sn vyas
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 ‼️।। श्रीमद्भागवत महापुराण ।।‼️ 🛐श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का शुभारम्भ कर दिया गया है। मंगलाचरण भेज दिया गया है। अब कथा आरम्भ करने से पहले संक्षेप में यह जान लेना आवश्यक है कि श्रीमद्भागवत महापुराण क्या है और इसकी पृष्ठभूमि क्या है ? 🛐 📕श्रीमद्भागवत महापुराण अठारह महापुराणों में सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र ग्रंथ है। इसे भगवान श्रीकृष्ण का वाङ्मय स्वरूप कहा गया है। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और भगवान की दिव्य लीलाओं का अत्यंत मधुर वर्णन है।📕 🧘 रचयिता और परंपरा 🧘 ✍️इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं। वेदव्यास को श्रीमद्भागवत की रचना क्यों करनी पड़ी? महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया, महाभारत ( जिसमें भगवद्गीता भी है ), ब्रह्मसूत्र और अन्य पुराणों की रचना की। इतना विशाल कार्य करने के बाद भी उनका मन संतुष्ट नहीं हुआ। वे खिन्न और अधूरे महसूस कर रहे थे। इसी समय उनके गुरु देवर्षि नारद उनके पास आए। नारदजी ने पूछा — “आप इतने बड़े-बड़े ग्रंथ लिखने के बाद भी उदास क्यों हैं?” ✍️ 🛐वेदव्यास ने अपनी बेचैनी बताई। तब नारदजी ने कारण स्पष्ट किया -“आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का तो वर्णन किया है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के निर्मल यश, गुण और लीलाओं का पर्याप्त गान नहीं किया। शुद्ध भक्ति का पूर्ण वर्णन नहीं किया। इसलिए आपका हृदय संतुष्ट नहीं हो रहा।”नारदजी ने आगे कहा कि केवल कर्मकांड, ज्ञान या मोक्ष की चर्चा से हृदय पूर्ण नहीं होता। भगवान की भक्ति और उनकी लीलाओं का श्रवण -कीर्तन ही जीव को सच्ची शांति और आनंद देता है।🛐 🙏नारदजी के उपदेश के बाद वेदव्यासजी ने गहन समाधि लगाई। समाधि में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण और माया का दर्शन हुआ। उन्होंने देखा कि जीव माया के बंधन में दुखी हैं और भक्ति ही उनका एकमात्र उपाय है। इसी प्रेरणा से उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की। रचना करने के उपरांत उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका पूर्ण ज्ञान दिया। 🙏 🤹महाराज परीक्षित को जब सर्प-दंश से सात दिन में मृत्यु का शाप मिला, तब उन्होंने पूछा — “मृत्यु के समीप बैठे मनुष्य का परम कर्तव्य क्या है?” इसी प्रश्न के उत्तर में शुकदेवजी ने उन्हें सात दिनों तक श्रीमद्भागवत सुनाई। बाद में सूतजी ( उग्रश्रवा, रोमहर्षण के पुत्र ) ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों के सत्संग में यह सम्पूर्ण भागवत सुनाई।सूतजी का वास्तविक नाम उग्रश्रवा है। वे रोमहर्षण के पुत्र थे। वे पुराणों के अत्यंत विद्वान कथावाचक थे और महर्षि वेदव्यास की शिष्य- परंपरा से जुड़े हुए थे। उन्होंने स्वयं शुकदेवजी से श्रीमद्भागवत सुनी थी ( जब शुकदेवजी परीक्षित को सुना रहे थे )।🤹 ⁉️*अब प्रश्न यहां पे ये उठता हैं कि सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को भागवत क्यों सुनाई?* ⁉️ 🌍कलियुग के आरंभ में शौनक आदि लगभग अठासी हजार ऋषि नैमिषारण्य में एक बहुत बड़ा यज्ञ ( सहस्र वर्ष का सत्र ) कर रहे थे। वे ऋषि कलियुग के दुष्प्रभावों से बहुत चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि अब लोगों की आयु कम हो जाएगी, बुद्धि मंद हो जाएगी और धर्म का पालन कठिन हो जाएगा। इसलिए उन्होंने सूतजी से पूछा :- - मनुष्य का परम कल्याण क्या है?- सभी शास्त्रों का सार क्या है?- भगवान श्रीकृष्ण क्यों अवतार लेते हैं और उनकी लीलाएँ क्या हैं?- भगवान श्रीकृष्ण के धाम जाने के बाद धर्म का आश्रय अब कहाँ है?🌍 ✍️इन प्रश्नों के उत्तर में सूतजी ने उन्हें वही श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाई, जो शुकदेवजी ने महाराज परीक्षित को सुनाई थी। आज हमें जो भागवत प्राप्त है, वह उसी परंपरा से आई है। इसमें कुल 12 स्कन्ध, 335 अध्याय और लगभग 18000 श्लोक हैं। *कहां गया हैं कि जब किसी का सौभाग्य सर्वोच्च शिखर पर होता है तब उसे श्रीमद्भागवतमहापुराण कहने, सुनने और पढ़ने को मिलता है।* हमारे भीतर जो रहस्य भरा हुआ है उसको उजागर करने के लिए भागवत एक अध्यात्म दीप है जैसे हम भोजन करते हैं तो हमको संतुष्टि मिलती है। उसी प्रकार भागवत मन का भोजन है। जब मन को ऐसा शुद्ध भोजन मिलेगा तो मन संतुष्ट होगा, पुष्ट होगा और तृप्त होगा और जिसका मन तृप्त है उसके जीवन में शांति है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रीमद् भागवत को आज के संदर्भ में समझें और जन-जन को इसके संदेश से परिचित कराएं।✍️ जय श्री कृष्ण🙏
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