।। ॐ ।।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥
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पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। अतः यह गीता मनुष्यमात्र के लिये है, चाहे वह कुछ भी करता हो, कहीं भी पैदा हुआ हो। सबके लिये यह एक समान कल्याण का उपदेश करती है। गीता सार्वभौम है। पापयोनि- अध्याय १६/७-२१ में आसुरी वृत्ति के लक्षणों के अन्तर्गत भगवान ने बताया कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भ से यजन करते हैं, वे नरों में अधम हैं। यज्ञ है नहीं किन्तु नाम दे रखा है और दम्भ से यजन करता है वह क्रूरकर्मी और पापाचारी (पापयोनि) है। जो मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं वही पापी हैं। वैश्य और शूद्र भगवत्पथ की सीढ़ियाँ हैं। स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, कभी हीनता की भावना समाज में रही है, इसीलिये श्रीकृष्ण ने इनका नाम लिया। योग-प्रक्रिया में स्त्री और पुरुष दोनों का समान ही प्रवेश है।