sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः विदुर के भेजे हुए खनक द्वारा लाक्षागृह में सुरंग का निर्माण...(दिन 433) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः । वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् ।। १३ ।। इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् । प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत् ।। १४ ।। 'यह उस दुरात्मा का अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ आयुधागार है। इसीके सहारे इस महान् गृहका निर्माण किया गया है। इसमें चहारदीवारी के निकट तक कहीं कोई बाहर निकलने का मार्ग नहीं है। अवश्य ही दुर्योधन का यह अशुभ कर्म, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, पहले ही विदुरजीको मालूम हो गया था। इसीलिये उन्होंने हमें इसकी जानकारी करा दी ।। १३-१४ ।। सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान् पुरा । पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय ।। १५ ।। 'विदुरजीकी दृष्टिमें जो बहुत पहले आ चुकी थी, वही यह विपत्ति आज हमलोगोंपर आयी-की-आयी है। तुम हमें इस संकटसे इस तरह मुक्त करो, जिससे पुरोचनको हमारे विषयमें कुछ भी पता न चले' ।। १५ ।। स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः। परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम् ।। १६ ।। तब उस सुरंग खोदनेवालेने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा', यह प्रतिज्ञा की और कार्यसिद्धिके प्रयत्नमें लग गया। खाईकी सफाई करनेके व्याजसे उसने एक बहुत बड़ी सुरंग तैयार कर दी ।। १६ ।। चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्येनातिमहद् बिलम् । कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत ।। १७ ।। भारत ! उसने उस भवनके ठीक बीचसे वह महान् सुरंग निकाली। उसके मुहानेपर किवाड़ लगे थे। वह भूमिके समान सतहमें ही बनी थी; अतः किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ।। १७ ।। पुरोचनभयादेव व्यदधात् संवृतं मुखम् । स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा । तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप ।। १८ ।। दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद् वनम् । विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम्। अतुष्टा तुष्टवद् राजन्नूषुः परमविस्मिताः ।। १९ ।। पुरोचनके भयसे उस सुरंग खोदनेवालेने उसके मुखको बंद कर दिया था। दुष्टबुद्धि पुरोचन सर्वदा मकानके द्वारपर ही निवास करता था और पाण्डवगण भी रात्रिके समय शस्त्र सँभाले सावधानीके साथ उस द्वारपर ही रहा करते थे। (इसलिये पुरोचनको आग लगानेका अवसर नहीं मिलता था।) वे दिनमें हिंस्र पशुओंके मारनेके बहाने एक वनसे दूसरे वनमें विचरते रहते थे। पाण्डव भीतरसे तो विश्वास न करनेके कारण सदा चौकन्ने रहते थे, परंतु ऊपरसे पुरोचनको ठगनेके लिये विश्वस्तकी भाँति व्यवहार करते थे। राजन् ! वे संतुष्ट न होते हुए भी संतुष्टकी भाँति निवास करते और अत्यन्त विस्मययुक्त रहते थे ।। १८-१९ ।। न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः । अन्यत्र विदुरामात्यात् तस्मात् खनकसत्तमात् ।। २० ।। विदुरके मन्त्री और खोदाईके काममें श्रेष्ठ उस खनकको छोड़कर नगरके निवासी भी पाण्डवोंके विषयमें कुछ नहीं जान पाते थे ।। २० ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहवासे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहवासविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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