sn vyas
685 views • 12 days ago
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
〰️〰️🌼〰️〰️
।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
माता कुन्ती के लिये भीमसेन का जल ले आना, माता और भाइयों को भूमि पर सोये देखकर भीम का विषाद एवं दुर्योधन के प्रति क्रोध...(दिन 440)
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
वैशम्पायन उवाच
तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम् ।
वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! भीमसेनके चलते समय उनके महान् वेगसे आन्दोलित हो वृक्ष और शाखाओंसहित वह सम्पूर्ण वन घूमता-सा प्रतीत होने लगा ।। १ ।।
जङ्घावातो ववौ चास्य शुचिशुक्रागमे यथा ।
आवर्जितलतावृक्ष मार्ग चक्रे महाबलः ।। २ ॥
जैसे ज्येष्ठ और आषाढ़ मासके संधिकालमें जोर-जोरसे हवा चलने लगती है, उसी प्रकार उनकी पिंडलियोंके वेगपूर्वक संचालनसे आँधी-सी उठ रही थी। महाबली भीम जिस मार्गसे चलते, वहाँकी लताओं और वृक्षोंको पैरोंसे रौंदकर जमीनके बराबर कर देते थे ।। २ ।।
स मृद्मन् पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् ।
अवरुज्य ययौ गुल्मान् पथस्तस्य समीपजान् ।। ३ ।।
उनके मार्गके निकट जो फल और फूलोंसे लदे हुए वनस्पति एवं गुल्म आदि होते, उन्हें तोड़कर वे पैरों से रौंदते जाते थे ।। ३ ।।
स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन् महाद्रुमान् । त्रिप्रसुतमदः शुष्मी षष्टिवर्षी मतङ्गराट् ।। ४ ।।
जैसे तीन अंगोंसे मद बहानेवाला साठ वर्षका तेजस्वी गजराज (किसी कारणसे) कुपित हो वनके बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ने लगता है, उसी प्रकार महातेजस्वी भीमसेन उस वनके विशाल वृक्षोंको धराशायी करते हुए आगे बढ़ रहे थे ।। ४ ।।
गच्छतस्तस्य वेगेन तार्थ्यमारुतरंहसः ।
भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूच्छेव समजायत ।। ५ ।।
गरुड़ और वायुके समान तीव्र गतिवाले भीमसेन के चलते समय उनके (महान्) वेग से अन्य पाण्डुपुत्रों को मूर्च्छा-सी आ जाती थी ।। ५ ।।
असकृच्चापि संतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः । पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात् तदा ।। ६ ।।
मार्गमें आये हुए जल-प्रवाहको, जिसका पाट दूरतक फैला होता था, दोनों भुजाओंके बेड़ेद्वारा ही बारंबार पार करके वे सब पाण्डव दुर्योधनके भयसे किसी गुप्त स्थानमें जाकर रहते थे ।। ६ ।।
कृच्छ्रेण मातरं चैव सुकुमारीं यशस्विनीम् । अवहत् स तु पृष्ठेन रोधस्तु विषमेषु च ।। ७ ।।
भीमसेन अपनी सुकुमारी एवं यशस्विनी माता कुन्तीको पीठपर बिठाकर नदीके ऊँचे-नीचे कगारोंपर बड़ी कठिनाईसे ले जाते थे ।। ७ ।।
अगमच्च वनोद्देशमल्पमूलफलोदकम् ।
क्रूरपक्षिमृगं घोरं सायाले भरतर्षभ ।। ८ ।।
भरतश्रेष्ठ ! वे संध्या होते-होते वनके ऐसे भयंकर प्रदेशमें जा पहुँचे, जहाँ फल-मूल और जलकी बहुत कमी थी। वहाँ क्रूर स्वभाववाले पक्षी और हिंसक पशु रहते थे ।। ८ ।।
घोरा समभवत् संध्या दारुणा मृगपक्षिणः । अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः ।। ९ ।।
वह संध्या बड़ी भयानक प्रतीत होती थी। क्रूर स्वभाववाले पशु और पक्षी वहाँ वास करते थे। बिना ऋतुकी प्रचण्ड हवाओंके चलनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ (धूलसे आच्छादित हो) अन्धकारपूर्ण हो रही थीं ।। ९ ।।
शीर्णपर्णफलै राजन् बहुगुल्मक्षुपैर्दुमैः । भग्नावभग्नभूयिष्ठैर्नानाद्रुमसमाकुलैः ।। १० ।।
राजन् ! (हवाके झोंकोंसे) वनके बहुसंख्यक छोटे-बड़े वृक्ष और गुल्म-लता आदि झुक-झुककर टूट गये थे। उनके पत्ते और फल इधर-उधर बिखर गये थे और उनपर पक्षी शब्द कर रहे थे। इन सबके कारण सम्पूर्ण दिशाओंमें अँधेरा छा रहा था ।। १० ।।
ते श्रमेण च कौरव्यास्तृष्णया च प्रपीडिताः । नाशक्नुवंस्तदा गन्तुं निद्रया च प्रवृद्धया ।। ११ ।।
वे कुरुकुलरत्न पाण्डव उस समय अधिक परिश्रम और प्यासके कारण बहुत कष्ट पा रहे थे। थकावटसे उनकी नींद भी बहुत बढ़ गयी थी, जिससे पीड़ित होकर वे आगे जानेमें असमर्थ हो गये ।। ११ ।।
न्यविशन्त हि ते सर्वे निरास्वादे महावने ।
ततस्तृषापरिक्लान्ता कुन्ती पुत्रानथाब्रवीत् ।। १२ ।।
तब उन सबने उस नीरस विशाल जंगलमें डेरा डाल दिया। तत्पश्चात् प्याससे पीड़ित
कुन्तीदेवी अपने पुत्रोंसे बोली- ।। १२ ।।
माता सती पाण्डवानां पञ्चानां मध्यतः स्थिता । तृष्णया हि परीतास्मि पुत्रान् भृशमथाब्रवीत् ।। १३ ।।
'मैं पाँच पाण्डुपुत्रोंकी माता हूँ और उन्हींके बीचमें स्थित हूँ, तो भी प्याससे व्याकुल हूँ' इस प्रकार कुन्तीदेवीने अपने बेटोंके समक्ष यह बात बार-बार दुहरायी ।। १३ ।।
तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात् प्रजल्पितम् । कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे ।। १४ ।।
माताका वात्सल्यसे कहा हुआ वह वचन सुनकर भीमसेनका हृदय करुणासे भर आया। वे मन-ही-मन संतप्त हो उठे और स्वयं ही (पानी लानेके लिये) जानेकी तैयारी करने लगे ।। १४ ।।
क्रमशः...
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
#महाभारत
19 likes
13 shares