sn vyas
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण08 ।।श्रीमद्भागवत महापुराणम्।। प्रथमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः 🧘श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्न 🧘 ( दिए हुए संस्कृत श्लोक के नीचें हिंदी अर्थ लिखा हुआ हैं ) *प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः।* *मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः॥१०॥* *भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागशः।* *अतः साधोऽत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया।* *ब्रूहि नः श्रद्दधानानां येनात्मा संप्रसीदति॥११॥* *सूत जानासि भद्रं ते भगवान् सात्वतां पतिः।* *देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया॥१२॥* *तन्नः शुश्रूषमाणानामर्हस्यङ्गानुवर्णितुम्।* *यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च॥१३॥* *आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।* *ततः सद्यो विमुच्येत यद् बिभेति स्वयं भयम् ॥ १४ ॥* *यत्पादसंश्रयाः सूत मुनयः प्रशमायनाः।* *सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टाः स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ॥ १५ ॥* *को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मणः।* *शुद्धिकामो न श्रृणुयाद् यशः कलिमलापहम् ॥ १६ ॥* *तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभिः ।* *ब्रूहि नः श्रद्दधानानां लीलया दधतः कलाः ॥ १७ ॥* 🛐शौनकादि ऋषि, सूतजी से कह रहे हैं आप संत समाज के भूषण हैं। इस कलियुग में प्राय: लोगों की आयु कम हो गयी है। साधन करने में लोगों की रुचि और प्रवृत्ति भी नहीं है। लोग आलसी हो गये हैं। उनका भाग्य तो मन्द है ही, समझ भी थोड़ी है। इसके साथ ही वे नाना प्रकार की विघ्न-बाधाओं से घिरे हुए भी रहते हैं ॥ १० ॥ शास्त्र भी बहुत-से हैं। परन्तु उनमें एक निश्चित साधन का नहीं, अनेक प्रकार के कर्मों का वर्णन है। साथ ही वे इतने बड़े हैं कि उनका एक अंश सुनना भी कठिन है। आप परोपकारी हैं। अपनी बुद्धि से उनका सार निकालकर प्राणियों के परम कल्याण के लिये हम श्रद्धालुओं को सुनाइये, जिससे हमारे अन्त:करण की शुद्धि प्राप्त हो ॥ ११ ॥ प्यारे सूतजी ! आपका कल्याण हो । आप तो जानते ही हैं कि यदुवंशियों के रक्षक भक्तवत्सल भगवान्‌ श्रीकृष्ण वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी के गर्भ से क्या करने की इच्छा से अवतीर्ण हुए थे ॥ १२ ॥ हम उसे सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके हमारे लिये उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्‌ का अवतार जीवों के परम कल्याण और उनकी भगवत्प्रेममयी समृद्धि के लिये ही होता है ॥ १३ ॥ यह जीव जन्म-मृत्यु के घोर चक्र में पड़ा हुआ है—इस स्थिति में भी यदि वह कभी भगवान्‌ के मङ्गलमय नाम का उच्चारण कर ले तो उसी क्षण उससे मुक्त हो जाय; क्योंकि स्वयं भय भी भगवान्‌ से डरता रहता है ॥ १४ ॥ सूतजी ! परम विरक्त और परम शान्त मुनिजन भगवान्‌ के श्रीचरणों की शरण में ही रहते हैं, अतएव उनके स्पर्श मात्र से संसार के जीव तुरन्त पवित्र हो जाते हैं। इधर गङ्गाजी के जल का बहुत दिनों- तक सेवन किया जाय, तब कहीं पवित्रता प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ ऐसे पुण्यात्मा भक्त जिनकी लीलाओं का गान करते रहते हैं, उन भगवान्‌ का कलिमलहारी पवित्र यश भला आत्मशुद्धि की इच्छा- वाला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो श्रवण न करे ॥ १६ ॥ वे लीला से ही अवतार धारण करते हैं। नारदादि महात्माओं ने उनके उदार कर्मों का गान किया है। हम श्रद्धालुओं के प्रति आप उनका वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥🛐 क्रमशः ......
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