sn vyas
500 views 5 days ago
###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण04 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराण ।। 🧘( महर्षि वेदव्यास और शुकदेव जी का ज्ञानवर्धक संवाद ) 🧘 ( भाग - 1 ) ⁉️अब प्रश्न उठता है कि महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र शुकदेवजी को श्रीमद्भागवत महापुराण कब और कैसे सुनाया? और शुकदेव जी का जन्म कैसे हुआ था?⁉️ 🛐ज्ञान, सदाचार और वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप शुकदेवजी महर्षि वेदव्यास के तपस्याजनित पुत्र हैं। संसार में किस प्रकार की संतान की सृष्टि करनी चाहिए, यह बताने के लिए ही व्यासजी ने घोर तप किया था वरना महाभारत की कथा साक्षी है कि उनकी दृष्टिमात्र से ही कई महापुरुषों का जन्म हुआ था। सुकदेवजी की जन्म- कथा और पिता-पुत्र के बीच हुआ वह अद्भुत संवाद आज भी मोहग्रस्त प्राणियों के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।🛐 ‼️*आइए, अब उसी दिव्य कथा को विस्तार से जानें—* ‼️ 🧘महर्षि वेदव्यास जाबलि मुनि की कन्या वटिका से विवाह कर वन में आश्रम बनाकर रहने लगे । वृद्धावस्था में व्यासजी को पुत्र की इच्छा हुई। व्यासजी ने भगवान गौरी शंकर की विहारस्थली में घोर तपस्या की। भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर व्यासजी ने कहा–’भगवन् ! समाधि में जो आनन्द आप पाते हैं, उसी आनन्द को जगत को देने के लिए आप मेरे घर में पुत्र रूप में पधारिए। पृथ्वी, जल, वायु और आकाश की भांति धैर्यशाली तथा तेजस्वी पुत्र मुझे प्राप्त हो।’ व्यासजी की इच्छा भगवान शंकर ने स्वीकार कर ली। शिवकृपा से व्यास पत्नी वाटिका जी गर्भवती हुईं। शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान उनका गर्भ बढ़ने लगा और गर्भ बढ़ते-बढ़ते बारह वर्ष बीत गए परन्तु प्रसव नहीं हुआ। व्यासजी की कुटिया में सदैव हरिचर्चा हुआ करती थी जिसे गर्भस्थ बालक सुनकर स्मरण कर लेता। इस तरह उस बालक ने गर्भ में ही वेद, स्मृति, पुराण और समस्त मुक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। वह गर्भस्थ शिशु बातचीत भी करता था ।🧘 ‼️*महर्षि व्यास और गर्भस्थ शुकदेव संवाद!!!!!!* ‼️ 🤹गर्भस्थ बालक के बहुत बढ़ जाने और प्रसव न होने से माता को बड़ी पीड़ा होने लगी। एक दिन व्यासजी ने आश्चर्यचकित होकर गर्भस्थ बालक से पूछा— *तू मेरी पत्नी की कोख में घुसा बैठा है, कौन है और बाहर क्यों नहीं आता है ? क्या गर्भिणी स्त्री की हत्या करना चाहता है ?* 🤹 👩‍❤️‍👩गर्भ ने उत्तर दिया —‘मैं राक्षस, पिशाच, देव, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बकरी सब कुछ बन सकता हूँ, क्योंकि मैं चौरासी हजार योनियों में भ्रमण करके आया हूँ; इसलिए मैं यह कैसे बतलाऊँ कि मैं कौन हूँ ? हां, इस समय मैं मनुष्य होकर गर्भ में आया हूँ । मैं इस गर्भ से बाहर नहीं निकलना चाहता क्योंकि इस दु:खपूर्ण संसार में सदा से भटकते हुए अब मैं भव बंधन से छूटने के लिए गर्भ में योगाभ्यास कर रहा हूँ। जब तक मनुष्य गर्भ में रहता है तब तक उसे ज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मों की स्मृति बनी रहती है। गर्भ से बाहर आते ही भगवान की माया के स्पर्श से ज्ञान और वैराग्य छिप जाते हैं; इसलिए मैं गर्भ में ही रहकर यहीं से सीधे मोक्ष की प्राप्ति करुंगा।👩‍❤️‍👩 🧘व्यासजी ने कहा—‘तुम इस नरक रूप गर्भ से बाहर आ जाओ, नहीं तो तुम्हारी मां मर जाएगी। तुम पर वैष्णवी माया का असर नहीं होगा। मुझे अपना मुखकमल दिखला कर पितृऋण से मुक्त करो।🧘 👩‍❤️‍👩गर्भ ने कहा—‘मुझ पर माया का असर नहीं होगा, इस बात के लिए यदि आप भगवान वासुदेव की जमानत दिला सकें तो मैं बाहर निकल सकता हूँ, अन्यथा नहीं।’ इस बहाने शुकदेवजी ने जन्म के समय ही भगवान श्रीकृष्ण को अपने पास बुला लिया । व्यासजी तुरन्त द्वारका गए और भगवान वासुदेव को अपनी कहानी सुनाई। भक्ताधीन भगवान जमानत देने के लिए तुरन्त व्यासजी के साथ चल दिए और आश्रम में आकर गर्भस्थ बालक से बोले—‘हे बालक ! गर्भ से बाहर निकलने पर मैं तुझे माया-मोह से दूर करने की जिम्मेदारी लेता हूँ, अब तू शीघ्र बाहर आ जा।’👩‍❤️‍👩 🕉️भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर बालक गर्भ से बाहर आकर भगवान व माता-पिता को प्रणाम कर वन की ओर चल दिया। प्रसव होने पर बालक बारह वर्ष का जवान दिखायी पड़ता था। उसके श्यामवर्ण के सुगठित, सुकुमार व सुन्दर शरीर को देखकर व्यासजी मोहित हो गए। पुत्र को वन जाते देखकर व्यासजी ने कहा—‘पुत्र घर में रह , जिससे मैं तेरा जात-कर्मादि संस्कार कर सकूँ।’🕉️ 🤹बालक ने उत्तर दिया—‘अनेक जन्मों में मेरे हजारों संस्कार हो चुके हैं, इसी से मैं संसार-सागर में पड़ा हुआ हूँ।’🤹 🕉️भगवान ने व्यासजी से कहा—‘आपका पुत्र शुक की तरह मधुर बोल रहा है इसलिए पुत्र का नाम ‘शुक’ रखिये। यह मोह- मायारहित शुक आपके घर में नहीं रहेगा, इसे इसकी इच्छानुसार जाने दीजिए। इससे मोह न बढ़ाइए । पुत्रमुख देखते ही आप पितृऋण से मुक्त हो गये हैं।’ ऐसा कहकर भगवान द्वारका चले गए।🕉️ क्रमशः .......
13 shares

More like this