श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ

sn vyas
1.5K views
10 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/१ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚* जीव अपने असली स्वरूप को भूल गया है , जीव ब्रह्म का ही अंश है । ब्रह्म- सत , चित्त, आनंद स्वरूप है , इसलिए जीव भी सत , चित्त , आनंद स्वरूप ही है । किंतु जीव को इसका ज्ञान नहीं है , इसलिए जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। *भगवान गीता में कहते हैं कि--* *ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।* *जीव ब्रह्म का अंश होने के बावजूद, मुक्त होने के बावजूद, माया के वशीभूत होकर बद्ध हो गया है , अर्थात बंधनों में पड़ गया है।* *जीव को अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाए, इसी का नाम "ज्ञान" है । ज्ञान होते ही उसके सभी संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं। जीव को स्वरूप का ज्ञान होना बहुत कठिन है । कोई बहुत ही समर्थ गुरु मिले , तो ही यह ज्ञान प्राप्त होता है।* *एक शेर का बच्चा जन्म लेते ही उसकी मां से अलग हो गया, और भेड़ों के मालिक ने इस नवजात शिशु को भेड़ों के साथ पाल - पोस कर बड़ा किया । यह शेर का बच्चा हमेशा भेड़ों के झुंड में ही रहता था , घूमता फिरता था, और अज्ञानता बस स्वयं को भी भेड़ ही समझता था।* *"मैं भी भेड़ ही हूं " ऐसी उसकी दृढ मान्यता हो गई थी। एक बार एक शेर घूमता -फिरता भेड़ों के झुंड के पास आया , जिसमें यह शेर का बच्चा भी था । शेर को देखकर भेड़ों का झुंड भाग खड़ा हुआ। साथ में वह शेर का बच्चा भी भाग खड़ा हुआ । यह देखकर उस शेर को आश्चर्य हुआ कि भेडो के साथ यह शेर का बच्चा क्यों भयभीत होकर भाग रहा है । शेर ने उन भेड़ों को जाने दिया और शेर के बच्चे को ही पकड़ा , तो वह बच्चा ,,, शेर के हाथ जोड़ने लगा कि " मुझे छोड़ दीजिए, मुझे मारना नहीं "।* *तब शेर ने उससे कहा : अरे भाई ,, तू भेड़ नहीं है । तू तो मेरी ही जाति का शेर है । तुझे मुझसे नहीं डरना चाहिए, मैं तुझे मार कर नहीं खाऊंगा।* *लेकिन ,,, शेर के बच्चे को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ ,, वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं और मुझे मारना नहीं"।* 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *(वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं मुझे मारना नहीं"।)* *फिर वह शेर उसे एक तालाब के किनारे ले गया और कहा कि इस तालाब के पानी में अपना मुख देखो , तेरा और मेरा मुख समान ही है या नहीं ? मैं गर्जना करूंगा, वैसे ही तू भी गर्जना करना ।* *उस शेर के बच्चे ने उस शेर की तरह ही गर्जना की । तो उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हुआ और उसी समय वह भयमुक्त होकर शेर के साथ चला गया। मानव जीवन की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है।* *जैसे सूर्य से किरण अलग होकर पूरे जगत में फैल जाती है, वैसे ही जीव भी अनादि काल से ब्रह्म से अलग हो गया है । बादल का पानी बिल्कुल साफ होता है ,, बादलों में क्षोभ होने से बूंद अलग होकर पृथ्वी पर गिरती है । आकाश से पृथ्वी पर आने तक उसमें (बीच में) ऑक्सीजन - नाइट्रोजन आदि तत्त्व मिल जाते हैं । पृथ्वी को छूते ही यह बूदे मिट्टी में मिलकर मलीन हो जाती है।* *फिर दोबारा सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बाष्पी भवन होता है । तो उसकी उर्ध्व गति होती है और बादल के रूप में वह जल पुनः अपने असली स्थान पर पहुंचकर शुद्ध और पवित्र हो जाता है । इसी तरह जीव ब्रह्म से अलग हो गया है, वह जगत की माया के संपर्क में आकर अविद्या वस मलीन हो गया है ।* *गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण में यह बात एक ही पंक्ति में समझाते हैं* *भूमि परत भा डाबर पानी।* *जिमि जीवहि माया लपटानी ॥* *पृथ्वी पर पडते ही पानी गदला हो गया , जैसे शुद्ध जीव को माया लिपट गई हो।* *शेर की तरह ही शेर के बच्चे रूपी जीव को यह समर्थ गुरु मिलता है, तब ही उसे सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है और वह कर्मों के भय से मुक्त हो जाता है।* *गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--* क्रमश: इसके बाद अब कल आगे पढेगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
2.1K views
1 months ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 🌺 भाग 1️⃣7️⃣ 🌺 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰 तो फिर मोक्ष कब ?🥰 *मानव मात्र मोक्ष का अधिकारी है , और मानव शरीर मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही मिला है । मानव शरीर धारण करके मोक्ष प्राप्त नहीं करेंगे तो फिर चौरासी लाख़ योनियों में फिर से भटकने की दशा आएगी।* *मनुष्य मात्र देह के बंधनों से छूटकर परम ब्रह्म में लीन होने की इच्छा करें तो वह समर्थ है और स्वतंत्र भी है । क्योंकि वह परात्पर ब्रह्म का ही अंश है। और उसमें ही लीन होने के लिए , मोक्ष प्राप्त करने के लिए , उसका आखिरी सर्जन हुआ है।* *किंतु जब तक वह इस जन्म के संपूर्ण प्रारब्ध भोग नहीं लेगा और पिछले अनादिकाल के अनेक जन्म जन्मांतर के जमा हुए असंख्य हिमालय भर जाए , उतने संचित कर्म के ढेर, इस जीवनकाल दरमियान साफ नहीं करेगा, भस्म नहीं करेगा, तब तक उसको बार-बार अनंत काल तक अनेक जन्म , अनेक देह, धारण करना ही पड़ेगा , और तब तक उसको मोक्ष मिल ही नहीं सकता।* *उसको मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र इच्छा हो जाए , उसको प्राप्त करना हो तो उसे तमाम संचित कर्मों का ध्वंस करना पड़ेगा । तमाम संचित कर्मों को ज्ञानाग्नि से भस्म करना पड़ेगा और वर्तमान जीवन के प्रारब्ध कर्मों को पूरी तरह से भोग लेना पड़ेगा।* *इस जीवनकाल दरमियान अभी से ही उसको नए क्रियमाण कर्म इस तरह से करने पड़ेंगे, कि करते ही तुरंत फल देकर शांत हो जाए। उसमें से एक भी क्रियमाण कर्म संचित कर्म में जमा होने नहीं पावे।* *किंतु कठिनाई यह है कि, जीव उसके जीवन काल दरमियान भोगने के पात्र हुए प्रारब्ध कर्मों को भोंगते भोंगते नए असंख्य क्रियमाण कर्म करता है जो भोगने के लिए दूसरे असंख्य जन्म धारण करने पड़ते हैं।* *इस विष -चक्र का अंत आता ही नहीं ,, इसलिए पहले तो, इस जीवनकाल दरमियान और उसके पश्चात जो जो क्रियमाण कर्म हम करें,, वह ऐसे कुशलतापूर्वक करें जिससे वह कर्म कदापि संचित में जमा न होने पावे। और वह भविष्य में नए देह के बंधन में डाले नहीं ,,, बस ऐसी कुशलतापूर्वक काम करते रहने का ही नाम योग है।* *इसलिए गीता में भगवान ने योग की व्याख्या की है कि---* *योग: कर्मसु कौशलम्* क्रमशः .... ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ
sn vyas
3.6K views
1 months ago
स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि.. #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 हरि हैं हर के रूप में, हर हैं हरि के प्राण। जो दोनों में भेद करे, सोई मूढ़ अज्ञान।। भावार्थ: भगवान कृष्ण (हरि) और महादेव (हर) एक ही हैं। महादेव कृष्ण के प्राण हैं और कृष्ण महादेव के। जो अज्ञानी इनमें अंतर समझता है, वह जीवन के परम सत्य से दूर रहता है। भक्ति सार अद्वैत भाव: सच्ची भक्ति वही है जो ईश्वर को हर रूप में देख सके। शिव और विष्णु में अंतर देखना आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है।समदृष्टि की सीख: जब तक मन में ऊंच-नीच या संप्रदायों का भेद रहेगा, तब तक वास्तविक ज्ञान (ईश्वर) की प्राप्ति नहीं हो सकती।मन की शुद्धि: यह दोहा भक्तों को कट्टरता छोड़कर शुद्ध, सरल और सर्वव्यापी प्रेम से भक्ति करने की प्रेरणा देता है। 🕉🙏जय श्रीकृष्ण हर हर महादेव!!!🙏🔱
sn vyas
873 views
1 months ago
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग०९ 🏹🎻🪔📝🦚💥🦚📝🪔🎻🏹 🥰कर्म फल देकर ही शांत होता है🥰 *मानो कि एक आदमी ने पाप कर्म किया , उसके फलस्वरूप उसके एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध निर्माण हुआ। यह प्रारब्ध उसको किसी भी तरह छोड़ेगा नहीं,, प्रारब्ध भोगने के बिना क्रियमाण कर्म शांत होता ही नहीं।* *अब अगर वह सत्वगुणी जीव है , तो वह एकादशी का व्रत करेगा, सारे दिन नारायण का स्मरण करेगा और उपवास करेगा और अपना प्रारब्ध भोग लेगा ।* *अगर वह आदमी रजोगुण है, तो एक दिन अपनी पत्नी बीमार पड़ेगी तो उसको अस्पताल में ले जाएगा, बारह बजे तक अस्पताल में ही फंसा रहेगा, बाद में भूखा प्यासा देर से ऑफिस में नौकरी के लिए दौड़ जाएगा। रात को देरी से घर आकर, बच्चों को व्याकुल देखकर, उनके सेवा करते-करते भूखा ही रात्रि को सो जाएगा और एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा।* *अगर वह आदमी तमोगुण जीव है ,तो वह दोपहर को भोजन के लिए बैठते ही "भोजन खराब बना है" कह कर थाली पटक कर अपनी पत्नी के साथ झगड़ा करेगा,, मारपीट करेगा ,, भूखा प्यासा ऑफिस जाएगा ,, वहां भी सबके साथ झगड़ेगा ,, रात को फिर वापस घर आकर पत्नी बच्चों को मारपीट करके भूखा ही सो जाएगा ,, इस रीति से एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा ।* *सतोगुणी जीव,,,, व्रत उपवास करके एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा, और साथ-साथ थोड़ा पुण्य भी प्राप्त कर लेगा, जिसका नया क्रियमाण निर्माण होता है।* *रजोगुणी जीव ,,, पत्नी बच्चों की सेवा चिंता में एक दिन भूखा रहकर प्रारब्ध भोग लेगा , वह न तो नया पुण्य पैदा करेगा, न नया पाप प्राप्त करेगा ।* *तमोगुणी जीव,,, क्लेश द्वारा एक दिन भूखा रहकर उस रीती से प्रारब्ध भोंगते हुए थोड़ा नया पाप भी पैदा करेगा,,, जिससे उसका एक नया क्रियमाण कर्म बनकर वह फिर पक कर प्रारब्ध बन कर सामने खड़ा हो जाएगा,,,* *क्रियमाण कर्म,,, पक कर फल स्वरुप प्रारब्ध बन कर सामने आता है , जो भोगना ही पड़ता है , किंतु सत्वगुनी जीव,,, रजोगुणी जीव ,,, तमोगुणी जीव, तीनों की प्रारब्ध भोगने की रीती ऊपर बताई है,,, इस प्रकार अलग अलग होती है।* *मानो कि मैंने एक पवित्र क्रियमाण कर्म किया, उसके फल के स्वरूप पाँच सौ रुपये मिलने का मेरा प्रारब्ध निर्माण हुआ है। यह प्रारब्ध जब तक में भोग नहीं लूंगा तब तक यह पाँच सौ रुपये मेरे पीछे-पीछे भ्रमण करेंगे। मुझ को पाँच सौ रुपये देकर ही वह फल शांत होगा।* *एक दिन रात को बारह बजे एक आदमी मेरे घर आकर मेरे घर का दरवाजा खटखटा कर मुझे जगा कर मुझे कहे कि --- यह पाँच सौ रुपये घूस के ले लीजिए और मेरे पिता की जमीन में से मेरे भाई का हक डुबा कर वह पूरी जमीन मेरे नाम कर दीजिए। अगर मैं तमोगुणी जीव हूं तो यह पाँच सौ रुपये घूस लेकर उसके नाजायज मांग के अनुसार उसको लाभ प्राप्त करा दूंगा।* *इस प्रकार से मेरा प्रारब्ध पाँच सौ रुपये प्राप्त करने का मैने भोग लिया और मेरा पहले का क्रियमाण कर्म प्रारब्ध बन कर फल देकर शांत हो गया । किंतु साथ-साथ मैंने एक नया पाप कर्म पैदा किया , जो कर्म पक कर प्रारब्ध रूप से एक दिन मेरे सामने अवश्य आएगा ही और मुझे भोगना पड़ेगा।* *अब अगर मैं तमोगुणी जीव नहीं हूं, तो मैं वह पाँच सौ रुपये घूस के लेने की स्पष्ट ना कह दूं फिर भी यह पाँच सौ रुपये किसी प्रकार मुझे प्राप्त हुए बिना मेरा क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से मुझे बिना फल दिए शांत होगा ही नहीं। यह पाँच सौ रुपये मेरे पीछे-पीछे भ्रमण करेंगे।* *एक दिन एक गरज वाला आदमी मेरे पास आकर और मेरा मकान जिसे मैंने तीस हजार में बेचने का तय किया था, उसके लिए 30500 मुझे देकर सौदा करेगा । इस तरह अगर मैं रजोगुणी जीव हूं तो मुझे ज्यादा पाँच सौ रुपये दिला कर मेरा क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से मुझे फल भुगता कर शांत हो जाएगा।* *किंतु अगर मैं रजोगुण जीव नहीं हूं तो मैं बचन से बध्द होने के नाते तीस हजार रुपये से ज्यादा रकम लेने का मैं इनकार करूंगा, और इस तरह जब पाँच सौ रुपये ज्यादा लेने का मैं इनकार करुगा उस समय मेरा प्रारब्ध पीछे धकेल दिया जाएगा। तो भी वह पाँच सौ रुपये जब तक मुझे प्राप्त नहीं होंगे तब तक मेरा क्रियमाण कर्म मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा।* *मैं एसटी बस का कंडक्टर हूं, एक पैसैजर अपनी एक लाख़ रुपये की थैली मेरी बस में गलती से छोड़ जाता है, वह थैली लेकर मैं उसको देने के लिए गया उसके बदले में बहुत ही प्रेम से और आग्रह पूर्वक उसने मुझे पाँच सौ रुपये इनाम के रूप में दिए, और सत्तवगुणी जीव होने के नाते दिए हुए पैसे का मैंने स्वीकार किया और इस रीति से मेरा पाँच सौ रुपये प्राप्त करने का प्रारब्ध मैने भोग लिया और साथ-साथ मैंने थोड़ा पुण्य कमा लिया।* *इस तरह किसी प्रकार से भी पाँच सौ रुपये दिला कर ही मेरा पहले का क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से फल देकर शांत हो गया, अगर मैं तमोगुणी जीव हूं, तो घूस लेकर मेरा प्रारब्ध भोग लू, और अगर मैं सतोगुणी जीव हूं तो किसी को संतोष से तृप्त कर प्रारब्ध भोग लू,* *उपरोक्त रीती से सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी, जीव की प्रारब्ध भोगने की रीति अलग-अलग होती है, किंतु उन तीनों प्रकार के जीवो को प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है,, और तभी वह कर्म शांत होगा।* " कर्म फल देकर ही शांत होता है " का विश्राम ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ