यथार्थ गीता

Jagdish Sharma
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7 घंटे पहले
।। ॐ ।। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ वस्तुतः सब भूत भी मुझमें स्थित नहीं हैं क्योंकि वे मरणधर्मा हैं, प्रकृति के आश्रित हैं; किन्तु मेरी योगमाया के ऐश्वर्य को देख कि जीवधारियों को उत्पन्न और पोषण करनेवाला मेरा आत्मा भूतों में स्थित नहीं है। मैं आत्मस्वरूप हूँ, इसलिये मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। यही योग का प्रभाव है। इसको स्पष्ट करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण दृष्टान्त देते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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1 दिन पहले
।। ॐ ।। मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ मुझ अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत् व्याप्त है अर्थात् मैं जिस स्वरूप में स्थित हूँ, वह सर्वत्र व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थान पाये हैं किन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ; क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप में स्थित हूँ। महापुरुष जिस अव्यक्त स्वरूप में स्थित हैं, वहीं से (शरीर छोड़कर उसी अव्यक्त स्तर से ही) बात करते हैं। इसी क्रम में आगे कहते हैं-"यथार्थ गीता" #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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2 दिन पहले
जो महापुरुष प्रकृति का विलय करके स्वरूप में प्रवेश पा गया, उसकी प्रकृति कैसी? क्या उसमें प्रकृति शेष ही है? नहीं, अध्याय ३/३३ में योगेश्वर श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि सभी प्राणी अपनी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। जैसा उनके ऊपर प्रकृति के गुणों का दबाव है, वैसा करते हैं और 'ज्ञानवानपि'-प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जानकारीवाला ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के सदृश चेष्टा करता है। वह पीछेवालों के कल्याण के लिये करता है। पूर्णज्ञानी तत्त्वस्थित महापुरुष की रहनी ही उसकी प्रकृति है। वह अपने इसी स्वभाव में बरतता है। कल्प के क्षय में लोग महापुरुष की इसी रहनी को प्राप्त होते हैं। महापुरुष के इसी कृतित्व पर पुनः प्रकाश डालते हैं-"यथार्थ गीता" #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏 #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #यथार्थ गीता
Jagdish Sharma
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3 दिन पहले
।। ॐ ।। यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान। ठीक इसी प्रकार मैं आकाशवत् निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता है? इस पर कहते हैं-"यथार्थ गीता" #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🧘सदगुरु जी🙏
Jagdish Sharma
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27 दिन पहले
।। ॐ ।। प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ जो निरन्तर उस परमात्मा का स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरुष 'प्रयाणकाले'- मन के विलीन अवस्थाकाल में योगबल से अर्थात् उसी नियत कर्म के आचरण द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राण को भली प्रकार स्थापित करके (प्राण-अपान को भली प्रकार सम करके, न अन्दर से उद्वैग पैदा हो न बाह्य संकल्प कोई लेनेवाला हो, सत्-रज-तम भली प्रकार शान्त हों, सुरत इष्ट में ही स्थित हो, उस काल में) वह अचल मन अर्थात् स्थिर बुद्धिवाला पुरुष उस दिव्यपुरुष परमात्मा को प्राप्त होता है। सतत स्मरणीय है कि उसी एक उसके लिये नियत क्रिया का आचरण ही योगक्रिया है, जिसका सविस्तार वर्णन योगेश्वर ने चौथे-छठें अध्याय में किया है। अभी उन्होंने कहा- "निरन्तर मेरा ही स्मरण कर।" कैसे करे? तो इसी योग-धारणा में स्थिर रहते हुए करना है। ऐसा करनेवाला दिव्यपुरुष को ही प्राप्त होता है, जो कभी विस्मृत नहीं होता। यहाँ इस प्रश्न का समाधान हुआ कि आप प्रयाणकाल में किस प्रकार जानने में आते हैं? पाने योग्य पद का चित्रण देखें, जो गीता में स्थान-स्थान पर आया है- #यथार्थ गीता #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏