यप का अंत किया और प्रह्लाद की रक्षा की। यह कथा अहंकार के सामने भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक बन गई। इसके बाद वामन अवतार की कथा आती है, जहां भगवान विष्णु एक छोटे से ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के सामने पहुंचे। राजा बलि शक्तिशाली और दानी थे। उन्होंने वामन से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। वामन ने केवल तीन पग भूमि मांग ली। बलि ने वचन दे दिया। तभी वामन ने विराट रूप धारण किया। एक पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश नाप लिया और जब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उसके समर्पण को स्वीकार किया। इस कथा में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण वचन, दान, समर्पण और अहंकार के त्याग का संदेश दिखाई देता है। फिर आता है भगवान राम का अवतार, जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्मरण किया जाता है। राम की कथा केवल रावण के वध की कहानी नहीं है। यह त्याग, सत्य, कर्तव्य, परिवार, मित्रता और धर्म की परीक्षा की कथा है। राजमहल छोड़कर वनवास जाना हो, कठिन परिस्थितियों में भी मर्यादा बनाए रखना हो या अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना हो, राम का जीवन यह दिखाता है कि धर्म का पालन हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन कठिन समय में भी अपने सिद्धांतों पर टिके रहना ही सच्ची शक्ति है। उनके साथ हनुमान जैसे परम भक्त का जुड़ना इस कथा को और भी दिव्य बना देता है। इसके बाद भगवान कृष्ण का अवतार आता है, जिसमें विष्णु तत्व का एक अलग ही रूप दिखाई देता है। कृष्ण कभी बालक बनकर प्रेम का संदेश देते हैं, कभी मित्र बनकर साथ निभाते हैं और कभी सारथी बनकर अर्जुन को जीवन का सबसे गहरा ज्ञान देते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन जब अपने ही संबंधियों को सामने देखकर भ्रमित हो जाते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, आत्मा, कर्तव्य और धर्म का ज्ञान देते हैं। भगवद्गीता का संदेश यही है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए कर्म करना चाहिए और परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। भगवान विष्णु की कथाओं का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे केवल युद्ध करने वाले देवता के रूप में नहीं दिखाई देते। उनका वास्तविक तत्व संरक्षण और संतुलन से जुड़ा है। जहां जीवन की रक्षा होती है, जहां करुणा दिखाई देती है, जहां कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे की सहायता करता है, वहां विष्णु तत्व की अभिव्यक्ति मानी जा सकती है। एक मां अपने बच्चे के लिए रातभर जागती है, कोई व्यक्ति भूखे को भोजन देता है, कोई कमजोर की सहायता करता है या कोई व्यक्ति कठिन परिस्थिति में भी न्याय और सत्य का साथ नहीं छोड़ता, तो इन कार्यों में संरक्षण और संतुलन की वही भावना दिखाई देती है। कलियुग की बात करें तो पुराणों में भविष्य के कल्कि अवतार का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा और धर्म का संतुलन अत्यंत कमजोर हो जाएगा, तब भगवान विष्णु कल्कि रूप में प्रकट होंगे। उनके श्वेत अश्व पर सवार होने और अधर्म के अंत के बाद नए युग की स्थापना से जुड़ी कथाएं विभिन्न पुराणिक परंपराओं में मिलती हैं। इसे केवल भविष्य की एक घटना के रूप में देखने के बजाय एक आध्यात्मिक संदेश के रूप में भी समझा जा सकता है कि जब अंधकार बढ़ता है तो प्रकाश की आवश्यकता और अधिक महसूस होती है और जब व्यवस्था बिगड़ती है तो उसे संतुलित करने की शक्ति उत्पन्न होती है। इस पूरी कथा को यदि ध्यान से समझें तो भगवान विष्णु केवल क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजमान किसी दूरस्थ देवता की कल्पना तक सीमित नहीं रह जाते। वे सृष्टि के उस सिद्धांत का प्रतीक बन जाते हैं जो जीवन को संभालता है, व्यवस्था को बनाए रखता है और जब धर्म का संतुलन बिगड़ता है तो उसे पुनः स्थापित करने का मार्ग दिखाता है। उनका प्रत्येक अवतार अपने समय की एक विशेष समस्या का उत्तर बनकर सामने आता है। कभी वे जल में आते हैं, कभी पृथ्वी को उठाते हैं, कभी भक्त की रक्षा के लिए आधे मनुष्य और आधे सिंह का रूप लेते हैं, कभी छोटे से वामन बनकर अहंकार को चुनौती देते हैं, कभी राम बनकर मर्यादा स्थापित करते हैं और कभी कृष्ण बनकर मनुष्य को कर्म और ज्ञान का मार्ग समझाते हैं। शायद यही कारण है कि भगवान विष्णु की कथा केवल प्राचीन समय की कहानी नहीं लगती। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की कहानी भी बन जाती है। हमारे भीतर भी कभी अहंकार बढ़ता है, कभी भय हमें कमजोर करता है, कभी मोह हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है और कभी कठिन परिस्थितियां हमें अपने मार्ग से भटका देती हैं। ऐसे समय में विष्णु तत्व का अर्थ है संतुलन, धैर्य, करुणा, कर्तव्य और धर्म को याद रखना। सृष्टि का चक्र चलता रहता है, समय बदलता रहता है, परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन सत्य और संतुलन की खोज कभी समाप्त नहीं होती। और शायद भगवान विष्णु की सबसे बड़ी सीख यही है कि संसार को बचाने के लिए हमेशा किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं होती। कभी किसी की सहायता करना भी संरक्षण है, किसी दुखी को सहारा देना भी संरक्षण है, अन्याय के सामने सत्य बोलना भी धर्म की रक्षा है और अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के जीवन में प्रकाश बन जाना भी उसी दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति है। इसलिए जब भी आप अपने आसपास किसी व्यक्ति को निस्वार्थ भाव से किसी दूसरे की रक्षा करते देखें, किसी भूखे को भोजन मिलता देखें या किसी कठिन परिस्थिति में कोई इंसान धैर्य और करुणा के साथ सही निर्णय लेता देखें, तो याद रखिए कि पुराणों में वर्णित विष्णु तत्व को समझने का यही सबसे सरल मार्ग हो सकता है। सृष्टि की शुरुआत से लेकर आज तक समय अनगिनत बार बदला, युग बदले, राजवंश बदले और मनुष्य की परिस्थितियां बदलीं, लेकिन धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष निरंतर चलता रहा। इसी संघर्ष में भगवान विष्णु की कथाएं मनुष्य को बार-बार यही स्मरण कराती हैं कि जब संतुलन बिगड़ता है तो उसे पुनः स्थापित करना आवश्यक है, जब अहंकार बढ़ता है तो विनम्रता की आवश्यकता होती है और जब अंधकार गहरा होता है तो प्रकाश की खोज करनी चाहिए। भगवान विष्णु की कथा इसलिए केवल एक देवता की कथा नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना, समय, कर्म, धर्म और संतुलन की एक विशाल आध्यात्मिक यात्रा है। अनंत कारण सागर से लेकर ब्रह्मा के प्राकट्य तक, दशावतारों से लेकर कल्कि की भविष्यवाणी तक, यह यात्रा हमें एक ही विचार की ओर ले जाती है कि सृष्टि में परिवर्तन अनिवार्य है, लेकिन धर्म और संतुलन की खोज कभी समाप्त नहीं होती। जय श्री हरि।
sn vyas
543 views
2 days ago
#पौराणिक कथा उद्धार की कथा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ बहुत समय पहले गोकुल की पवित्र भूमि पर एक ऐसा राक्षस आया, जिसकी शक्ति देखकर बड़े-बड़े योद्धा भी भयभीत हो जाते। उसका नाम था तृणावर्त। वह केवल एक साधारण असुर नहीं था, बल्कि वायु और भयंकर बवंडर की मायावी शक्ति से संपन्न था। जब वह अपनी शक्ति का प्रयोग करता, तो देखते ही देखते आकाश धूल से भर जाता, सूर्य तक दिखाई देना बंद हो जाता और चारों ओर ऐसा अंधकार छा जाता मानो दिन के बीच रात उतर आई हो। लेकिन तृणावर्त को अपनी शक्ति पर इतना घमंड था कि वह स्वयं को अजेय समझता था। कंस ने उसे गोकुल भेजते हुए आदेश दिया था कि किसी भी तरह नंदलाल श्री कृष्ण को अपने साथ ले आए। तृणावर्त के मन में एक ही विचार था कि वह उस नन्हे बालक को गोकुल से हमेशा के लिए दूर ले जाएगा और कंस के सामने अपनी शक्ति का प्रमाण देगा। उधर गोकुल में सब कुछ सामान्य था। माता यशोदा अपने नन्हे कृष्ण को गोद में लेकर दुलार रही थीं। कभी उनके गाल चूमतीं, कभी उनके बालों को सहलातीं और कभी उनकी मनमोहक मुस्कान देखकर स्वयं हंसने लगतीं। नन्हे कृष्ण भी अपनी चंचल आंखों से कभी माता को देखते तो कभी आसपास खेलते ग्वाल-बालों की ओर मुस्कुराते। किसी को भी अंदाजा नहीं था कि कुछ ही क्षणों में गोकुल पर एक भयंकर संकट आने वाला है। अचानक माता यशोदा को महसूस हुआ कि कृष्ण का शरीर असाधारण रूप से भारी होता जा रहा है। उन्होंने सोचा कि शायद बालक को नीचे बैठाना उचित होगा। उन्होंने प्रेम से कृष्ण को भूमि पर बैठाया और घर के कुछ काम में लग गईं। उसी समय दूर आकाश में एक भयंकर गर्जना सुनाई दी। देखते ही देखते तेज हवाएं चलने लगीं। धूल के गुबार उठने लगे और कुछ ही क्षणों में पूरा गोकुल एक विशाल बवंडर की चपेट में आ गया। लोग अपनी आंखें तक नहीं खोल पा रहे थे। पेड़ जोर-जोर से हिलने लगे। घरों के दरवाजे और खिड़कियां तेज हवा से कांपने लगीं। पशु इधर-उधर भागने लगे और गोकुलवासी अपने बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। चारों ओर केवल धूल, अंधकार और तेज हवाओं का शोर था। इसी भयंकर बवंडर के बीच तृणावर्त ने अपना मायावी रूप धारण किया और अवसर पाते ही नन्हे कृष्ण को उठा लिया। तृणावर्त कृष्ण को लेकर तेजी से आकाश की ओर बढ़ने लगा। वह इतना ऊपर उड़ गया कि कुछ ही क्षणों में गोकुल नीचे बहुत छोटा दिखाई देने लगा। उसके मन में अहंकार भर गया। वह सोचने लगा कि अब इस बालक को कोई नहीं बचा सकता। उसने कल्पना की कि कंस के पास जाकर वह गर्व से बताएगा कि उसने गोकुल के सबसे प्रिय बालक को अपनी शक्ति से उठा लिया है। लेकिन तृणावर्त यह नहीं जानता था कि जिसे वह अपनी शक्ति का शिकार समझकर आकाश में ले जा रहा है, वही स्वयं समस्त ब्रह्मांड का आधार है। अचानक श्री कृष्ण का शरीर भारी होने लगा। पहले तृणावर्त को लगा कि शायद यह उसका भ्रम है। उसने अपनी गति बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण का भार लगातार बढ़ता गया। कुछ ही क्षणों में ऐसा लगने लगा मानो उसने अपनी बाहों में कोई विशाल पर्वत उठा लिया हो। तृणावर्त की सांसें तेज हो गईं। उसने पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन कृष्ण का भार कम होने के बजाय और बढ़ता चला गया। अब वह न तो ऊपर उड़ पा रहा था और न ही नीचे लौट पा रहा था। उसका सारा अहंकार भय में बदल गया। जिस बालक को वह अपने नियंत्रण में समझ रहा था, वही अब उसकी सारी शक्ति को निष्फल कर रहा था। तभी श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य लीला दिखाई। नन्हे कृष्ण ने अपने छोटे-छोटे हाथ तृणावर्त के गले के चारों ओर डाल दिए। तृणावर्त बुरी तरह छटपटाने लगा। उसने कृष्ण को हटाने का प्रयास किया, लेकिन उसकी सारी शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी। वह समझ चुका था कि उसके सामने कोई साधारण बालक नहीं है। उसकी गति रुक गई और उसका मायावी बवंडर भी धीरे-धीरे शांत होने लगा। कुछ ही समय बाद तृणावर्त अपनी शक्ति खो बैठा और अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आकाश से नीचे गिर पड़ा। उसका विशाल शरीर गोकुल की भूमि पर आ गिरा। चारों ओर सन्नाटा छा गया। लेकिन जिस नन्हे बालक को वह अपने साथ लेकर गया था, वही श्री कृष्ण उसके ऊपर पूरी तरह सुरक्षित बैठे हुए थे। उधर माता यशोदा अपने लाल को खोजते हुए व्याकुल हो चुकी थीं। उन्हें कृष्ण कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। वह बार-बार उनका नाम लेकर पुकार रही थीं। गोकुलवासी भी चारों ओर खोजने लगे। तभी अचानक उन्हें तृणावर्त का विशाल शरीर दिखाई दिया। सभी लोग उस ओर दौड़े और वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। माता यशोदा ने जैसे ही कृष्ण को सुरक्षित देखा, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह दौड़कर अपने लाल को गोद में उठा लेती हैं और उन्हें अपने सीने से लगा लेती हैं। कृष्ण बिल्कुल शांत थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। माता यशोदा बार-बार उन्हें देखतीं और अपने हृदय से लगाकर भगवान को धन्यवाद देतीं कि उनका लाल सुरक्षित है। गोकुलवासियों को समझ नहीं आ रहा था कि इतना विशाल और शक्तिशाली असुर एक छोटे से बालक के सामने कैसे पराजित हो गया। लेकिन देवताओं के लिए यह रहस्य नहीं था। वे जानते थे कि गोकुल में खेलता हुआ यह नन्हा बालक कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण हैं। आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और उनकी इस दिव्य लीला का गुणगान किया। तृणावर्त को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। उसे लगता था कि उसकी गति, उसका मायावी बवंडर और उसका विशाल बल उसे अजेय बना देते हैं। लेकिन श्री कृष्ण ने बिना किसी बड़े अस्त्र-शस्त्र के केवल अपनी दिव्य शक्ति से उसके अहंकार का अंत कर दिया। यह कथा केवल एक राक्षस के वध की कहानी नहीं है, बल्कि यह संदेश देती है कि कितना भी बड़ा संकट क्यों न हो और सामने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, सच्ची शरण और विश्वास के सामने अहंकार टिक नहीं सकता। गोकुल में उस दिन फिर से उत्सव जैसा वातावरण बन गया। लोग कृष्ण के दर्शन करने लगे और माता यशोदा उन्हें अपनी गोद से नीचे ही नहीं उतारना चाहती थीं। नंद बाबा और सभी ग्वाल-बाल भी कृष्ण को देखकर प्रसन्न हो गए। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनका नन्हा कान्हा बार-बार ऐसे संकटों से कैसे बच जाता है। लेकिन श्री कृष्ण अपनी बाल लीलाओं से सबके हृदय में प्रेम भरते रहे। तृणावर्त की कथा हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों को डराना नहीं, बल्कि धर्म और निर्दोषों की रक्षा करना है। अहंकार चाहे कितना भी ऊंचा उड़ जाए, उसे एक दिन सत्य के सामने झुकना ही पड़ता है। तृणावर्त आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंच गया था, लेकिन उसका घमंड उसे बचा नहीं सका। वहीं नन्हे कृष्ण ने दिखा दिया कि भगवान की शक्ति उम्र, आकार या बाहरी रूप से नहीं पहचानी जाती। इस प्रकार श्री कृष्ण ने गोकुल को एक और बड़े संकट से बचाया और तृणावर्त जैसे मायावी असुर का अंत कर दिया। माता यशोदा के लिए उनका कान्हा आज भी वही नन्हा बालक था जिसे वह अपनी गोद में लेकर दुलारना चाहती थीं, लेकिन देवताओं के लिए वही बालक समस्त सृष्टि के पालनकर्ता थे। यही तो श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सबसे अद्भुत रहस्य है—वह स्वयं अनंत शक्ति के स्वामी होकर भी अपने भक्तों के बीच एक नन्हे, चंचल और प्यारे बालक की तरह खेलते हैं। जय श्री कृष्ण। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
403 views
3 days ago
#पौराणिक कथा शूरसेन देश के प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा 'चित्रकेतु' के पास सर्वसुलभ राजसी सुख थे। उनका कोष स्वर्ण-रत्नों से भरा था, सेना विशाल थी और उनकी हज़ारों सुंदर और गुणवती रानियाँ थीं। परंतु इतने बड़े साम्राज्य के स्वामी होने के बाद भी राजा का मन सदा अशांत और उदास रहता था। इसका कारण यह था कि उनकी हज़ारों रानियों में से किसी से भी उन्हें संतान (पुत्र) की प्राप्ति नहीं हुई थी। राजा दिन-रात यही सोचते रहते थे—"मेरे बाद इस विशाल वंश और राज्य को कौन संभालेगा? बिना पुत्र के यह सारा वैभव, महल और मुकुट धूल के समान व्यर्थ है। एक दिन अपनी स्वेच्छा से विचरण करते हुए ब्रह्मर्षि अंगिरा राजा चित्रकेतु के राजमहल में पधारे। राजा ने बड़े आदर से ऋषि का पूजन किया, परंतु ऋषि ने राजा के चेहरे पर उदासी की छाया देख ली महर्षि अंगिरा ने पूछा—हे राजन्! तुम्हारे चेहरे का तेज फीका क्यों है? क्या राज्य में सब कुशल है? राजा चित्रकेतु ने अश्रु बहाते हुए अपने हृदय का दुख खोलकर रख दिया: "हे ब्रह्मर्षि! जैसे भूखे-प्यासे मनुष्य के सामने फूलों की मालाएँ रख दी जाएँ, तो वे उसकी भूख नहीं मिटा सकतीं, वैसे ही बिना संतान के यह संपूर्ण पृथ्वी का राज्य मुझे केवल एक बोझ प्रतीत होता है। कृपा करके मुझे पुत्र-प्राप्ति का उपाय बताइए।" महर्षि अंगिरा परम दयालु थे, परंतु वे त्रिकालदर्शी भी थे। उन्होंने एक विशेष यज्ञ संपन्न किया और यज्ञ का अवशिष्ट 'हविष्यान्न' (दिव्य खीर/फल) राजा की सबसे बड़ी और प्रिय पटरानी 'कृतद्युति' को खाने के लिए दिया। ऋषि ने जाते-जाते राजा से एक गूढ़ बात कही: राजन्! तुम्हें पुत्र की प्राप्ति अवश्य होगी, परंतु वह बालक तुम्हारे लिए 'हर्ष-शोक-प्रद' (अत्यंत खुशी और भारी शोक दोनों देने वाला) सिद्ध होगा पुत्र-मोह में अंधे हो चुके राजा ने ऋषि के अंत के शब्दों 'शोक' पर ध्यान ही नहीं दिया वे केवल 'पुत्र होगा' यह सुनकर आनंद से झूम उठे। समय बीतने पर महारानी कृतद्युति ने एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर और सुलक्षण बालक को जन्म दिया। बालक के जन्म लेते ही पूरे शूरसेन देश में मंगलाचार होने लगा, ढोल-नगाड़े बजे और राजा ने दिल खोलकर दान-पुण्य किया। राजा चित्रकेतु का पूरा ध्यान अब केवल बालक और उसकी माता (कृतद्युति) पर केंद्रित हो गया। वे दिन-रात बालक को दुलारते, गोदी में खिलाते और बड़ी रानी के महल में ही समय व्यतीत करते। परिणाम यह हुआ कि राजा की अन्य रानियों को उपेक्षित महसूस होने लगा। उनके भीतर ईर्ष्या की आग धधकने लगी। वे आपस में फुसफुसाने लगीं: राजा अब केवल बड़ी रानी को ही सम्मान देते हैं। यदि यह बालक बड़ा हो गया, तो राजा का संपूर्ण साम्राज्य इसी को मिलेगा और हमें जीवन भर दासी बनकर रहना पड़ेगा ईर्ष्या और डाह जब सीमा पार कर गई, तो उन सौतों का मति-भ्रम हो गया। एक दिन जब दासी बालक को सुलाकर बाहर गई, तो उन पापिनी रानियों ने छिपकर उस दूधमुँहे बालक को 'तीव्र विष' पिला दिया। थोड़ी देर बाद जब महारानी कृतद्युति अपने सोए हुए बालक को देखने गईं, तो उन्होंने देखा कि बालक की आँखें उठी हुई हैं, मुँह से झाग निकल रहा है और उसकी साँसें पूरी तरह थम चुकी हैं। रानी 'हा पुत्र!' कहकर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। जब राजा चित्रकेतु ने यह भयंकर समाचार सुना, तो दौड़ते हुए आए। पुत्र के बेजान, नीले पड़े शरीर को देखकर राजा के होश उड़ गए। वे अपने मुकुट और राजसी वस्त्र उखाड़कर फेंकने लगे। राजा पुत्र के शव को अपनी छाती से लगाकर रोने लगे। महारानी होश में आकर अपनी छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगी: "हे विधाता! तुमने यह कैसा अन्याय किया? जो बालक अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, उसे तुमने क्यों छीन लिया? हे प्रभु! बालक से पहले मुझे मृत्यु क्यों नहीं दी?पूरे राजमहल में हाहाकार मच गया। राजा चित्रकेतु शोक के भयंकर सागर में डूब गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वे भी अपने पुत्र के शव के साथ ही अपने प्राण त्याग देंगे। जब स्थिति अत्यंत विकट हो गई, तब देवर्षि नारद जी और महर्षि अंगिरा वहाँ प्रकट हुए। अंगिरा ऋषि ने राजा से कहा: राजन्! मैं वही अंगिरा हूँ जिसने तुम्हें यह पुत्र दिया था। मैं उस दिन तुम्हें तत्त्वज्ञान का उपदेश देने आया था, परंतु तुम्हारा मन केवल पुत्र-मोह में अटका था। देखो! संसारी पदार्थों का सुख स्वप्न की तरह है। जब तुम संतानहीन थे, तब भी दुखी थे, और आज पुत्र मिला तो उससे अनंत गुना बड़ा दुख मिल गया। अब इस माटी के पुतले के लिए रोना बंद करो परंतु राजा का विवेक शोक की अग्नि में जल चुका था। वे बिलखते हुए बोले—"हे ऋषिवर! आपका ज्ञान सत्य होगा, परंतु मेरा हृदय फट रहा है। यदि आप सामर्थ्यवान हैं, तो मेरे इस पुत्र को केवल एक बार जीवित कर दीजिए, ताकि मैं इससे बात कर सकूँ। तब देवर्षि नारद जी ने अपनी सामर्थ्य और योगमाया का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी विद्या से उस मृत बालक की 'आत्मा' (जीव) को, जो परलोक की ओर यात्रा कर रही थी, वापस बुलाया और पुनः उस शव में प्रवेश करा दिया बालक का मृत शरीर अचानक हिलने लगा। उसकी साँसें वापस आ गईं और उसने अपनी आँखें खोल दीं। राजा चित्रकेतु, रानी कृतद्युति और वहाँ खड़ी सभी रानियाँ (विष देने वाली रानियाँ भी) आश्चर्य और खुशी से चीख उठीं। देवर्षि नारद जी ने बालक की आत्मा को संबोधित करते हुए कहा: हे जीव! ज़रा अपने माता-पिता की ओर देखो! ये तुम्हारे वियोग में अपने प्राण दे रहे हैं। तुम वापस अपने इस सुंदर शरीर में प्रवेश कर जाओ। राजा चित्रकेतु के पुत्र बनकर इस समृद्ध राज्य का सुख भोगो और अपनी प्रजा पर शासन करो। तभी वह बालक उठा और बाल-सुलभ क्रीड़ा करने के बजाय एक अत्यंत परम ज्ञानी सिद्ध पुरुष की भांति हँसने लगा। बालक की आत्मा ने जो उत्तर दिया, उसने वहाँ खड़े हर व्यक्ति के चेतना के तार झंकृत कर दिए! बालक की आत्मा बोली: हे मुनिवर! आप मुझे किसका पुत्र कह रहे हैं और किन्हें मेरा माता-पिता बता रहे हैं? कर्मों की अटवी (वन) में भटकती हुई मेरी यह आत्मा न जाने कितने हज़ारों-करोड़ों जन्म ले चुकी है। इस लंबे काल-चक्र में कभी ये राजा चित्रकेतु मेरे पिता बने थे, तो किसी जन्म में मैं इनका पिता बना था! कभी ये मेरे मित्र थे, तो किसी जन्म में मेरे घोर शत्रु थे। कभी ये मेरे पुत्र थे, तो कभी मैं इनकी माता था! जैसे नदी के तेज बहाव में बहते हुए तिनके या बालू के कण आपस में आकर मिलते हैं, कुछ देर साथ बहते हैं और फिर नदी की तरंगों से अलग-अलग दिशाओं में बह जाते हैं... ठीक वैसे ही 'काल' की तरंगों में बहते हुए जीव पूर्वजन्मों के लेन-देन (ऋणानुबंध) के कारण माता-पिता, पति-पत्नी और पुत्र-पुत्री का मुखौटा पहनकर एक-दूसरे से मिलते हैं। जब लेन-देन पूरा हो जाता है, तो मृत्यु का एक झटका उन्हें अलग कर देता है। इस जन्म में मेरा इस शरीर और इस राजा से जितना हिसाब-किताब था, वह पूरा हो चुका है। अब न कोई किसी का पिता है, न कोई किसी का पुत्र। आत्मा अजर, अमर और नित्य है; इसे न कोई मार सकता है, न कोई जन्म दे सकता है। फिर आप मुझे किस बंधन में बाँध रहे हैं? यह कहकर बालक की वह जीवात्मा पुनः शांत हो गई और शरीर छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार अपनी अगली यात्रा पर निकल गई। बालक की आत्मा के इन सत्य और मर्मभेदी वचनों को सुनकर राजसभा में सन्नाटा छा गया। राजा चित्रकेतु और महारानी कृतद्युति के सिर से अज्ञान और मोह का भारी पत्थर क्षण भर में हट गया। राजा को समझ आ गया कि यह संसार केवल एक रंगमंच है, जहाँ सब अपना-अपना अभिनय करके चले जाते हैं।जिन छोटी रानियों ने ईर्ष्या में आकर बच्चे को विष दिया था, वे अत्यंत लज्जित होकर राजा के चरणों में गिर पड़ीं। राजा चित्रकेतु ने ज्ञानी पुरुष की भांति उन्हें क्षमा कर दिया।राजा ने स्वयं अपने हाथ से उस बालक के शरीर का दाह-संस्कार किया और जल-तर्पण किया। इसके बाद राजा चित्रकेतु ने अपना विशाल साम्राज्य, धन-कोष और राजमुकुट अपने मंत्रियों को सौंप दिया। वे देवर्षि नारद से 'संकर्षण (विष्णु) मंत्र' की दीक्षा लेकर गंगा-तट पर चले गए और कठोर तपस्या करके 'विद्याधर' (सिद्ध पुरुष) बन गए। !! जय श्री कृष्णा!!
sn vyas
612 views
5 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति भावना सूर्यवंश में 'सत्यव्रत' नाम के एक अत्यंत प्रतापी और पराक्रमी राजा हुए। वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण धर्मपूर्वक करते थे, परंतु उनके भीतर अपने सौंदर्य, बल और सत्ता का एक सूक्ष्म अहंकार पनप रहा था ​एक दिन राजसभा में बैठे-बैठे उनके मन में एक अनूठा और अभिमानी विचार आया: ​संसार में जितने भी पुण्य आत्मा हैं, वे मृत्यु के बाद अपना यह शरीर छोड़कर केवल आत्मा रूप में स्वर्ग जाते हैं। परंतु मैं इतना महान और शक्तिशाली राजा हूँ कि मुझे अपने इस पंचभौतिक मानव देह (सशरीर) के साथ ही स्वर्ग जाना चाहिए, ताकि देवता भी मेरे इस हाड़-मांस के शरीर का आदर करें! सत्यव्रत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और प्रणाम करके बोले:हे ब्रह्मर्षि! आप अपनी तपस्या के बल से एक ऐसा यज्ञ कराइए, जिसके प्रभाव से मैं अपने इसी जीवित शरीर के साथ स्वर्गलोक चला जाऊँ। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और राजा से शांत स्वर में कहा: हे राजन्! यह विचार धर्म, प्रकृति और विधि के विधान के विरुद्ध है। यह नश्वर शरीर पृथ्वी के पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है। इसे स्वर्ग में ले जाना असंभव और अधर्म है। अपनी इस व्यर्थ हठ को त्याग दो और निष्काम भाव से प्रजा-पालन करो। परंतु राजा सत्यव्रत पर हठ का भूत सवार था। उन्होंने वशिष्ठ जी की बात मानने के बजाय कहा कि यदि आप यह यज्ञ नहीं कराएंगे, तो मैं किसी अन्य ऋषि के पास चला जाऊँगा वशिष्ठ जी के इंकार करने पर राजा सत्यव्रत उनके १०० पुत्रों के पास गए। वशिष्ठ-पुत्रों ने जब देखा कि राजा उनके गुरु और पिता के निर्णय की अवहेलना कर रहा है, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने राजा को शाप दे दिया: "रे अभिमानी नृप! गुरु की आज्ञा का अनादर करने के कारण तू अत्यंत नीच और कुरूप 'चांडाल' बन जा! शाप मिलते ही राजा सत्यव्रत का दिव्य रूप, राजसी वस्त्र और आभूषण नष्ट हो गए। उनका शरीर काला, बाल बिखरे हुए, और वस्त्र जीर्ण-शीर्ण हो गए। वे एक भयानक व कुरूप चांडाल के रूप में बदल गए। इस रूप में अयोध्या की प्रजा ने भी उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। दुखी और अपमानित होकर सत्यव्रत वन-वन भटकने लगे। अंत में वे महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुँचे। विश्वामित्र जी उस समय महर्षि वशिष्ठ से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रयासरत थे। चांडाल रूपी राजा सत्यव्रत ने विश्वामित्र के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई। विश्वामित्र जी ने सोचा कि यदि वे वशिष्ठ के मना किए गए कार्य को अपनी तपस्या से पूरा कर दें, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी श्रेष्ठता सिद्ध हो जाएगी। विश्वामित्र जी ने प्रतिज्ञा की: हे राजन्! तुम वशिष्ठ के शाप से चांडाल बने हो, परंतु मैं अपने उग्र तपोबल से तुम्हें इसी शरीर के साथ देवराज इंद्र के सामने स्वर्ग में बिठाकर रहूँगा! विश्वामित्र जी ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया और सभी ऋषियों को निमंत्रण भेजा। परंतु वशिष्ठ जी के पुत्रों ने इस अस्वाभाविक यज्ञ में आने से मना कर दिया। यज्ञ की पूर्णाहुति के समय विश्वामित्र ने देवताओं को अपना हविर्भाग (आहुति) लेने के लिए आवाह्न किया, परंतु धर्म-विरुद्ध कार्य होने के कारण कोई भी देवता यज्ञ-स्थल पर प्रकट नहीं हुआ। इससे विश्वामित्र जी का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने हाथ में जल लिया और अपनी वर्षों की तपस्या का पुण्य राजा सत्यव्रत को अर्पित करते हुए कहा: हे राजन्! देवताओं के न आने पर भी मेरी तपस्या का फल देखो। मैं तुम्हें अपनी साधना के बल से आकाश में ऊपर स्वर्ग की ओर उछालता हूँ महान तपोबल के प्रभाव से राजा सत्यव्रत का चांडाल शरीर धरती छोड़कर तेज़ी से आकाश की ओर उड़ने लगा। राजा सत्यव्रत उड़ते हुए सीधे स्वर्ग लोक के द्वार पर पहुँच गए। जब देवताओं के राजा इन्द्र ने एक चांडाल रूपी मनुष्य को सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करते देखा, तो वे क्रोधित हो गए। इंद्र ने देवताओं के साथ मिलकर राजा को रोका और कहा: हे नीच! तू गुरु के शाप से पतित हुआ है और प्रकृति के नियम को तोड़कर सशरीर यहाँ आया है। तेरा स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है! इंद्र ने एक शक्तिशाली प्रहार करके राजा सत्यव्रत को स्वर्ग से नीचे फेंक दिया। राजा सत्यव्रत सिर के बल (उलटे) आकाश से धरती की ओर तेज़ी से गिरने लगे। भयभीत होकर वे आर्तनाद करने लगे—हे विश्वामित्र! हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिए, मैं नीचे गिर रहा हूँ! विश्वामित्र जी ने जब राजा की यह दुर्दशा देखी, तो उन्होंने अपने कमंडलु के जल से संकल्प लिया और गड़गड़ाती वाणी में कहा: "तिष्ठ! तिष्ठ!" (वहीं ठहर जाओ!) विश्वामित्र के तपोबल की शक्ति नीचे से ऊपर ढकेल रही थी और इंद्र का बल ऊपर से नीचे फेंक रहा था। परिणाम यह हुआ कि राजा सत्यव्रत न तो ऊपर स्वर्ग जा सके और न ही नीचे धरती पर गिर पाए। वे आकाश और पृथ्वी के बीचों-बीच अधर में (उलटे लटके हुए) अटक गए! स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—इन तीनों लोकों से अलग तीन संकटापन्न स्थितियों में फँसने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। जब इंद्र ने त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया, तो विश्वामित्र जी ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान माना। उन्होंने अपने क्रोध और तपोबल से अधर में लटके त्रिशंकु के चारों ओर एक नया स्वर्ग, नए सप्तर्षि और नए नक्षत्र-मंडल (दूसरा ब्रह्मांड) बनाना शुरू कर दिया! विश्वामित्र जी ने कहा: यदि इंद्र मेरे राजा को अपने स्वर्ग में नहीं रहने देगा, तो मैं अपने तपोबल से एक दूसरा इंद्र और नया देवलोक बनाकर इस राजा को वहाँ का स्वामी बनाऊँगा सृष्टि के इस नए समानांतर विधान को देखकर ब्रह्मा जी और सभी देवता भयभीत होकर विश्वामित्र जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने अत्यंत मधुर वाणी में विश्वामित्र जी से कहा: "हे ब्रह्मर्षि! शांत हो जाइए। आपका तपोबल अगाध है, परंतु सनातन प्रकृति और धर्म की मर्यादा को नष्ट मत कीजिए। नश्वर शरीर कभी मुख्य देवलोक में नहीं रह सकता। विश्वामित्र जी द्वारा रचे गए ये नए नक्षत्र और तारे 'त्रिशंकु मंडल' के नाम से जाने जाएँगे राजा त्रिशंकु इसी अधर में बने नए लोक (त्रिशंकु लोक) में सशरीर निवास करेंगे, परंतु वे मुख्य स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे।वे उलटे लटके रहेंगे और उनके मुँह से जो लार टपकेगी, वही पृथ्वी पर 'कर्मनाशा नदी' के रूप में बहेगी (मान्यता है कि इस नदी के जल को छूने से संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं)। अधर में उलटे लटके रहने के बाद राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) की आँखें खुलीं। उनका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने स्वीकार किया मेरे कुलगुरु वशिष्ठ जी का ज्ञान ही सत्य था। मैंने व्यर्थ के अहंकार और देह-सक्ति में पड़कर अपना लोक और परलोक दोनों बिगाड़ लिया। !! जय श्री कृष्णा!!
sn vyas
778 views
20 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा राजा मुचुकुंद की संपूर्ण कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ सूर्यवंश में अनेक महान और धर्मात्मा राजाओं का जन्म हुआ। इन्हीं में एक थे राजा मुचुकुंद। वे चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता के पुत्र और भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। राजा मुचुकुंद सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, दयालु और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनका जीवन धर्म, त्याग और भक्ति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। देवताओं की सहायता एक समय असुरों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि देवता बार-बार पराजित होने लगे। उन्होंने देवराज इंद्र के साथ भगवान ब्रह्मा से सहायता माँगी। उस समय देवताओं के पास ऐसा कोई महान योद्धा नहीं था जो लंबे समय तक असुरों का सामना कर सके। तब देवताओं ने पृथ्वी पर राज्य करने वाले राजा मुचुकुंद से सहायता की प्रार्थना की। धर्म की रक्षा को अपना कर्तव्य मानकर राजा मुचुकुंद स्वर्ग पहुँचे और देवताओं की ओर से असुरों के विरुद्ध युद्ध करने लगे। यह युद्ध कुछ दिन या कुछ वर्ष नहीं, बल्कि बहुत लंबे समय तक चलता रहा। इस दौरान राजा मुचुकुंद अपने परिवार, राज्य और सुख-सुविधाओं से पूरी तरह दूर रहे। पृथ्वी पर समय बीतता गया। उनके परिवार के लोग, मित्र और प्रजा भी काल के प्रवाह में बदल गए, परंतु राजा मुचुकुंद देवताओं की रक्षा में लगे रहे। इंद्र का वरदान अंततः भगवान कार्तिकेय देवसेना के सेनापति बने और देवताओं की रक्षा का दायित्व संभाल लिया। तब देवराज इंद्र ने राजा मुचुकुंद से कहा— "राजन! आपने देवताओं के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। हम आपके इस उपकार का प्रतिदान नहीं दे सकते। आप कोई भी वर माँगिए।" राजा मुचुकुंद अत्यंत थक चुके थे। उन्होंने कहा— "मैं बहुत वर्षों से सोया नहीं हूँ। मुझे केवल विश्राम चाहिए।" तब इंद्र ने उन्हें वरदान दिया— "आप जितनी इच्छा हो उतनी देर तक सो सकते हैं। जो भी आपकी नींद भंग करेगा, आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।" यह वरदान पाकर राजा मुचुकुंद पृथ्वी पर आए और एक विशाल पर्वतीय गुफा में जाकर गहरी निद्रा में लीन हो गए। कालयवन का जन्म और अहंकार बहुत समय बाद द्वापर युग आया। उस समय मथुरा पर भगवान श्रीकृष्ण का राज्य था। उसी समय एक अत्यंत शक्तिशाली यवन राजा कालयवन ने विशाल सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया। कालयवन को वरदान प्राप्त था कि उसे सामान्य अस्त्र-शस्त्र से कोई नहीं मार सकता। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध में मारने के बजाय एक दिव्य योजना बनाई। श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला भगवान श्रीकृष्ण बिना शस्त्र उठाए युद्धभूमि से निकल पड़े। कालयवन उन्हें कायर समझकर उनके पीछे दौड़ा। श्रीकृष्ण उसे पहाड़ों के बीच स्थित उसी गुफा तक ले गए जहाँ राजा मुचुकुंद युगों से सो रहे थे। गुफा के भीतर घना अंधकार था। भगवान श्रीकृष्ण एक ओर छिप गए। कालयवन ने अंधेरे में सोए हुए राजा मुचुकुंद को ही श्रीकृष्ण समझ लिया। उसने क्रोध में आकर उन्हें पैर से लात मार दी। कालयवन का अंत लात लगते ही राजा मुचुकुंद की नींद खुल गई। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने खड़े कालयवन को देखा। इंद्र के वरदान के प्रभाव से जैसे ही उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, वह तुरंत अग्नि के समान जल उठा और उसी क्षण भस्म होकर राख बन गया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने बिना अस्त्र चलाए कालयवन का अंत करा दिया। भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में राजा मुचुकुंद के सामने प्रकट हुए। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था। पीताम्बर धारण किए, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, गले में कौस्तुभ मणि और मुख पर मधुर मुस्कान देखकर राजा मुचुकुंद समझ गए कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे भाव-विभोर होकर भगवान के चरणों में गिर पड़े। मुचुकुंद की प्रार्थना राजा मुचुकुंद ने कहा— "प्रभु! मैंने राज्य, वैभव और पराक्रम में जीवन व्यतीत किया, पर अब समझ आया कि संसार का सब सुख क्षणभंगुर है। आपकी भक्ति ही जीवन का सच्चा धन है। मुझे ऐसा वर दीजिए कि मेरा मन सदैव आपके चरणों में लगा रहे।" भगवान श्रीकृष्ण उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— "राजन! तुम्हारा हृदय निर्मल हो गया है। इस जन्म में तपस्या करके अपने शेष कर्मों का क्षय करो। अगले जन्म में तुम महान ब्राह्मण रूप में जन्म लेकर अंततः मुझे प्राप्त करोगे।" गंधमादन पर्वत की तपस्या भगवान के दर्शन के बाद राजा मुचुकुंद गुफा से बाहर निकले। उन्होंने देखा कि संसार पूरी तरह बदल चुका है। मनुष्य छोटे हो गए हैं, आयु कम हो गई है और युग भी बदल चुका है। उन्हें समझ आ गया कि अनेक युग बीत चुके हैं। उन्होंने संसार का त्याग कर उत्तर दिशा में स्थित गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने वर्षों तक भगवान विष्णु का ध्यान, जप और कठोर तप किया। उनकी तपस्या से उनका मन पूर्णतः निर्मल हो गया और अंततः उन्हें भगवान की परम कृपा प्राप्त हुई। कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ धर्म की रक्षा के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए अद्भुत और अप्रत्याशित उपाय करते हैं। अहंकार का अंत निश्चित है, चाहे व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो। सांसारिक वैभव क्षणिक है, जबकि भगवान की भक्ति ही शाश्वत सुख देती है। सच्चे मन से भगवान की शरण लेने वाला अंततः मोक्ष का अधिकारी बनता है। जय श्रीकृष्ण। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️