sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः विदुरजी के भेजे हुए नाविक का पाण्डवों को गंगाजी के पार उतारना...(दिन 436) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नेव काले तु यथासम्प्रत्ययं कविः । विदुरः प्रेषयामास तद् वनं पुरुषं शुचिम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! इसी समय परम ज्ञानी विदुरजीने अपने विश्वासके अनुसार एक शुद्ध विचारवाले पुरुषको उस वनमें भेजा ।। १ ।। स गत्वा तु यथोद्देशं पाण्डवान् ददृशे वने । जनन्या सह कौरव्य मापयानान् नदीजलम् ।। २ ।। कुरुनन्दन ! उसने विदुरजीके बताये अनुसार ठीक स्थानपर पहुँचकर वनमें मातासहित पाण्डवोंको देखा, जो नदीमें कितना जल है, इसका अनुमान लगा रहे थे ।। २ ।। विदितं तन्महाबुद्धेर्विदुरस्य महात्मनः । ततस्तस्यापि चारेण चेष्टितं पापचेतसः ।। ३ ।। ततः प्रवासितो विद्वान् विदुरेण नरस्तदा । पार्थानां दर्शयामास मनोमारुतगामिनीम् ।। ४ ।। सर्ववातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् । शिवे भागीरथीतीरे नरैर्विसम्भिभिः कृताम् ।। ५ ।। परम बुद्धिमान् महात्मा विदुर को गुप्तचर द्वारा उस पापासक्त पुरोचन की चेष्टाओं का भी पता चल गया था। इसीलिये उन्होंने उस समय उस बुद्धिमान् मनुष्यको वहाँ भेजा था। उसने मन और वायुके समान वेगसे चलनेवाली एक नाव पाण्डवोंको दिखायी, जो सब प्रकारसे हवाका वेग सहनेमें समर्थ और ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थी। उस नौकाको चलानेके लिये यन्त्र लगाया गया था। वह नाव गंगाजीके पावन तटपर विद्यमान थी और उसे विश्वासी मनुष्योंने बनाकर तैयार किया था ।। ३-५ ।। ततः पुनरथोवाच ज्ञापकं पूर्वचोदितम् । युधिष्ठिर निबोधेदं संज्ञार्थ वचनं कवेः ।। ६ ।। तदनन्तर उस मनुष्यने कहा- 'युधिष्ठिरजी! ज्ञानी विदुरजीके द्वारा पहले कही हुई यह बात, जो मेरी विश्वसनीयताको सूचित करनेवाली है, पुनः सुनिये। मैं आपको संकेतके तौरपर स्मरण दिलानेके लिये इसे कहता हूँ।। ६ ।। कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः। न हन्तीत्येवमात्मानं यो रक्षति स जीवति ।। ७ ।। '(तुमसे विदुरजीने कहा था-) 'घास-फूस तथा सूखे वृक्षोंके जंगलको जलानेवाली और सर्दीको नष्ट कर देनेवाली आग विशाल वनमें फैल जानेपर भी बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जन्तुओंको नहीं जला सकती। यों समझकर जो अपनी रक्षाका उपाय करता है, वही जीवित रहता है' ।। ७ ।। तेन मां प्रेषितं विद्धि विश्वस्तं संज्ञयानया। भूयश्चैवाह मां क्षत्ता विदुरः सर्वतोऽर्थवित् ।। ८ ।। कर्णं दुर्योधनं चैव भ्रातृभिः सहितं रणे । शकुनिं चैव कौन्तेय विजेतासि न संशयः ।। ९ ।। 'इस संकेतसे आप यह जान लें कि 'मैं विश्वास पात्र हूँ और विदुरजीने ही मुझे भेजा है।' इसके सिवा, सर्वतोभावेन अर्थसिद्धिका ज्ञान रखनेवाले विदुरजीने पुनः मुझसे आपके लिये यह संदेश दिया कि 'कुन्ती-नन्दन ! तुम युद्ध में भाइयों सहित दुर्योधन, कर्ण और शकुनि को अवश्य परास्त करोगे, इसमें संशय नहीं है ।। ८-९ ।। इयं वारिपथे युक्ता नौरप्सु सुखगामिनी । मोचयिष्यति वः सर्वानस्माद् देशान्न संशयः ।। १० ।। 'यह नौका जलमार्गके लिये उपयुक्त है। जलमें यह बड़ी सुगमतासे चलनेवाली है। यह नाव तुम सब लोगोंको इस देशसे दूर छोड़ देगी, इसमें संदेह नहीं है' ।। १० ।। अथ तान् व्यथितान् दृष्ट्वा सह मात्रा नरोत्तमान् । नावमारोप्य गङ्गायां प्रस्थितानब्रवीत् पुनः ।। ११ ।। इसके बाद मातासहित नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको अत्यन्त दुःखी देख नाविकने उन सबको नावपर चढ़ाया और जब वे गंगाके मार्गसे प्रस्थान करने लगे, तब फिर इस प्रकार कहा ।। ११ ।। विदुरो मूर्युपाघ्राय परिष्वज्य वचो मुहुः । अरिष्टं गच्छताव्यग्राः पन्थानमिति चाब्रवीत् ।। १२ ।। 'विदुरजीने आप सभी पाण्डुपुत्रोंको भावनाद्वारा हृदयसे लगाकर और मस्तक सूँघकर यह आशीर्वाद फिर कहलाया है कि 'तुम शान्तचित्त हो कुशलपूर्वक मार्गपर बढ़ते जाओ' ।। १२ ।। इत्युक्त्वा स तु तान् वीरान् पुमान् विदुरचोदितः । तारयामास राजेन्द्र गङ्गां नावा नरर्षभान् ।। १३ ।। राजेन्द्र ! विदुरजीके भेजनेसे आये हुए उस नाविकने उन शूरवीर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंसे ऐसी बात कहकर उसी नावसे उन्हें गंगाजीके पार उतार दिया ।। १३ ।। तारयित्वा ततो गङ्गां पारं प्राप्तांश्च सर्वशः । जयाशिषः प्रयुज्याथ यथागतमगाद्धि सः ।। १४ ।। पार उतारनेके पश्चात् जब वे गंगाजीके दूसरे तटपर जा पहुँचे, तब उन सबके लिये 'जय हो, जय हो' यह आशीर्वाद सुनाकर वह नाविक जैसे आया था, उसी प्रकार लौट गया ।। १४ ।। पाण्डवाश्च महात्मानः प्रतिसंदिश्य वै कवेः । गङ्गामुत्तीर्य वेगेन जग्मुर्मूढमलक्षिताः ।। १५ ।। महात्मा पाण्डव भी विद्वान् विदुरजीको उनके संदेशका उत्तर देकर गंगापार हो अपनेको छिपाते हुए वेगपूर्वक वहाँसे चल दिये। कोई भी उन्हें देख या पहचान न सका ।। १५ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि गङ्गोत्तरणे अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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