#महाभारत🏹🏹🏹

sn vyas
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11 घंटे पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 479) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः । ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! भगवान् व्यासके चले जानेपर पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव प्रसन्नचित्त हो अपनी माताको आगे करके वहाँसे पंचालदेशकी ओर चल दिये ।। १ ।। आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्यानुमान्य च । समैरुदङ्‌मुखैर्मार्गेर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ।। २ ।। परंतप ! कुन्तीकुमारोंने पहले ही अपने आश्रयदाता ब्राह्मणसे पूछकर जानेकी आज्ञा ले ली थी और चलते समय बड़े आदरके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे सब लोग उत्तर दिशाकी ओर जानेवाले सीधे मार्गोंद्वारा उत्तराभिमुख हो अपने अभीष्ट स्थान पंचालदेशकी ओर बढ़ने लगे ।। २ ।। ते त्वगच्छन्नहोरात्रात् तीर्थं सोमाश्रयायणम् । आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ।। ३ ।। एक दिन और एक रात चलकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव गंगाजीके तटपर सोमाश्रयायण नामक तीर्थमें जा पहुँचे ।। ३ ।। उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः । प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः ।। ४ ।। उस समय उनके आगे-आगे महारथी अर्जुन उजाला तथा रक्षा करनेके लिये जलती हुई मशाल उठाये चल रहे थे ।। ४ ।। तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः । ईष्र्युर्गन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः ।। ५ ।। उस तीर्थकी गंगाके रमणीय तथा एकान्त जलमें गन्धर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था। वह बड़ा ही ईर्ष्यालु था और जलक्रीड़ा करनेके लिये ही वहाँ आया था ।। ५ ।। शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् । तेन शब्देन चाविष्टश्चक्रोध बलवद् बली ।। ६ ।। उसने गंगाजीकी ओर बढ़ते हुए पाण्डवोंके पैरोंकी धमक सुनी। उस शब्दको सुनते ही वह बलवान् गन्धर्व क्रोधके आवेशमें आकर बड़े जोरसे कुपित हो उठा ।। ६ ।। स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् । विस्फारयन् धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७ ।। परंतप पाण्डवोंको अपनी माताके साथ वहाँ देख वह अपने भयानक धनुषको टंकारता हुआ इस प्रकार बोला- ।। ७ ।। संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या । अशीतिभिर्लवैर्तीनं तन्मुहुर्त प्रचक्षते ।। ८ ।। विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ।। ९ ।। 'रात्रि प्रारम्भ होनेके पहले जो पश्चिम दिशामें भयंकर संध्याकी लाली छा जाती है, उस समय अस्सी लवको छोड़कर सारा मुहूर्त इच्छानुसार विचरनेवाले यक्षों, गन्धों तथा राक्षसोंके लिये निश्चित बताया जाता है। शेष दिनका सब समय मनुष्योंके कार्यवश विचरनेके लिये माना गया है ।। ८-९ ।। लोभात् प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्तानि गृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान् ।। १० ।। 'जो मनुष्य लोभवश हमलोगोंकी वेलामें इधर घूमते हुए आ जाते हैं, उन मूखौँको हम गन्धर्व और राक्षस कैद कर लेते हैं ।। १० ।। अतो रात्रौ प्राप्नुवन्तो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान् सर्वान् बलस्थान् नृपतीनपि ।। ११ ।। 'इसीलिये वेदवेत्ता पुरुष रातके समय जलमें प्रवेश करनेवाले सम्पूर्ण मनुष्यों और बलवान् राजाओंकी भी निन्दा करते हैं ।। ११ ।। आरात् तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत । कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ।। १२ ।। अङ्गारपर्ण गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् । अहं हि मानी चेर्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ।। १३ ।। 'अरे, ओ मनुष्यो ! दूर ही खड़े रहो। मेरे समीप न आना। तुम्हें ज्ञात कैसे नहीं हुआ कि मैं गन्धर्वराज अंगारपर्ण गंगाजीके जलमें उतरा हुआ हूँ। तुमलोग मुझे (अच्छी तरह) जान लो, मैं अपने ही बलका भरोसा करनेवाला स्वाभिमानी, ईर्ष्यालु तथा कुबेरका प्रिय मित्र हूँ ।। १२-१३ ।। अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम । अनुगङ्गं चरन् कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ।। १४ ।। मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है। मैं गंगाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ ।। १४ ।। न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः । इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ।। १५ ।। 'मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य- कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो?' ।। १५ ।। अर्जुन उवाच समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते । रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ।। १६ ।। अर्जुन बोले- दुर्मते ! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ।। १६ ।। भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर । न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ।। १७ ।। आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें। इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ।। १७ ।। वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम । अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ।। १८ ।। अरे, ओ क्रूर ! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं। असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं। जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ।। १८ ।। पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता । गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।। १९ ।। गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् । रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ।। २० ।। अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये । इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ।। २१ ।। देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् । तथा पितृन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः । गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २२ ।। प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं। जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी- इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं। एकमात्र आकाश ही इनका तट है। गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं। ये ही वैतरणी होकर पितृलोकमें बहती हैं। वहाँ पापियोंके लिये इनके पार जाना अत्यन्त कठिन होता है। इस लोकमें आकर इनका नाम गंगा होता है। यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका कथन है ।। १९-२२ ।। असम्बाधा देवनदी स्वर्गसम्पादनी शुभा । कथमिच्छसि तां रोद्धं नैष धर्मः सनातनः ।। २३ ।। ये कल्याणमयी देवनदी सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे रहित एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। तुम उन्हीं गंगाजीपर किसलिये रोक लगाना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है ।। २३ ।। अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् । न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ।। २४ ।। जिसे कोई रोक नहीं सकता, जहाँ पहुँचनेमें कोई बाधा नहीं है, भागीरथीके उस पावन जलका तुम्हारे कहनेसे हम अपने इच्छानुसार स्पर्श क्यों न करें? ।। २४ ।। वैशम्पायन उवाच अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् । मुमोच बाणान् निशितानहीनाशीविषानिव ।। २५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी वह बात सुनकर अंगारपर्ण क्रोधित हो गया और धनुष नवाकर विषैले साँपोंकी भाँति तीखे बाण छोड़ने लगा ।। २५ ।। उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् । व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः ।। २६ ।। यह देख पाण्डुनन्दन धनंजयने तुरंत ही मशाल घुमाकर और उत्तम ढालसे रोककर उसके सभी बाण व्यर्थ कर दिये ।। २६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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11 घंटे पहले
भगवान श्री गणेश द्वारा महाभारत का लेखन और 'एकदंत' स्वरूप का #महाभारत #महाभारत की कथा प्रसंग महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास ने संपूर्ण ज्ञान, धर्म, नीति और इतिहास से युक्त महाकाव्य 'महाभारत' की मानसिक रचना पूर्ण कर ली, तब उन्हें इस वृहद ग्रंथ को लिपिबद्ध (लिखने) के लिए एक अत्यंत तीव्र बुद्धि और निरंतर लिखने वाले लेखक की आवश्यकता हुई। ब्रह्मा जी का परामर्श: महर्षि वेदव्यास के निवेदन पर ब्रह्मा जी ने उन्हें बुद्धि और विद्या के अधिपति भगवान श्री गणेश से प्रार्थना करने को कहा। गणेश जी की कठिन शर्त: जब व्यास जी ने गणेश जी से लेखक बनने का अनुरोध किया, तो गणेश जी ने एक शर्त रखी: "मेरी लेखनी एक क्षण के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए। यदि आप बोलते समय तनिक भी रुके, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा।" महर्षि वेदव्यास की चतुर युक्ति: व्यास जी ने शर्त स्वीकार की, परंतु साथ में अपनी एक शर्त जोड़ी: "हे गणाध्यक्ष! मैं जो भी श्लोक बोलूंगा, उसे आप पूरी तरह समझे बिना लिपिबद्ध नहीं करेंगे।" गूढ़ कूट श्लोकों की रचना: जब भी महर्षि व्यास को विश्राम की आवश्यकता होती, वे अत्यंत कठिन और दार्शनिक 'कूट श्लोक' बोलते। उन श्लोकों के गूढ़ अर्थ पर विचार करने में गणेश जी को कुछ क्षण का समय लगता था, और उसी अंतराल में व्यास जी अपने अगले श्लोकों की रचना कर लेते थे। 'एकदंत' स्वरूप और अटूट संकल्प लेखन के दौरान एक समय गणेश जी की लेखनी (कलम) अचानक टूट गई। अपनी शर्त टूटने न पाए और महाकाव्य का लेखन निर्बाध रूप से चलता रहे, इसलिए गणेश जी ने बिना एक क्षण गंवाए अपने दाएँ दाँत को स्वयं तोड़ लिया और उसकी नोंक से स्याही में डुबोकर लिखना जारी रखा। अपने इसी महान त्याग, बुद्धि और समर्पण के कारण भगवान श्री गणेश संसार में 'एकदंत' के नाम से विख्यात हुए।
sn vyas
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1 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः व्यासजी का पाण्डवों को द्रौपदी के पूर्वजन्म का वृत्तान्त सुनाना...(दिन 478) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु । आजगामाथ तान् द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! महात्मा पाण्डव जब गुप्तरूपसे वहाँ निवास कर रहे थे, उसी समय सत्यवतीनन्दन व्यासजी उनसे मिलनेके लिये वहाँ आये ।। १ ।। तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परंतपाः । प्रणिपत्याभिवाद्यद्यैनं तस्थुः प्राञ्चलयस्तदा ।। २ ।। समनुज्ञाप्य तान् सर्वानासीनान् मुनिरब्रवीत् । प्रच्छन्नं पूजितः पार्थेः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ।। ३ ।। उन्हें आया देख शत्रुसंतापन पाण्डवोंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और प्रणामपूर्वक उनका अभिवादन करके वे सब उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। कुन्तीपुत्रोंद्वारा गुप्तरूपसे पूजित हो मुनिवर व्यासने उन सबको आज्ञा देकर बिठाया और जब वे बैठ गये, तब उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार पूछा- ।। २-३ ।। अपि धर्मेण वर्तध्वं शास्त्रेण च परंतपाः । अपि विप्रेषु पूजा वः पूजार्हेषु न हीयते ।। ४ ।। 'शत्रुओंको संतप्त करनेवाले वीरो ! तुमलोग शास्त्रकी आज्ञा और धर्मके अनुसार चलते हो न? पूजनीय ब्राह्मणोंकी पूजा करनेमें तो तुम्हारी ओरसे कभी भूल नहीं होती?' ।। ४ ।। अथ धर्मार्थवद् वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः। विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत् ।। ५ ।। तदनन्तर महर्षि भगवान् व्यासने उनसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कहीं। फिर विचित्र- विचित्र कथाएँ सुनाकर वे पुनः उनसे इस प्रकार बोले ।। ५ ।। व्यास उवाच आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः । विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता ।। ६ ।। व्यासजीने कहा-पहलेकी बात है, तपोवनमें किसी महात्मा ऋषिकी कोई कन्या रहती थी, जिसकी कटि कृश तथा नितम्ब और भौंहें सुन्दर थीं। वह कन्या समस्त सद्‌गुणोंसे सम्पन्न थी ।। ६ ।। कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत । नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ।। ७ ।। परंतु अपने ही किये हुए कर्मोंके कारण वह कन्या दुर्भाग्यके वश हो गयी, इसलिये वह रूपवती और सदाचारिणी होनेपर भी कोई पति न पा सकी ।। ७ ।। ततस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः । तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम् ।। ८ ।। तब पतिके लिये दुःखी होकर उसने तपस्या प्रारम्भ की और कहते हैं उग्र तपस्याके द्वारा उसने भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लिया ।। ८ ।। तस्याः स भगवांस्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम् । वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शङ्करः ।। ९ ।। उसपर संतुष्ट हो भगवान् शंकरने उस यशस्विनी कन्यासे कहा- 'शुभे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ' ।। ९ ।। अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् । पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ।। १० ।। तब उसने भगवान् शंकर से अपने लिये हितकर वचन कहा- 'प्रभो! मैं सर्वगुण सम्पन्न पति चाहती हूँ।' इस वाक्य को उसने बार-बार दुहराया ।। १० ।। तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः । पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति भारताः ।। ११ ।। तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् शिवने उससे कहा- 'भद्रे! तुम्हारे पाँच भरतवंशी पति होंगे' ।। ११ ।। एवमुक्ता ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत् । एकमिच्छाम्यहं देव त्वत्प्रसादात् पतिं प्रभो ।। १२ ।। उनके ऐसा कहनेपर वह कन्या उन वरदायक देवता भगवान् शिवसे इस प्रकार बोली - 'देव ! प्रभो! मैं आपकी कृपासे एक ही पति चाहती हूँ' ।। १२ ।। पुनरेवाब्रवीद् देव इदं वचनमुत्तमम् । पञ्चकृत्वस्त्वया ह्युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः ।। १३ ।। तब भगवान्ने पुनः उससे यह उत्तम बात कही- 'भद्रे ! तुमने मुझसे पाँच बार कहा है कि मुझे पति दीजिये ।। १३ ।। देहमन्यं गतायास्ते यथोक्तं तद् भविष्यति । द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी ।। १४ ।। 'अतः दूसरा शरीर धारण करनेपर तुम्हें जैसा मैंने कहा है, वह वरदान प्राप्त होगा।' वही देवरूपिणी कन्या राजा द्रुपद के कुल में उत्पन्न हुई है ।। १४ ।। निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता । पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसध्वं महाबलाः । सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः ।। १५ ।। वह महाराज पृषतकी पौत्री सती-साध्वी कृष्णा तुमलोगोंकी पत्नी नियत की गयी है; अतः महाबली वीरो ! अब तुम पंचालनगरमें जाकर रहो। द्रौपदीको पाकर तुम सब लोग सुखी होओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १५ ।। एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान् स पितामहः । पार्थानामन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ।। १६ ।। महान् सौभाग्यशाली और महातपस्वी पितामह व्यासजी पाण्डवोंसे ऐसा कहकर उन सबसे और कुन्तीसे विदा ले वहाँसे चल दिये ।। १६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीजन्मान्तरकथने अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीजन्मान्तरकथनविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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2 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपद के यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति...(दिन 476) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्रुपद उवाच अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यं च शिक्षितम् । चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवाः ।। भ्रातृभिः सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने । किमाश्चर्यमिदं लोके कालो हि दुरतिक्रमः ।। मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यामि साम्प्रतम् । अन्तर्गतेन दुःखेन दह्यमानो दिवानिशम् । याजोपयाजी सत्कृत्य याचिती ती मयानघी ।। भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै । लोकस्तद् वेद यच्चैव तथा याजेन वै श्रुतम् ।। याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादितावुभौ । धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ ।। किं करिष्यामि ते नष्टाः पाण्डवाः पृथया सह । द्रुपद बोले- बन्धुओ! अर्जुन का रूप अद्भुत था। उनका धैर्य आश्चर्यजनक था। उनका पराक्रम और उनकी अस्त्र-शिक्षा भी अलौकिक थी। मैं दिन-रात अर्जुनकी ही चिन्तामें डूबा रहता हूँ। हाय! वे अपने भाइयों और माताके साथ आगमें जल गये। संसारमें इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? सच है, कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। मेरी तो प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। अब मैं लोगोंसे क्या कहूँगा। आन्तरिक दुःखसे दिन-रात दग्ध होता रहता हूँ। मैंने निष्पाप याज और उपयाज का सत्कार करके उनसे दो संतानों की याचना की थी। एक तो ऐसा पुत्र माँगा, जो द्रोणाचार्यका वध कर सके और दूसरी ऐसी कन्याके लिये प्रार्थना की, जो वीर अर्जुनकी पटरानी बन सके। मेरे इस उद्देश्यको सब लोग जानते हैं और महर्षि याजने भी यही घोषित किया था। उन्होंने पुत्रेष्टियज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्णा को उत्पन्न किया था। इन दोनों संतानों को पाकर मुझे बड़ा संतोष हुआ। अब क्या करूँ? कुन्ती सहित पाण्डव तो नष्ट हो गये। ब्राह्मण उवाच इत्येवमुक्त्वा पाञ्चालः शुशोच परमातुरः ।। दृष्ट्वा शोचन्तमत्यर्थं पाञ्चालगुरुरब्रवीत् । पुरोधाः सत्त्वसम्पन्नः सम्य‌ग्विद्याशेषवान् ।। आगन्तुक ब्राह्मण कहता है-ऐसा कहकर पांचालराज द्रुपद अत्यन्त दुःखी एवं शोकातुर हो गये। पांचालराज के गुरु बड़े सात्त्विक और विशिष्ट विद्वान् थे। उन्होंने राजा को भारी शोक में डूबा देखकर कहा। गुरुरुवाच वृद्धानुशासने सक्ताः पाण्डवा धर्मचारिणः । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।। मया दृष्टमिदं सत्यं शृणुष्व मनुजाधिप । ब्राह्मणैः कथितं सत्यं वेदेषु च मया श्रुतम् ।। बृहस्पतिमुखेनाथ पौलोम्या च पुरा श्रुतम् । नष्ट इन्द्रो बिसग्रन्थ्यामुपश्रुत्या तु दर्शितः ।। उपश्रुतिर्महाराज पाण्डवार्थे मया श्रुता । यत्र वा तत्र जीवन्ति पाण्डवास्ते न संशयः ।। गुरु बोले- महाराज! पाण्डवलोग बड़े-बूढ़ोंके आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले तथा धर्मात्मा हैं। ऐसे लोग न तो नष्ट होते हैं और न पराजित ही होते हैं। नरेश्वर! मैंने जिस सत्यका साक्षात्कार किया है, वह सुनिये। ब्राह्मणोंने तो इस सत्यका प्रतिपादन किया ही है, वेदके मन्त्रोंमें भी मैंने इसका श्रवण किया है। पूर्वकालमें इन्द्राणीने बृहस्पतिजीके मुखसे उपश्रुतिकी महिमा सुनी थी। उत्तरायणकी अधिष्ठात्री देवी उपश्रुतिने ही अदृष्ट हुए इन्द्रका कमलनालकी ग्रन्थिमें दर्शन कराया था। महाराज! इसी प्रकार मैंने भी पाण्डवोंके विषयमें उपश्रुति सुन रखी है। वे पाण्डव कहीं-न-कहीं अवश्य जीवित हैं, इसमें संशय नहीं है। मया दृष्टानि लिङ्गानि ध्रुवमेष्यन्ति पाण्डवाः । यन्निमित्तमिहायान्ति तच्छृणुष्व नराधिप ।। स्वयंवरः क्षत्रियाणां कन्यादाने प्रदर्शितः । स्वयंवरस्तु नगरे घुष्यतां राजसत्तम ।। यत्र वा निवसन्तस्ते पाण्डवाः पृथया सह । दूरस्था वा समीपस्थाः स्वर्गस्था वापि पाण्डवाः ।। श्रुत्वा स्वयंवरं राजन् समेष्यन्ति न संशयः । तस्मात् स्वयंवरो राजन् घुष्यतां मा चिरं कृथाः ।। मैंने ऐसे (शुभ) चिह्न देखे हैं, जिनसे सूचित होता है कि पाण्डव यहाँ अवश्य पधारेंगे। नरेश्वर! वे जिस निमित्तसे यहाँ आ सकते हैं, वह सुनिये - क्षत्रियोंके लिये कन्यादानका श्रेष्ठ मार्ग स्वयंवर बताया गया है। नृपश्रेष्ठ ! आप सम्पूर्ण नगरमें स्वयंवरकी घोषणा करा दें। फिर पाण्डव अपनी माता कुन्तीके साथ दूर हों, निकट हों अथवा स्वर्गमें ही क्यों न हों-जहाँ कहीं भी होंगे, स्वयंवरका समाचार सुनकर यहाँ अवश्य आयेंगे, इसमें संशय नहीं है। अतः राजन् ! आप (सर्वत्र) स्वयंवरकी सूवना करा दें, इसमें विलम्ब न करें। ब्राह्मण उवाच श्रुत्वा पुरोहितेनोक्तं पाञ्चालः प्रीतिमांस्तदा । घोषयामास नगरे द्रौपद्यास्तु स्वयंवरम् ।। पुष्यमासे तु रोहिण्यां शुक्लपक्षे शुभे तिथौ । दिवसैः पञ्चसप्तत्या भविष्यति स्वयंवरः ।। देवगन्धर्वयक्षाश्च ऋषयश्च तपोधनाः । स्वयंवरं द्रष्टुकामा गच्छन्त्येव न संशयः ।। तव पुत्रा महात्मानो दर्शनीया विशेषतः । अहं च तत्र गच्छामि ममैभिः सह शिष्यकैः । यदृच्छया तु पाञ्चाली गच्छेद् वा मध्यमं पतिम् ।। को हि जानाति लोकेषु प्रजापतिविधिं परम् । तस्मात् सपुत्रा गच्छेथा ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।। नित्यकालं सुभिक्षास्ते पञ्चालास्तु तपोधने ।। यज्ञसेनस्तु राजासौ ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । ब्रह्मण्या नागराश्चाथ ब्राह्मणाश्चातिथिप्रियाः ।। नित्यकालं प्रदास्यन्ति आमन्त्रणमयाचितम् ।। एकसार्थाः प्रयाताः स्मो ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।। आगन्तुक ब्राह्मण कहता है- पुरोहितकी बात सुनकर पंचालराजको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नगरमें द्रौपदीका स्वयंवर घोषित करा दिया। पौषमासके शुक्लपक्षमें शुभ तिथि (एकादशी) को रोहिणी नक्षत्रमें वह स्वयंवर होगा, जिसके लिये आजसे पचहत्तर दिन शेष हैं। ब्राह्मणी (कुन्ती)! देवता, गन्धर्व, यक्ष और तपस्वी ऋषि भी स्वयंवर देखनेके लिये अवश्य जाते हैं। तुम्हारे सभी महात्मा पुत्र देखनेमें परम सुन्दर हैं। पंचालराजपुत्री कृष्णा इनमेंसे किसीको अपनी इच्छासे पति चुन सकती है अथवा तुम्हारे मँझले पुत्रको अपना पति बना सकती है। संसारमें विधाताके उत्तम विधानको कौन जान सकता है? अतः यदि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगे, तो तुम अपने पुत्रोंके साथ पंचालदेशमें अवश्य जाओ। तपोधने ! पंचालदेशमें सदा सुभिक्ष रहता है। राजा यज्ञसेन सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही ब्राह्मणोंके भक्त हैं। वहाँके नागरिक भी ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले हैं। उस नगरके ब्राह्मण भी अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं। वे प्रतिदिन बिना माँगे ही न्यौता देंगे। मैं भी अपने इन शिष्योंके साथ वहीं जाता हूँ। ब्राह्मणी! यदि ठीक जान पड़े तो चलो। हम सब लोग एक साथ ही वहाँ चले चलेंगे। वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा वचनं ब्राह्मणो विरराम ह ।) वैशम्पायनजी कहते हैं- इतना कहकर वे ब्राह्मण चुप हो गये। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीप्रादुर्भावविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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4 दिन पहले
#महाभारत #महाभारत की कथा 😱 जब कुंती के महल में हुई स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजा! 🙏🐘 महाभारतकाल से जुड़ी एक रोचक धार्मिक कथा के अनुसार, एक समय महर्षि वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे। उनके आगमन का समाचार सुनकर महाराज धृतराष्ट्र उन्हें आदरपूर्वक राजमहल में ले गए और स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर विधिपूर्वक उनका पूजन किया। उस समय माता कुंती और गांधारी ने हाथ जोड़कर महर्षि वेदव्यास से कहा— “हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं। कृपया हमें ऐसा सरल व्रत और पूजन बताइए, जिससे हमारे राज्य में लक्ष्मी का वास रहे, सुख-समृद्धि बढ़े तथा पुत्र-पौत्र और पूरा परिवार सुखी रहे।” महर्षि वेदव्यास जी बोले— “ऐसा एक व्रत है, जिसके विधिपूर्वक पालन से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसे गजलक्ष्मी व्रत कहा जाता है।” उन्होंने बताया कि यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है और आश्विन कृष्ण अष्टमी को इसका विशेष पूजन किया जाता है। व्रत की विधि बताते हुए वे बोले— “स्नान करके सोलह सूत के धागे का डोरा बनाना चाहिए और उसमें सोलह गांठ लगानी चाहिए। उसे हल्दी से पीला करके प्रतिदिन सोलह दूब और सोलह गेहूँ अर्पित करें। आश्विन कृष्ण अष्टमी को उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें।” यह व्रत बताकर महर्षि वेदव्यास अपने आश्रम लौट गए। 🌺 कुंती और गांधारी ने शुरू किया व्रत समय आने पर भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से माता कुंती और गांधारी ने अपने-अपने महलों में नगर की महिलाओं के साथ व्रत प्रारंभ किया। देखते ही देखते पंद्रह दिन बीत गए। सोलहवें दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी को गांधारी ने नगर की सभी प्रतिष्ठित महिलाओं को अपने महल में पूजन के लिए बुला लिया। माता कुंती को न तो बुलाया गया और न ही उनके महल में कोई महिला पूजन के लिए आई। कुंती को यह बात बहुत दुखद लगी। उन्हें लगा कि उनका जानबूझकर अपमान किया गया है। उन्होंने पूजन की कोई विशेष तैयारी नहीं की और उदास होकर बैठ गईं। 🌿 पांडवों ने माता को उदास देखा कुछ समय बाद पाँचों पांडव—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—महल में आए। उन्होंने अपनी माता को उदास देखा तो पूछा— “माता! आप इतनी चिंतित क्यों हैं? आपने आज पूजन की तैयारी भी नहीं की?” कुंती ने सारी बात अपने पुत्रों को बता दी। उन्होंने कहा— “आज गांधारी के महल में महालक्ष्मी व्रत का उत्सव हो रहा है। नगर की सभी महिलाओं को वहाँ बुलाया गया है। गांधारी के सौ पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी बनाया है, इसलिए सभी महिलाएँ उसी हाथी का पूजन करने वहाँ चली गई हैं। मेरे यहाँ कोई नहीं आया।” यह सुनकर अर्जुन ने अपनी माता से कहा— “माता! आप भी पूजन की तैयारी कीजिए और नगर में घोषणा करवा दीजिए कि हमारे महल में मिट्टी का हाथी नहीं, बल्कि स्वर्ग के राजा इन्द्र का ऐरावत हाथी आएगा और उसी पर महालक्ष्मी जी का पूजन होगा।” कुंती ने अर्जुन की बात मान ली। 🐘 स्वर्ग से पृथ्वी पर आया ऐरावत माता कुंती ने नगर में घोषणा करवा दी। पूरे हस्तिनापुर में यह समाचार फैल गया— “कुंती के महल में स्वर्ग से इन्द्र का ऐरावत हाथी आने वाला है!” समाचार सुनते ही नगर के नर-नारी, बालक और वृद्ध सभी कुंती के महल की ओर उमड़ पड़े। उधर अर्जुन ने अपने दिव्य सामर्थ्य से स्वर्ग से ऐरावत को पृथ्वी पर बुला लिया। देखते ही देखते कुंती का महल लोगों से भर गया। 🌸 ऐरावत का भव्य स्वागत माता कुंती ने ऐरावत के स्वागत के लिए महल के चौक में अनेक रंगों की सुंदर रंगोलियाँ बनवाईं और रेशमी वस्त्र बिछवाए। नगरवासी फूल-मालाएँ, अबीर, गुलाल और केसर लेकर स्वागत के लिए खड़े हो गए। संध्या के समय स्वर्ग से ऐरावत पृथ्वी पर उतरने लगा। उसके शरीर पर सजे दिव्य आभूषणों की मधुर ध्वनि चारों ओर गूंजने लगी। ऐरावत के दर्शन होते ही पूरा नगर जय-जयकार से गूंज उठा— “जय महालक्ष्मी माता!” “जय कुंती माता!” 🙏 ऐरावत पर हुआ महालक्ष्मी पूजन जब ऐरावत कुंती के महल के चौक में उतर आया, तब नगरवासियों ने फूल-मालाओं, अबीर, गुलाल और केसर से उसका स्वागत किया। राजपुरोहित ने विधिपूर्वक ऐरावत पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित की। वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ महालक्ष्मी जी का पूजन आरंभ हुआ। नगर की महिलाओं ने भी श्रद्धा और भक्ति से माता लक्ष्मी की पूजा की। पूजन के बाद ऐरावत को अनेक प्रकार के पकवान अर्पित किए गए और यमुना का पवित्र जल पिलाया गया। राजपुरोहित ने स्वस्तिवाचन किया और महिलाओं ने विधिपूर्वक महालक्ष्मी व्रत का पूजन किया। सोलह गांठों वाला पवित्र डोरा माता लक्ष्मी को अर्पित करके महिलाओं ने उसे अपने-अपने हाथों में बाँध लिया। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया गया तथा उन्हें वस्त्र, स्वर्ण आभूषण और दक्षिणा प्रदान की गई। 🌙 पूरी रात हुआ जागरण रात्रि में महिलाओं ने मिलकर मधुर भजन-कीर्तन किया। महालक्ष्मी माता की महिमा का गुणगान करते हुए पूरी रात श्रद्धापूर्वक जागरण किया गया। पूरा महल भक्ति और उत्सव के वातावरण से भर गया। अगले दिन प्रातः राजपुरोहित ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ महालक्ष्मी जी की प्रतिमा का विधिपूर्वक जलाशय में विसर्जन कराया। इसके बाद ऐरावत को सम्मानपूर्वक विदा किया गया और वह वापस इन्द्रलोक चला गया। ✨ कथा की सीख यह कथा हमें बताती है कि भक्ति में दिखावा नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का महत्व है। माता कुंती का अपमान भले ही हुआ, लेकिन उन्होंने निराश होने के बजाय अपने विश्वास को बनाए रखा। अर्जुन ने भी अपनी माता का सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी सामर्थ्य का उपयोग किया। जहाँ सच्ची श्रद्धा, विश्वास और भक्ति होती है, वहाँ ईश्वर की कृपा किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकट होती है। 🙏 जय श्री महालक्ष्मी माता। 🌺 जय माता कुंती। 🐘 जय श्री ऐरावत महाराज। 🙏
sn vyas
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28 दिन पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 454) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत । अब्रवीत् तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह ।। ३८ ।। बालककी माताने भीमसेनसे कहा- 'इसका घट (सिर) उत्कच अर्थात् केशरहित है।' उसके इस कथन से ही उसका नाम घटोत्कच हो गया ।। ३८ ।। अनुरक्तश्च तानासीत् पाण्डवान् स घटोत्कचः । तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ।। ३९ ।। घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था। वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था ।। ३९ ।। संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् । हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ।। ४० ।। तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी ।। ४० ।। घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान् पृथया सह । अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान् ।। ४१ ।। किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्क वदतानघाः । तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत् ।। ४२ ।। तत्पश्चात् विशालकाय घटोत्कच ने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा- 'निष्पाप गुरुजन ! आप निःशंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' इस प्रकार पूछने वाले भीमसेन कुमार से कुन्ती ने कहा- ।। ४१-४२ ।। त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद् भीमसमो ह्यसि । ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ।। ४३ ।। 'बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। तुम मेरे लिये साक्षात् भीमसेनके समान हो। पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हमारी सहायता करो' ।। ४३ ।। वैशम्पायन उवाच पृथयाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् । यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः । वर्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु ।। ४४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा- 'दादीजी ! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान् थे, उसी प्रकार इस मानव-जगत् में मैं भी उन्हीं के समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ ।। ४४ ।। कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कचः । आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ।। ४५ ।। 'जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा।' यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया ।। ४५ ।। स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना । कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ।। ४६ ।। महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी। वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था ।। ४६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें घटोत्कचकी उत्पत्तिविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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1 महीने पहले
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 453) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तथेति तत् प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे ततः ।। २१ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेन को साथ ले वहाँ से ऊपर आकाश में उड़ गयी ।। २१ ।। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ।। २२ ।। कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ।। २३ ।। तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्द्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ।। २४ ।। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ।। २५ ।। काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवगिरिकुञ्जषु गुहासु विविधासु च ।। २६ ।। प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु । सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ।। २७ ।। पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च । देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ।। २८ ।। गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ।। २९ ।। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् । रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ।। ३० ।। उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननों में, हिमवान् पर्वत के कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयों में घूम-फिरकर हिडिम्बा ने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेन के साथ रमण किया। वह मनके समान वेग से चलने वाली थी, अतः उन-उन स्थानों में भीमसेन को आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी ।। २२-३० ।। प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम् । विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं बिभीषणम् ।। ३१ ।। कुछ काल के पश्चात् उस राक्षसी ने भीमसेन से एक महान् बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकु के समान थे। वह देखने में बड़ा भयंकर जान पड़ता था ।। ३१ ।। भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम् । महेष्वासं महावीर्य महासत्त्वं महाभुजम् ।। ३२ ।। महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम् । दीर्घघोणं महोरस्कं विकटोद्बद्धपिण्डिकम् ।। ३३ ।। उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान् बल, बहुत बड़ा धनुष, महान् पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान् वेग और विशाल शरीर-ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं ।। ३२-३३ ।। अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम् । यः पिशाचानतीत्यान्यान् बभूवातीव राक्षसान् ।। ३४ ।। यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी। उसका वेग भयंकर और बल महान् था। वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था ।। ३४ ।। बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते । सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद् बली ।। ३५ ।। राजन् ! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था। उस बलवान् वीरने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी ।। ३५ ।। सद्यो हि गर्भान् राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च । कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः ।। ३६ ।। राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं ।। ३६ ।। प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात् स पितुस्तदा । मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः ।। ३७ ।। उस महान् धनुर्धर बालक ने पैदा होते ही पिता और माता के चरणों में प्रणाम किया। उसके सिर में बाल नहीं उगे थे। उस समय पिता और माता ने उसका इस प्रकार नामकरण किया ।। ३७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️