sn vyas
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बालखिल्य ऋषि कौन थे और उनका रूप कैसा था?
सृष्टि के प्रारंभ में, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि क्रतु का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सन्नति से हुआ था। माता सन्नति के गर्भ से साठ हजार पुत्रों का जन्म हुआ। ये सभी पुत्र ही आगे चलकर 'बालखिल्य ऋषि' कहलाए।
इन ऋषियों की शारीरिक बनावट और जीवनशैली अत्यंत अनोखी थी…इनका शरीर मात्र एक अंगूठे के बराबर था। भले ही इनका कद छोटा था, लेकिन उनकी तपस्या का तेज इतना भयानक था कि वे अपनी दृष्टि मात्र से पूरी सृष्टि को भस्म कर सकते थे।
वे अन्न नहीं खाते थे। पत्तों पर गिरने वाली ओस की बूंदें पीकर और हवा खाकर वे जीवित रहते थे। उन्होंने अपनी सभी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी।
ब्रह्मांड के नियम के अनुसार, ये साठ हजार ऋषि रोजाना भगवान सूर्य के रथ के आगे-आगे, सूर्य देव की तरफ मुख करके उल्टे चलते हैं। वे चलते-चलते सामवेद की ऋचाओं का पाठ करते हैं। ऐसा इसलिए है ताकि सूर्य देव का प्रचंड तेज नियंत्रित रहे और पृथ्वी उनकी गर्मी से झुलस न जाए।
यह घटना सतयुग की है। प्रजापति कश्यप जो देवताओं और असुरों दोनों के पिता हैं, एक महाप्रतापी पुत्र चाहते थे। इस इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने एक विशाल 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' का आयोजन किया।इस महायज्ञ के लिए सूखी लकड़ियां (समिधा) लाने का काम देवताओं, गंधर्वों और सभी ऋषियों को सौंपा गया। सभी अपनी-अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार लकड़ियों के बड़े-बड़े गट्ठर ला रहे थे।
देवराज इंद्र को अपनी असीम शक्ति पर बहुत घमंड था। वे पलक झपकते ही पहाड़ों जैसी भारी लकड़ियों के गट्ठर उठाकर यज्ञशाला में लाकर पटक रहे थे।तभी रास्ते में इंद्र ने एक अजीब दृश्य देखा।
साठ हजार बालखिल्य ऋषि एक कतार में चले आ रहे थे। उन सब ने मिलकर पलाश के पेड़ की एक छोटी सी सूखी टहनी को अपने कंधों पर उठाया हुआ था। अपने छोटे-छोटे पैरों के कारण उन्हें वह सूखी लकड़ी भी पहाड़ जैसी भारी लग रही थी। वे पूरी ताकत लगाकर "हरि ॐ" का जाप करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
तभी रास्ते में एक गाय के पैर के खुर के कारण जमीन में एक छोटा सा गड्ढा बन गया था, जिसमें बारिश का थोड़ा सा पानी भरा हुआ था इसे शास्त्रों में 'गोष्पद' कहा गया है…एक आम इंसान के लिए वह महज एक चम्मच पानी था, लेकिन अंगूठे के आकार के बालखिल्य ऋषियों के लिए वह एक उफनती हुई विशाल नदी जैसा था।
जैसे ही ऋषियों ने उसे पार करने की कोशिश की, वे असंतुलित होकर उस पानी में गिर गए। वे अपनी धोती और जटाओं को बचाते हुए, उस पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगे।
ऊपर आकाश से उड़ते हुए देवराज इंद्र ने जब यह नजारा देखा। अपने बल के घमंड में चूर इंद्र अपनी हंसी रोक नहीं पाए। वे जोर-जोर से हंसने लगे और बोले
"अरे! ये कैसे ऋषि हैं, जो एक गाय के पैर के गड्ढे में डूब रहे हैं? ऐसे लोग यज्ञ में क्या योगदान देंगे!"
इंद्र ने न सिर्फ उनका मजाक उड़ाया, बल्कि उन्हें लांघकर यानी उनके ऊपर से पैर बढ़ाकर आगे निकल गए, जो कि ऋषियों का घोर अपमान था।
इस अपमान ने बालखिल्य ऋषियों के भीतर के ब्रह्मतेज की अग्नि को भड़का दिया। वे पानी से बाहर निकले और उनके चेहरे क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने कहा
"इंद्र को अपने पद और बल का इतना घमंड है कि वह भूल गया कि तपस्या की शक्ति क्या होती है। हम इसी समय इस इंद्र का अंत करेंगे।"
सभी 60,000 ऋषियों ने तुरंत उसी गड्ढे के जल को हाथ में लिया और मंत्र पढ़ते हुए एक समानांतर यज्ञ शुरू कर दिया।
उन्होंने संकल्प लिया कि "हम अपने जीवन की संपूर्ण तपस्या की आहुति देते हैं। इस यज्ञ से एक ऐसा 'नया इंद्र' पैदा होगा, जो मौजूदा देवराज इंद्र से सौ गुना ज्यादा शक्तिशाली, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। वह इस अहंकारी इंद्र को स्वर्ग के सिंहासन से खींचकर नीचे फेंक देगा और खुद देवताओं का राजा बनेगा।"
ऋषियों के इस संकल्प की गूंज से तीनों लोक कांपने लगे। इंद्र का राजसिंहासन डोल गया और स्वर्ग में हाहाकार मच गया। ऋषियों का वचन कभी खाली नहीं जा सकता था।
घबराए और थर-थर कांपते हुए देवराज इंद्र सीधे अपने पिता महर्षि कश्यप के चरणों में जा गिरे और अपनी जान की भीख मांगने लगे।
कश्यप जी तुरंत बालखिल्य ऋषियों के पास पहुंचे।कश्यप मुनि ने ऋषियों को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले कि
"हे महान तपस्वियों! आपका क्रोध उचित है। इंद्र ने अज्ञानतावश यह पाप किया है। लेकिन यदि ब्रह्मांड में दो इंद्र हो गए, तो ब्रह्मा जी का बनाया नियम टूट जाएगा और पूरी प्रकृति नष्ट हो जाएगी। कृपया कोई बीच का रास्ता निकालें।"
बालखिल्य ऋषियों ने कहा कि "हे महर्षि, हम आपका सम्मान करते हैं। लेकिन ऋषियों का संकल्प कभी झूठा नहीं होता। 'इंद्र' तो पैदा होकर ही रहेगा।"
तब महर्षि कश्यप ने एक अद्भुत समाधान निकाला। उन्होंने कहा कि
“आपकी बात भी सच रहे और सृष्टि भी बची रहे, इसके लिए आप ऐसा वरदान दें कि जो नया शक्तिशाली जीव पैदा हो, वह देवताओं का इंद्र न बनकर 'पक्षियों का इंद्र' बने। इस तरह आपका वचन भी पूरा हो जाएगा और देवराज का पद भी बच जाएगा।"
बालखिल्य ऋषि शांत हुए और उन्होंने कश्यप मुनि की बात मान ली। उन्होंने अपने यज्ञ की पूरी ऊर्जा और 'पक्षियों के राजा' का वरदान महर्षि कश्यप को सौंप दिया।
कश्यप मुनि ने वह दिव्य ऊर्जा अपनी पत्नी विनता को सौंप दी। इसी तपोबल के प्रभाव से विनता के गर्भ से एक विशाल अंडा उत्पन्न हुआ, जिससे आगे चलकर पक्षीराज गरुड़ का जन्म हुआ।
गरुड़ इतने शक्तिशाली थे कि उनके पंखों की फड़फड़ाहट से पहाड़ हिल जाते थे। उन्होंने बाद में अकेले ही स्वर्ग पर आक्रमण करके देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं को हरा दिया था और वहां से अमृत कलश छीन लाए थे।
इस प्रकार बालखिल्य ऋषियों का वह वचन सच साबित हुआ कि नए इंद्र के सामने वर्तमान इंद्र टिक नहीं पाएंगे। बाद में भगवान विष्णु ने गरुड़ की शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपना वाहन और ध्वज बनाया।
यह कथा हमें सिखाती है कि कभी भी किसी के बाहरी आकार, रूप या कद को देखकर उसकी आंतरिक क्षमता का उपहास नहीं उड़ाना चाहिए। पद और शक्ति का अहंकार बड़े से बड़े राजा को भी मिट्टी में मिला देता है।
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🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🙏
#पौराणिक कथा
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