कार्य

sn vyas
535 views
11 hours ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है #धर्म कर्म कर्म और भाग्य में क्या अंतर है? मनुष्य के जीवन में दो शब्द बहुत गहरे हैं—कर्म और भाग्य। अक्सर जब जीवन में कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता, तो हम कहते हैं—“यह मेरा भाग्य है।” और जब सफलता मिलती है तो कहते हैं—“यह मेरे कर्मों का फल है।” लेकिन सनातन दर्शन की दृष्टि से कर्म और भाग्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही जीवन-यात्रा की दो कड़ियाँ हैं। सरल शब्दों में— कर्म वह है जो हम करते हैं, और भाग्य वह है जो हमारे किए हुए कर्मों का परिणाम बनकर हमारे सामने आता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात् मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, फल पर नहीं। कर्म क्या है? हमारे विचार, निर्णय, वाणी और कार्य—सब कर्म के अंतर्गत आते हैं। हम किसी के साथ प्रेम करते हैं, किसी की सहायता करते हैं, सत्य बोलते हैं, परिश्रम करते हैं—ये शुभ कर्म हैं। इसके विपरीत छल, हिंसा, अहंकार, अन्याय और किसी को जान-बूझकर दुःख देना अशुभ कर्म हैं। कर्म का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि उसका फल हमेशा तुरंत दिखाई नहीं देता। बीज आज बोया जाता है, वृक्ष कल बनता है, और फल उसके बाद मिलता है। इसी प्रकार कर्म आज होता है, लेकिन उसका परिणाम कभी-कभी बहुत बाद में सामने आता है। फिर भाग्य क्या है? भाग्य को केवल “किस्मत” समझ लेना अधूरा है। सनातन विचार के अनुसार हमारे वर्तमान जीवन की परिस्थितियों पर पूर्व में किए गए कर्मों का भी प्रभाव हो सकता है। इसलिए दो मनुष्यों को समान परिस्थितियाँ मिलने पर भी उनके अनुभव अलग हो सकते हैं। किसी को जन्म से सुविधाएँ मिलती हैं, किसी को संघर्ष। किसी को अवसर आसानी से मिलता है, किसी को वही अवसर पाने के लिए वर्षों संघर्ष करना पड़ता है। इन्हीं प्रारब्धजन्य परिस्थितियों को सामान्य भाषा में हम भाग्य कहते हैं। इसलिए कहा जा सकता है— भाग्य हमारे बीते हुए कर्मों की छाया है, जबकि वर्तमान कर्म हमारे आने वाले भाग्य का बीज है। क्या भाग्य कर्म से बड़ा है? नहीं। यदि भाग्य ही सब कुछ होता, तो श्रीकृष्ण कर्म करने की प्रेरणा क्यों देते? गीता में भगवान कहते हैं— “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” अर्थात् मनुष्य को स्वयं अपने प्रयास से अपना उत्थान करना चाहिए। भाग्य यदि परिस्थिति देता है, तो कर्म उस परिस्थिति में हमारा उत्तर तय करता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को कठिन परिस्थिति मिली। वह कह सकता है—“मेरा भाग्य खराब है।” या वह कह सकता है— “परिस्थिति मेरे हाथ में नहीं, लेकिन इस परिस्थिति में मैं क्या करूँगा, यह मेरे हाथ में है।” यहीं से कर्म की शक्ति शुरू होती है। मान लीजिए दो किसानों के खेत हैं। दोनों को समान भूमि मिली, लेकिन एक किसान परिश्रम करता है, समय पर बीज बोता है, सिंचाई करता है और खेत की रक्षा करता है। दूसरा किसान कहता रहता है— “मेरी किस्मत में फसल होगी तो अपने आप हो जाएगी।” कुछ समय बाद दोनों के परिणाम अलग होंगे। इस उदाहरण में भूमि और परिस्थितियाँ भाग्य जैसी हैं, लेकिन खेती करना कर्म है। और ध्यान रखिए— भाग्य खेत दे सकता है, लेकिन फसल उगाने के लिए कर्म करना पड़ता है। कर्म के तीन रूप समझना भी आवश्यक है सनातन दर्शन में कर्म को सामान्यतः तीन रूपों में समझाया जाता है— 1. संचित कर्म पूर्व में किए गए कर्मों का संचित भंडार। 2. प्रारब्ध कर्म संचित कर्मों का वह भाग जिसका फल वर्तमान जीवन में अनुभव किया जा रहा है। 3. क्रियमाण/आगामी कर्म जो कर्म हम अभी कर रहे हैं और जिनका परिणाम भविष्य में प्राप्त होगा। इस दृष्टि से जीवन एक निरंतर प्रक्रिया है— पुराने कर्म → प्रारब्ध → वर्तमान परिस्थिति → वर्तमान कर्म → भविष्य का परिणाम। इसलिए भाग्य को दोष देना उचित नहीं कई लोग कहते हैं— “मेरे भाग्य में ही नहीं था।” लेकिन श्रीकृष्ण की शिक्षा मनुष्य को भाग्यवाद में निष्क्रिय नहीं बनाती। यदि आज सफलता नहीं मिली तो कर्म छोड़ना नहीं है। यदि आज परिस्थिति विपरीत है तो प्रयास छोड़ना नहीं है। यदि आज रास्ता बंद है तो विश्वास छोड़ना नहीं है। क्योंकि आज का कर्म कल की परिस्थिति बदल सकता है। हाँ, हर परिणाम तुरंत हमारे मन के अनुसार मिले—यह आवश्यक नहीं। कर्मफल का विधान अत्यंत सूक्ष्म है। इसलिए कर्म करते समय फल की अधीरता छोड़कर अपने कर्तव्य पर ध्यान देना ही गीता का मार्ग है। कर्म और भाग्य का सुंदर संबंध: इसे एक पंक्ति में समझिए— “भाग्य वह है जो हमें मिला, कर्म वह है जो हम उसके साथ करते हैं।” और इससे भी गहरी बात— “भाग्य हमारे हाथ में आने वाली परिस्थितियाँ तय कर सकता है, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारा पुरुषार्थ, दृष्टिकोण और कर्म हमारे हाथ में हैं।” इसलिए यदि जीवन में कठिनाई है तो यह मत कहिए— “मेरा भाग्य खराब है।” बल्कि कहिए— “शायद परिस्थिति मेरी परीक्षा है; अब मेरा कर्म तय करेगा कि मैं इससे टूटूँगा या जुड़ेंगे.. भगवान श्रीकृष्ण कर्म करने का आदेश देते हैं, लेकिन कर्म के फल के अहंकार से बचाते हैं। “योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।” अर्थात् हे अर्जुन! आसक्ति छोड़कर योग में स्थित होकर कर्म करो। इसका अर्थ है— कर्म करते रहो, फल की चिंता भगवान पर छोड़ दो, लेकिन कर्म करने की जिम्मेदारी स्वयं निभाओ। क्योंकि भाग्य दरवाजा खोल सकता है, लेकिन उस दरवाजे से होकर चलना मनुष्य के कर्म पर निर्भर करता है। और शायद कर्म और भाग्य का सबसे सुंदर रहस्य यही है— “जो मिला, वह भाग्य था; जो बनाया, वह कर्म है; और जो बनकर आएगा, वह आज के कर्म का परिणाम होगा।” इसलिए भाग्य पर विश्वास रखिए, लेकिन कर्म पर भरोसा कीजिए। क्योंकि भाग्य को रोते हुए देखने से बेहतर है—कर्म करते हुए उसे बदलने का प्रयास करना। ~जय श्री कृष्ण ~
sn vyas
523 views
14 hours ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_४३/२ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 तू अपना नियत कर्म कर -- बाकी झंझट छोड़ दे :* *अपने प्रत्येक कर्म में "मैं " पद का अहंकार छोड़ दें और परमात्मा को केंद्र में रखकर उसकी इच्छा अनुसार उसे प्रसन्न करने के लिए अपना कर्तव्य करेगा तो प्रत्येक कार्य में हार जीत की जिम्मेदारी परमात्मा अपने सिर पर ले लेंगे।* *इतनी सी बात समझ में आ जाए तो तेरा हर छोटा बड़ा कर्म परमात्मा की पूजा का पुष्प बन जाएगा । और प्रत्येक कर्म भक्ति मय बन जाएगा । तेरा कर्म ही तेरी भक्ति बन जाएगा।* *अंतिम सांस तक अपना कर्म करते करते मृत्यु को प्राप्त करना , परमात्मा को प्राप्त करने के समान है । क्योंकि "मृत्यु" अथवा "काल " भगवान का ही स्वरूप है । भगवान गीता में कहते हैं कि--* *मृत्यु सर्वहरश्चाऽहं। (गीता 10-34)* *कालोऽस्मि।(गीता 11-32)* *मृत्यु भी मेरी ही एक विभूति है । मैं ही काल स्वरूप हूं ।* *मैं काल का भी काल हूं। इसलिए मृत्यु को प्राप्त करने में (उस समय ) भय नहीं लगेगा बल्कि परमात्मा से भेंट करने का आनंद होगा और यह परम संसिद्धि है ।* *इस प्रकार ईश्वर - प्रीत्यर्थ किया गया कर्म ,, कर्म न रह कर कर्म योग बन जाता है और ऐसा प्रत्येक कर्म भक्ति मय हो जाता है ।भक्ति में कर्म करने वाले के अंतःकरण में स्वत: ज्ञान का प्रकाश प्रस्फुटित होता है । इस प्रकार कर्म भक्ति और ज्ञान का एक साथ उदय होता है ।* क्रमश: ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
605 views
7 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_४१/२ गतांक से आगे (विश्राम) योग: कर्मसु कौशलम् । एक विद्यार्थी मन को स्थिर रखकर पढ़ाई करें और मन एकाग्र करके खेले तो यह उसका योग माना जाएगा। *महर्षि पतंजलि योग शास्त्र के प्रणेता माने जाते हैं । उन्होंने अपने योग सूत्र के प्रथम सूत्र में ही योग की परिभाषा स्पष्ट की है ।* *योग: चित्तवृत्ति निरोध:* *मनोवृति की एकाग्रता का नाम ही योग है और मनोवृति का निरोध होते ही स्वयं " कर्मसु कौशलम् " हो जाएगा।* *ऐसा योग आप आज से और अभी से करेंगे तो काम हो जाएगा । अन्यथा आप समझेंगे कि रिटायर होंगे , बूढ़े होंगे , लकवा होगा तब और खटिया में पड़े पड़े जब शरीर दुर्गंध देने लगेगा , तब योग करेंगे , तो आप नहीं कर पाएंगे।* *गीता का योग सामान्य व्यक्ति के लिए दैनिक दिनचर्या में प्रशिक्षण उपयोगी न हो तो गीता के सात सौ श्लोक मात्र कंठस्थ करने का कोई अर्थ नहीं है ।* *जीवन व्यवहार में उपयोगी सादा , सरल और प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुलभ योग की परिभाषा को समझ कर जीवन का प्रत्येक कर्म करने से व्यक्ति का प्रत्येक कर्म भक्ति मय बन जाता है , फिर उसका भगवान से योग होने में देर नहीं लगती।* क्रमश: ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
648 views
8 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_४१/१ योग: कर्मसु कौशलम् :* योग की परिभाषा स्पष्ट करते हुए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि---- *योग: कर्मसु कौशलम ।* *अपना कर्म कुशलतापूर्वक करने का नाम ही योग है।* *प्रारब्ध वशात् व्यक्ति के जीवन में जो कर्म सुनिश्चित हो, उसे वह व्यक्ति कुशलतापूर्वक करें , तो उसने योग किया कहलाता है ।* *एक दर्जी कुर्ते की सुंदर सिलाई करता है , उसमें दोनों हाथों की आस्तीन समान हो, न एक हाथ की आस्तीन लंबी हो , न दूसरे हाथ की आस्तीन छोटी हो , माप के अनुसार ही सिलाई की हो और उसमें उसने अपनी कुशलता का उपयोग किया हो तो उसने योग किया माना जाता है।* *एक चमार अपने ग्राहक का जूता ठीक से सिले और उसे पहनने से ही ग्राहक खुश हो जाए । ऐसी दक्षता और कुशलता से वह जूता बनाएगा तो उसने योग किया माना जाएगा ।* *जब आप चलते हैं तब ऐसी दक्षता से चलें कि आपको ठोकर न लगे , तो आपने योग किया माना जाता है ।* *आप पानी पिये तो ऐसे धीरज के साथ और स्थिर वृत्ति से पीये कि आपको हिचकी न आए तो आपने योग किया माना जाता है ।* *आप कथा सुनने जाते हैं या कोई पुस्तक पढ़ते हैं , उस समय एकाग्रचित्त से सुने या पढे और इधर-उधर न देखें तो आपने योग किया कहलाता है।* *इसी प्रकार जीवन का प्रत्येक कर्म कुशलतापूर्वक स्थिर मनोवृत्ति से करें तो आप योग करते हैं , यह माना जाएगा।* क्रमश: ✍🏽 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
749 views
12 days ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta 🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३९/२ मुझे कर्म भी नहीं करना है और फल भी नहीं भोगना है: गतांक से आगे *मैं अर्जुन के सारथी का काम कर रहा हूं तो मुझे इससे कुछ मिलने वाला नहीं है। मैं जो काम कर रहा हूं , वह करूं या ना करूं तो भी मेरे आनंद में कोई घट-बढ नहीं होने वाली है। फिर भी मैं लोक संग्रह को दृष्टि में रखकर काम करता हूं। अगर भगवान श्री कृष्ण स्नान, संध्या , देव पूजा आदि नहीं करेंगे तो जगत के लोग भी ऐसे कर्मों से विमुख हो जाएंगे।* *भगवान ने इस बात को गीता में स्पष्ट रूप से कहा है।* *महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच हुआ था । उस समय भगवान श्री कृष्ण द्वारका में बैठे-बैठे आराम करते और मौज मस्ती करते तो क्या हर्ज था ? पांडवों के जीतने से श्रीकृष्ण को किसी गांव और जागीर या कोई अन्य इनाम नहीं मिलने वाला था ।* *कौरवों की जीत होती तो भगवान श्री कृष्ण को द्वारका की गद्दी पर कोई आंच भी नहीं आने वाली थी । फिर भी भगवान श्रीकृष्ण क्यों बेकार में इस उपाधि में पड़े और उन्होंने द्वारका से कुरुक्षेत्र तक प्रयाण करने का कष्ट क्यों उठाया ? द्वारका में बैठकर आराम नहीं कर सकते थे ? लेकिन नहीं ,, जब धर्म युद्ध हो रहा हो तब भगवान श्री कृष्ण जैसे योगीश्वर और कर्मयोगी बैठे रह कर केवल देखते नहीं रह सकते।* क्रमश: ✍🏽
sn vyas
1.4K views
14 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३८/३ ( विश्राम) फल के उद्देश्य से कर्म मत करो 💜💫💦🩸🍃🎈🌾🌻🌼🌞🔥 "मां फलेषु कदाचन " और "मा कर्मफल हेतू: भु: " इन दो आज्ञाओ का अर्थ गहराई से समझने की आवश्यकता है। *कर्म करने से पहले फल का बिल्कुल ध्यान न रखना , और आंखें बंद करके कर्म किए जाना , यह भी अर्थ नहीं है। भगवान की वाणी अत्यंत गर्भित और अर्थपूर्ण है । उसका अंधाधुंध कोई भी अर्थ घटन नहीं किया जा सकता है। उसका अर्थ घटन इस तरह से करना है कि उसका अर्थ व्यवहार में उपयोगी हो सके। कर्म करने से पहले फल का ध्यान रखना ही पड़ेगा।* *उदाहरण के लिए ,,, यदि कोई किसान भीषण गर्मी के मौसम में जहां पानी की सुविधा ना हो, ऐसी बंजर , खराब, जमीन में अन्न का उत्तम बीज बोए तो भी वह बीज उष्ण ताप से जल जाएगा ।* *कर्म के फल का विचार नहीं करना चाहिए , यह कहने का अर्थ है कि कर्म के फल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। बल्कि कर्म का उत्तम फल प्राप्त हो ,, ऐसी सोच के साथ पुरुषार्थ तो करना ही चाहिए।* *गीता मे फलत्याग का उपदेश है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि फल को फेंक देना चाहिए , कर्म का फल मिलना ही नहीं चाहिए , अथवा फल लेना ही नहीं चाहिए । भगवत गीता तो कहती है कि --- कर्म आपको फल दिए बिना छोड़ेगा ही नहीं ।* *मुझे कर्म का फल नहीं चाहिए , ऐसा कौन कहता है ? चोर , व्यभिचारी, दुष्ट कर्म करने वाला ही ऐसा कह सकता है, कि मुझे अपने कर्म का फल (पाप - दुख ) नहीं चाहिए । लेकिन ऐसा हो नहीं सकता । कर्म फल तो देगा ही और वह फल भोगना ही पड़ेगा।* *इसलिए "फल मिलेगा तो ही कर्म करूंगा " ऐसे भ्रम में नहीं रहना #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta चाहिए।* क्रमश: अब कल नये भाग के साथ ✍🏽
sn vyas
907 views
2 months ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग०६/०१ प्रारब्ध कर्म 🏹🎻🪔📝🦚💥🦚📝🪔🎻🏹 *संचित कर्म पक कर फल देने के लिए जब तैयार हो जाता है, तो उसको प्रारब्ध कर्म कहते हैं---* *अनादि काल से अनेक जन्म जन्मांतर के संचित कर्मों के असंख्य करोड़ों हिमालय भर जाए , इतने ढेर जीवन के पीछे जमा होकर पड़े हैं ।* *उसमें संचित कर्म पक कर फल देने के लिए तैयार हो जाएं, ऐसे प्रारब्ध भोग भोगने के अनुरूप शरीर जीव को प्राप्त होकर , और उस शरीर काल दरमियान उस मुताबिक प्रारब्ध कर्म भोगने के पश्चात ही दे गिरती है।* *प्रारब्ध कर्म को भोगने के अनुरूप देह, आरोग्य, स्त्री- पुत्रादिक , सुख -दुख आदि उस जीवनकाल दरमियान जीव को आकर मिल जाते हैं। उस प्रारब्ध कर्म को पूरे ढंग से भोगे बिना देह का छुटकारा हो नहीं सकता ।* *बुढ़ापे में लकवा हो जाए और दस साल तक चारपाई में पड़े पड़े शरीर में से दुर्गंध आने लगे, और हे भगवान अब मेरा कब छुटकारा होगा , मेरी अंतिम यात्रा कब निकलेगी, ऐसा अनेक बार बकवास करता रहे, फिर भी जब तक पूरी तरह प्रारब्ध कर्म भोग नहीं लेते तब तक दे छूटती नहीं ,,,* *और प्रारब्ध कर्म भोग कर समाप्त होने के बाद लड़का अगर मुंह में पानी डालेगा , तो वह नाक से द्वारा बाहर निकल जाएगा, किंतु एक बूंद भी पानी पीने के लिए या एक भी ज्यादा श्वास लेने के लिए भी जीव खड़ा नहीं रह सकता देह तुरंत ही छूट जाएगी। प्रारब्ध कर्म का शेष भाग कल ✍️ #कर्म #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ