जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १२☀️ पृष्ठ १३☀️
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई ।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥१॥
सीताजी हाथ जोड़ कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥१॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी ।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥२॥
काठ ला कर चिता बना कर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीति को सत्य कर दे। रावण की शूल के समान दुःख देनेवाली वाणी कानों से कौन सुने॥२॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि ।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। ।
अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥३॥
सीताजी के वचन सुन कर त्रिजटा ने चरण पकड़ कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। उसने कहा- हे सुकुमारी! सुनो, रात्रि के समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कह कर वह अपने घर चली गयी ॥३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला ।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा ।
अवनि न आवत एकउ तारा ॥४॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं- [क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाश में अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता ॥४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहिजानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका ।
सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥५॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जान कर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष ! मेरी विनती सुन ! मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर ॥५॥
नूतन किसलय अनल समाना ।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।
सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥६॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोग को बढ़ाकर सीमा तक न पहुँचा)। सीताजी को विरह से परम व्याकुल देख कर वह क्षण हनुमान् जी को कल्प के समान बीता ॥६॥
दो०-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥१२॥
तब हनुमान्जी ने हृदय में विचार कर [सीताजी के सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अङ्गारा दे दिया। [यह समझ कर] सीताजी ने हर्षित हो कर उठ कर उसे हाथ में ले लिया।
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