महाभारत स्टेटस#

sn vyas
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9 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत का महान युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी और अधर्म का अंत हो चुका था। कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत था, लेकिन उस युद्ध की स्मृतियाँ अभी भी अर्जुन के मन में जीवित थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक चमत्कार देखे थे। भगवान श्रीकृष्ण का सखा होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त था। उन्होंने युद्ध के मध्य भगवान का विराट विश्वरूप भी देखा था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था। क्या वास्तव में भगवान के सभी स्वरूपों को कोई जान सकता है? क्या उनकी लीलाएँ और रूप केवल उतने ही हैं, जितने मनुष्य देख पाता है? अर्जुन जितना भगवान के निकट आते गए, उतना ही उन्हें यह अनुभव होने लगा कि श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप अनंत, असीम और मानव बुद्धि से परे है। एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक शांत वन में बैठे थे। वातावरण अत्यंत पवित्र था। मंद-मंद वायु बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था और चारों ओर प्रकृति की अद्भुत छटा फैली हुई थी। अर्जुन भगवान के चरणों में बैठे थे। कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने विनम्र भाव से कहा, "हे माधव! मैंने आपका विराट स्वरूप देखा, आपकी अनगिनत लीलाएँ देखीं, फिर भी मेरे मन में ऐसा लगता है कि मैं आपको पूर्ण रूप से कभी जान ही नहीं पाया। आपकी महिमा अनंत है। यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे अपने किसी ऐसे दिव्य रहस्य का दर्शन कराइए, जिसे आज तक किसी ने न देखा हो।" भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने अर्जुन की ओर प्रेम से देखा। वे जानते थे कि यह प्रश्न अहंकार से नहीं, बल्कि सच्ची जिज्ञासा और भक्ति से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, "पार्थ, परमात्मा को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता। मैं केवल मनुष्य नहीं हूँ, केवल देवता नहीं हूँ, केवल विराट ब्रह्मांड भी नहीं हूँ। मैं समस्त सृष्टि में विद्यमान हूँ। यदि तुम्हारा मन वास्तव में इस सत्य को समझने के लिए तैयार है, तो आज मैं तुम्हें अपना एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमय स्वरूप दिखाऊँगा।" इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया प्रकट की। अचानक वातावरण बदलने लगा। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृक्ष स्थिर हो गए, वायु रुक गई और समय मानो थम गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान का सामान्य मानवीय स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। उनके सामने जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य से स्तब्ध रह गए। उन्होंने ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था। भगवान का यह अद्भुत स्वरूप नवगुंजर कहलाया। यह किसी एक प्राणी का शरीर नहीं था, बल्कि नौ विभिन्न जीवों के दिव्य अंगों से निर्मित था। उनके मुख पर मुर्गे का सिर था, जो जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक था। उनकी गर्दन मोर की थी, जो सौंदर्य, दिव्यता और आनंद का प्रतीक मानी जाती है। उनके शरीर पर बैल का कूबड़ था, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था। उनकी कमर सिंह की थी, जो वीरता और निर्भीकता का प्रतीक थी। उनके तीन पैर हाथी के थे, जो स्थिरता, बुद्धिमत्ता और अपार शक्ति को दर्शाते थे। चौथा पैर बाघ का था, जो साहस, गति और संकल्प का प्रतीक था। उनकी पूँछ सर्प की भाँति लहराती थी, जो समय, ऊर्जा और अनंत शक्ति का संकेत देती थी। उनके शरीर में अन्य पशु-पक्षियों के दिव्य अंग भी समाहित थे, जो समस्त जीवों की एकता का प्रतीक थे। उनके एक हाथ में पूर्ण विकसित कमल का पुष्प सुशोभित था, जो पवित्रता, ज्ञान और परम चेतना का प्रतीक था। अर्जुन कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाए कि उनके सामने कौन खड़ा है। यह कोई देवता था, कोई दिव्य प्राणी था या स्वयं प्रकृति का अद्भुत रूप? उनके हाथ अनायास ही गांडीव पर चले गए, किंतु अगले ही क्षण उनकी दृष्टि भगवान के हाथ में धारण किए हुए कमल पर पड़ी। उसी क्षण उनके हृदय में दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने उस रूप से वही करुणा, वही प्रेम और वही अनंत तेज अनुभव किया, जो सदैव भगवान श्रीकृष्ण से अनुभव होता था। अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण का एक अत्यंत रहस्यमय दिव्य स्वरूप है। अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव नीचे रख दिया। वे दोनों हाथ जोड़कर भगवान के चरणों में झुक गए। उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं वास्तव में आपको कभी जान ही नहीं पाया। आप किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं। आपकी महिमा तो अनंत है।" भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में कहा, "पार्थ, यही इस रूप का रहस्य है। मनुष्य प्रायः यह सोचता है कि ईश्वर केवल किसी एक मूर्ति, एक शरीर, एक जाति या एक रूप में विद्यमान हैं। परंतु सत्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक जीवन मेरे ही अस्तित्व का अंश है। जो सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। नवगुंजर का यह स्वरूप इसी सत्य का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।" भगवान आगे बोले, "मुर्गे की जागरूकता, मोर की सुंदरता, सिंह का साहस, हाथी की बुद्धि, बैल का धैर्य, बाघ की शक्ति, सर्प की ऊर्जा और अन्य सभी जीवों के गुण एक ही परम सत्य में समाहित हैं। जब तक मनुष्य भेदभाव देखता है, तब तक वह मुझे पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। जब वह प्रत्येक जीव में उसी दिव्य चेतना का दर्शन करता है, तभी वह मेरे वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है।" अर्जुन का हृदय आनंद और विनम्रता से भर गया। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान वास्तव में समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। उन्होंने भगवान के उस दिव्य नवगुंजर स्वरूप की स्तुति की और पूर्ण समर्पण के साथ कहा, "हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ कि आपका स्वरूप किसी सीमा में बँधा हुआ नहीं है। आप ही समस्त प्राणियों में, समस्त जगत में और प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं।" कुछ ही क्षणों बाद वह रहस्यमय स्वरूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा। भगवान पुनः अपने मधुर मानवीय स्वरूप में प्रकट हुए। वन का वातावरण फिर सामान्य हो गया, पक्षियों का कलरव लौट आया और समय अपनी गति से चलने लगा। किंतु अर्जुन का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हो चुका था, जो केवल भगवान की विशेष कृपा से ही संभव था। समय बीतता गया। युग बदल गए। किंतु इस अद्भुत नवगुंजर स्वरूप की स्मृति विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में जीवित रही। ओड़िया साहित्य के महान कवि सरला दास द्वारा रचित सरला महाभारत में इस दिव्य प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति, समस्त जीवों की एकता और परम चेतना के प्रतीक के रूप में बताया गया है। ओडिशा की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ भी उसी अनंत और सर्वव्यापक परम तत्व के प्रतीक हैं। इसी कारण अनेक विद्वान और भक्त भगवान जगन्नाथ की परंपरा में नवगुंजर की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। विशेष रूप से श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पवित्र नीलचक्र को भगवान की अनंत, रहस्यमयी और सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अनेक श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि जैसे नवगुंजर रूप समस्त सृष्टि की एकता का संदेश देता है, वैसे ही भगवान जगन्नाथ भी किसी एक जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव-जगत के भगवान हैं। नवगुंजर की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि परमात्मा को केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीवन और संपूर्ण सृष्टि में समान रूप से विद्यमान हैं। जो व्यक्ति हर जीव में ईश्वर का दर्शन करता है, सभी के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान रखता है, वही वास्तविक भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यमय नवगुंजर स्वरूप का सबसे गहरा और सनातन संदेश है।
sn vyas
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9 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणी का स्वयं मरने के लिये उद्यत होकर पति से जीवित रहने के लिये अनुरोध करना...(दिन 459) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ब्राह्मण्युवाच न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् । न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ।। १ ।। ब्राह्मणी बोली-प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ।। १ ।। अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः । अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ।। २ ।। एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २ ।। भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते। व्यथां जहि सुबुद्धया त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ।। ३ ।। एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम्। प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ।। ४ ।। पत्नी, पुत्र और पुत्री- ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ।। ३-४ ।। तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् । भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ।। ५ ।। पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ।। ५ ।। एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव । अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ।। ६ ।। यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ।। ६ ।। यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि । कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ।। ७ ।। जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ।। ७ ।। समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा । न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ।॥ ८ ॥ इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ।। ८ ।। मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर । कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ।। ९ ।। मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर ! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ।। ९ ।। कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया । मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ।। १० ।। मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ।। १० ।। अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् । अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ।। ११ ।। जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ।। ११ ।। उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः । प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ।। १२ ।। साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः । स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ।। १३ ।। जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय में श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ।। १२-१३ ।। कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम्। पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ।। १४ ।। आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ।। १४ ।। कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् । अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।। आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्‌गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।। इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम्। अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।। जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।। तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्‌गुणैरुपबृंहिताम् । प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।। आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायेंगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।। सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः । अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।। अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती । अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।। ब्रह्मन् ! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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20 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 450) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच सा तानेवापतत् तूर्ण भगिनी तस्य रक्षसः । अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ।। अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् । अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हिडिम्बा सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेन से बोली। हिडिम्बोवाच अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ।। राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ।।) हिडिम्बाने कहा- (आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ। भीमसेन उवाच स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ।। १ ।। भीमसेन बोले-हिडिम्बे ! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ।। १ ।। युधिष्ठिर उवाच क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्म गोपाय पाण्डव ।। २ ।। यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा- पुरुषसिंह भीम ! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन ! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ।। २ ।। वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् । रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ।। ३ ।। महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ।। ३ वैशम्पायन उवाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ।। ४ ।। आयें जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् । तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ।। ५ ।। 'आयें! स्त्रियोंको इस जगत्‌में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे ! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ।। ५ ।। सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया । सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ।। ६ ।। 'मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ।। ६ ।। मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ।। ७ ।। 'शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्म का परित्याग करके आपके पुत्र पुरुष सिंह भीमसेन को अपना पति चुना है ।। ७ ।। वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ८ ।। 'यशस्विनि ! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थना को ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ।। ८ ।। तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ।। ९ ।। अतः वरवर्णिनि ! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ।। ९ ।। भर्भानेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ।। १० ।। 'महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ।। १० ।। अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ।। पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ।। अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् ।) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ।। ११ ।। पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ।। १२ ।। 'आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ।। ११-१२ ।। आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ।। १३ ।। 'जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ।। १३ ।। आपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तमः व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ।। १४ ।। 'जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️