##श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873

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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण09 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराणम् ।। प्रथमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः गत पोस्ट से आगे ..... ⁉️श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्न ⁉️ ( दिए गए संस्कृत श्लोक के नीचे उसका हिंदी अर्थ दिया गया है। ) अथाख्याहि हरेर्धीमन् अवतारकथाः शुभाः। लीला विदधतः स्वैरं ईश्वरस्यात्ममायया॥ १८ ॥ *वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे।* *यत् श्रृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे॥ १९ ॥* *कृतवान् किल वीर्याणि सह रामेण केशवः।* *अतिमर्त्यानि भगवान् गूढः कपटमानुषः॥ २० ॥* *कलिमागतमाज्ञाय क्षेत्रेऽस्मिन् वैष्णवे वयम्।* *आसीना दीर्घसत्रेण कथायां सक्षणा हरेः॥ २१ ॥* *त्वं नः संदर्शितो धात्रा दुस्तरं निस्तितीर्षताम्।* *कलिं सत्त्वहरं पुंसां कर्णधार इवार्णवम्॥ २२ ॥* *ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि।* *स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः॥ २३ ॥* 🧘बुद्धिमान् सूतजी ! सर्वसमर्थ प्रभु अपनी योग-माया से स्वच्छन्द लीला करते हैं। आप उन श्रीहरि की मङ्गलमयी अवतार-कथाओं का अब वर्णन कीजिये ॥ १८ ॥ पुण्य कीर्ति भगवान्‌ की लीला सुनने से हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओं को पद-पदपर भगवान्‌ की लीलाओं में नये-नये रस का अनुभव होता है ॥ १९ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने को छिपाये हुए थे, लोगों के सामने ऐसी चेष्टा करते थे मानो कोई मनुष्य हों। परन्तु उन्होंने बलरामजी के साथ ऐसी लीलाएँ भी की हैं, ऐसा पराक्रम भी प्रकट किया है, जो मनुष्य नहीं कर सकते ॥ २० ॥ *कलियुग को आया जानकर इस वैष्णव क्षेत्र में हम दीर्घकालीन सत्र का संकल्प करके बैठे हैं।* श्रीहरि की कथा सुनने के लिये हमें अवकाश प्राप्त है ॥ २१ ॥ यह कलियुग अन्त:करण की पवित्रता और शक्ति का नाश करने वाला है। इससे पार पाना कठिन है। जैसे समुद्र से पार जाने वालों को कर्णधार मिल जाय, उसी प्रकार इससे पार पाने की इच्छा रखने वाले हम लोगों से ब्रह्माने आपको मिलाया है ॥ २२ ॥ धर्मरक्षक, ब्राह्मणभक्त, योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण के अपने धाम में पधार जाने पर धर्म ने अब किसकी शरण ली है—यह बताइये ॥ २३ ॥ *इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥* 🧘 जय श्री कृष्ण क्रमशः .....
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण08 ।।श्रीमद्भागवत महापुराणम्।। प्रथमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः 🧘श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्न 🧘 ( दिए हुए संस्कृत श्लोक के नीचें हिंदी अर्थ लिखा हुआ हैं ) *प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः।* *मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः॥१०॥* *भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागशः।* *अतः साधोऽत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया।* *ब्रूहि नः श्रद्दधानानां येनात्मा संप्रसीदति॥११॥* *सूत जानासि भद्रं ते भगवान् सात्वतां पतिः।* *देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया॥१२॥* *तन्नः शुश्रूषमाणानामर्हस्यङ्गानुवर्णितुम्।* *यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च॥१३॥* *आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।* *ततः सद्यो विमुच्येत यद् बिभेति स्वयं भयम् ॥ १४ ॥* *यत्पादसंश्रयाः सूत मुनयः प्रशमायनाः।* *सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टाः स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ॥ १५ ॥* *को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मणः।* *शुद्धिकामो न श्रृणुयाद् यशः कलिमलापहम् ॥ १६ ॥* *तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभिः ।* *ब्रूहि नः श्रद्दधानानां लीलया दधतः कलाः ॥ १७ ॥* 🛐शौनकादि ऋषि, सूतजी से कह रहे हैं आप संत समाज के भूषण हैं। इस कलियुग में प्राय: लोगों की आयु कम हो गयी है। साधन करने में लोगों की रुचि और प्रवृत्ति भी नहीं है। लोग आलसी हो गये हैं। उनका भाग्य तो मन्द है ही, समझ भी थोड़ी है। इसके साथ ही वे नाना प्रकार की विघ्न-बाधाओं से घिरे हुए भी रहते हैं ॥ १० ॥ शास्त्र भी बहुत-से हैं। परन्तु उनमें एक निश्चित साधन का नहीं, अनेक प्रकार के कर्मों का वर्णन है। साथ ही वे इतने बड़े हैं कि उनका एक अंश सुनना भी कठिन है। आप परोपकारी हैं। अपनी बुद्धि से उनका सार निकालकर प्राणियों के परम कल्याण के लिये हम श्रद्धालुओं को सुनाइये, जिससे हमारे अन्त:करण की शुद्धि प्राप्त हो ॥ ११ ॥ प्यारे सूतजी ! आपका कल्याण हो । आप तो जानते ही हैं कि यदुवंशियों के रक्षक भक्तवत्सल भगवान्‌ श्रीकृष्ण वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी के गर्भ से क्या करने की इच्छा से अवतीर्ण हुए थे ॥ १२ ॥ हम उसे सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके हमारे लिये उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्‌ का अवतार जीवों के परम कल्याण और उनकी भगवत्प्रेममयी समृद्धि के लिये ही होता है ॥ १३ ॥ यह जीव जन्म-मृत्यु के घोर चक्र में पड़ा हुआ है—इस स्थिति में भी यदि वह कभी भगवान्‌ के मङ्गलमय नाम का उच्चारण कर ले तो उसी क्षण उससे मुक्त हो जाय; क्योंकि स्वयं भय भी भगवान्‌ से डरता रहता है ॥ १४ ॥ सूतजी ! परम विरक्त और परम शान्त मुनिजन भगवान्‌ के श्रीचरणों की शरण में ही रहते हैं, अतएव उनके स्पर्श मात्र से संसार के जीव तुरन्त पवित्र हो जाते हैं। इधर गङ्गाजी के जल का बहुत दिनों- तक सेवन किया जाय, तब कहीं पवित्रता प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ ऐसे पुण्यात्मा भक्त जिनकी लीलाओं का गान करते रहते हैं, उन भगवान्‌ का कलिमलहारी पवित्र यश भला आत्मशुद्धि की इच्छा- वाला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो श्रवण न करे ॥ १६ ॥ वे लीला से ही अवतार धारण करते हैं। नारदादि महात्माओं ने उनके उदार कर्मों का गान किया है। हम श्रद्धालुओं के प्रति आप उनका वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥🛐 क्रमशः ......
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण07 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराणम्।। 🚩प्रथमः स्कन्धः_ _अथ प्रथमोऽध्यायः 🚩 ⁉️श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्न ⁉️ 📕 कथा प्रारम्भ। 📕 🍀( श्लोक संख्या 1 से 3 मंगलाचरण के हैं जो पूर्व में भेजा जा चुका हैं ) 🍀 ( दिए हुए संस्कृत श्लोक के नीचें हिंदी अर्थ लिखा हुआ हैं 👇) *नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः।* *सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत॥४॥* *त एकदा तु मुनयः प्रातर्हुतहुताग्नयः।* *सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात्॥५॥* _*ऋषय ऊचुः।*_ *त्वया खलु पुराणानि सेतिहासानि चानघ।* *आख्यातान्यप्यधीतानि धर्मशास्त्राणि यान्युत॥६॥* *यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः।* *अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥७॥* *वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।* *ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥८॥* *तत्र तत्राञ्जसायुष्मन् भवता यद्विनिश्चितम् ।* *पुंसामेकान्ततः श्रेयस्तन्नः शंसितुमर्हसि ॥९॥* ✍️एक बार भगवान्‌ विष्णु एवं देवताओं के परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों ने भगवत्-प्राप्ति की इच्छा से सहस्र वर्षों में पूरे होने वाले एक महान् यज्ञ का अनुष्ठान किया ॥ ४ ॥ एक दिन उन लोगों ने प्रात: काल अग्रिहोत्र आदि नित्यकृत्यों से निवृत्त होकर सूतजी का पूजन किया और उन्हें ऊँचे आसनपर बैठाकर बड़े आदर से यह प्रश्न किया ॥ ५ ॥ऋषियों ने कहा—सूतजी ! आप निष्पाप हैं। आपने समस्त इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रों का विधिपूर्वक अध्ययन किया है तथा उनकी भलीभाँति व्याख्या भी की है ॥ ६ ॥ वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ भगवान्‌ बादरायण ने एवं भगवान्‌ के सगुण-निर्गुण रूप को जानने वाले दूसरे मुनियों ने जो कुछ जाना है—उन्हें जिन विषयों का ज्ञान है, वह सब आप वास्तविक रूप में जानते हैं। आपका हृदय बड़ा ही सरल और शुद्ध है, इसी से आप उनकी कृपा और अनुग्रह के पात्र हुए हैं। गुरुजन अपने प्रेमी शिष्य को गुप्त-से-गुप्त बात भी बता दिया करते हैं ॥ ७-८ ॥ आयुष्मन् ! आप कृपा करके यह बतलाइये कि उन सब शास्त्रों, पुराणों और गुरुजनों के उपदेशों में कलियुगी जीवों के परम कल्याण का सहज साधन आपने क्या निश्चय किया है ॥ ९ ॥ ✍️ क्रमशः ........
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण06 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराण ।। ( महर्षि वेदव्यास और शुकदेवजी का ज्ञानवर्धक संवाद ) अब प्रश्न उठता है कि महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र शुकदेवजी को श्रीमद्भागवत महापुराण कब और कैसे सुनाया? और शुकदेवजी का जन्म कैसे हुआ था? ज्ञान, सदाचार और वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप शुकदेवजी महर्षि वेदव्यास के तपस्याजनित पुत्र हैं। संसार में किस प्रकार की संतान की सृष्टि करनी चाहिए, यह बताने के लिए ही व्यासजी ने घोर तप किया था वरना महाभारत की कथा साक्षी है कि उनकी दृष्टिमात्र से ही कई महापुरुषों का जन्म हुआ था। सुकदेवजी की जन्म-कथा और पिता-पुत्र के बीच हुआ वह अद्भुत संवाद आज भी मोहग्रस्त प्राणियों के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। *आइए, अब उसी दिव्य कथा को विस्तार से जानें—* महर्षि वेदव्यास जाबलि मुनि की कन्या वटिका से विवाह कर वन में आश्रम बनाकर रहने लगे । वृद्धावस्था में व्यासजी को पुत्र की इच्छा हुई। व्यासजी ने भगवान गौरी शंकर की विहारस्थली में घोर तपस्या की। भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर व्यासजी ने कहा–’भगवन् ! समाधि में जो आनन्द आप पाते हैं, उसी आनन्द को जगत को देने के लिए आप मेरे घर में पुत्र रूप में पधारिए। पृथ्वी, जल, वायु और आकाश की भांति धैर्यशाली तथा तेजस्वी पुत्र मुझे प्राप्त हो।’ व्यासजी की इच्छा भगवान शंकर ने स्वीकार कर ली। शिवकृपा से व्यासपत्नी वाटिकाजी गर्भवती हुईं। शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान उनका गर्भ बढ़ने लगा और गर्भ बढ़ते-बढ़ते बारह वर्ष बीत गए परन्तु प्रसव नहीं हुआ। व्यासजी की कुटिया में सदैव हरिचर्चा हुआ करती थी जिसे गर्भस्थ बालक सुनकर स्मरण कर लेता। इस तरह उस बालक ने गर्भ में ही वेद, स्मृति, पुराण और समस्त मुक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। वह गर्भस्थ शिशु बातचीत भी करता था । *महर्षि व्यास और गर्भस्थ शुकदेव संवाद!!!!!!* गर्भस्थ बालक के बहुत बढ़ जाने और प्रसव न होने से माता को बड़ी पीड़ा होने लगी। एक दिन व्यासजी ने आश्चर्यचकित होकर गर्भस्थ बालक से पूछा— *तू मेरी पत्नी की कोख में घुसा बैठा है, कौन है और बाहर क्यों नहीं आता है ? क्या गर्भिणी स्त्री की हत्या करना चाहता है ?* गर्भ ने उत्तर दिया —‘मैं राक्षस, पिशाच, देव, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बकरी सब कुछ बन सकता हूँ, क्योंकि मैं चौरासी हजार योनियों में भ्रमण करके आया हूँ; इसलिए मैं यह कैसे बतलाऊँ कि मैं कौन हूँ ? हां, इस समय मैं मनुष्य होकर गर्भ में आया हूँ । मैं इस गर्भ से बाहर नहीं निकलना चाहता क्योंकि इस दु:खपूर्ण संसार में सदा से भटकते हुए अब मैं भवबंधन से छूटने के लिए गर्भ में योगाभ्यास कर रहा हूँ। जब तक मनुष्य गर्भ में रहता है तब तक उसे ज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मों की स्मृति बनी रहती है। गर्भ से बाहर आते ही भगवान की माया के स्पर्श से ज्ञान और वैराग्य छिप जाते हैं; इसलिए मैं गर्भ में ही रहकर यहीं से सीधे मोक्ष की प्राप्ति करुंगा। व्यासजी ने कहा—‘तुम इस नरक रूप गर्भ से बाहर आ जाओ, नहीं तो तुम्हारी मां मर जाएगी। तुम पर वैष्णवी माया का असर नहीं होगा। मुझे अपना मुखकमल दिखला कर पितृऋण से मुक्त करो। गर्भ ने कहा—‘मुझ पर माया का असर नहीं होगा, इस बात के लिए यदि आप भगवान वासुदेव की जमानत दिला सकें तो मैं बाहर निकल सकता हूँ, अन्यथा नहीं।’ इस बहाने शुकदेवजी ने जन्म के समय ही भगवान श्रीकृष्ण को अपने पास बुला लिया । व्यासजी तुरन्त द्वारका गए और भगवान वासुदेव को अपनी कहानी सुनाई। भक्ताधीन भगवान जमानत देने के लिए तुरन्त व्यासजी के साथ चल दिए और आश्रम में आकर गर्भस्थ बालक से बोले—‘हे बालक ! गर्भ से बाहर निकलने पर मैं तुझे माया-मोह से दूर करने की जिम्मेदारी लेता हूँ, अब तू शीघ्र बाहर आ जा।’ भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर बालक गर्भ से बाहर आकर भगवान व माता-पिता को प्रणाम कर वन की ओर चल दिया। प्रसव होने पर बालक बारह वर्ष का जवान दिखायी पड़ता था। उसके श्यामवर्ण के सुगठित, सुकुमार व सुन्दर शरीर को देखकर व्यासजी मोहित हो गए। पुत्र को वन जाते देखकर व्यासजी ने कहा—‘पुत्र घर में रह जिससे मैं तेरा जात-कर्मादि संस्कार कर सकूँ।’ बालक ने उत्तर दिया—‘अनेक जन्मों में मेरे हजारों संस्कार हो चुके हैं, इसी से मैं संसार-सागर में पड़ा हुआ हूँ।’ भगवान ने व्यासजी से कहा—‘आपका पुत्र शुक की तरह मधुर बोल रहा है इसलिए पुत्र का नाम ‘शुक’ रखिये। यह मोह-मायारहित शुक आपके घर में नहीं रहेगा, इसे इसकी इच्छानुसार जाने दीजिए। इससे मोह न बढ़ाइए । पुत्रमुख देखते ही आप पितृऋण से मुक्त हो गये हैं।’ ऐसा कहकर भगवान द्वारका चले गए। इसके बाद व्यासजी और शुकदेवजी में बहुत ही ज्ञानवर्धक संवाद हुआ जो मोहग्रस्त सांसारिक प्राणी को कल्याण का मार्ग दिखाने वाला है— *व्यासजी* —‘जो पुत्र पिता के वचनों के अनुसार नहीं चलता है, वह नरकगामी होता है। *शुकदेवजी* —‘आज मैं जैसे आपसे उत्पन्न हुआ हूँ, उसी प्रकार दूसरे जन्मों में आप कभी मुझसे उत्पन्न हो चुके हैं। पिता-पुत्र का नाता यों ही बदला करता है। *व्यासजी* —‘संस्कार किए हुए मनुष्य ही पहले ब्रह्मचारी, फिर गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यासी होकर मुक्ति पाते हैं। । *शुकदेवजी* —‘यदि केवल ब्रह्मचर्य से ही मुक्ति होती तो सारे नपुंसक मुक्त हो जाते । गृहस्थ में मुक्ति होती तो सारा संसार ही मुक्त हो जाता । वानप्रस्थियों की मुक्ति होती तो सब पशु क्यों नहीं मुक्त हो जाते ? और यदि धन के त्यागने से ही मुक्ति होती है तो सारे दरिद्रों की सबसे पहले मुक्ति होनी चाहिए थी। *व्यासजी* —‘वनवास में मनुष्यों को बड़ा कष्ट होता है, वहां सारे देव-पितृ कर्म हो नहीं पाते हैं; इसलिए घर में रहना ही अच्छा है। । *शुकदेवजी* —‘वनवासी मुनियों को समस्त तपों का फल अपने-आप ही मिल जाता है, उनको बुरा संग तो कभी होता ही नहीं है। । *व्यासजी* —‘यमराज के यहां एक ‘पुत्’ नामक घोर नरक है। पुत्रहीन मनुष्य को उसी नरक में जाना पड़ता है; इसलिए संसार में पुत्र होना आवश्यक ह। *शुकदेवजी* —‘यदि पुत्र से ही सबको मुक्ति मिलती हो तो कुत्ते, सुअर, कीट-पतंगों की मुक्ति अवश्य हो जानी चाहिए। *व्यासजी* —‘इस लोक में पुत्र से पितृऋण, पौत्र देखने से देवऋण, और प्रपौत्र के दर्शन से मनुष्य समस्त ऋणों से मुक्त हो जाता है। । *शुकदेवजी* —‘गीध की तो बहुत बड़ी आयु होती है । वह तो न मालूम कितने पुत्र-पौत्र-प्रपौत्र का मुख देखता है, परन्तु उसकी मुक्ति तो नहीं होती है। श्री शुकदेवजी समस्त जगत को अपना ही स्वरूप समझते थे, अत: उनकी ओर से वृक्षों ने व्यासजी को बोध दिया–’महाराज ! आप ज्ञानी हैं और पुत्र के पीछे पड़े हैं। कौन किसका पिता और कौन किसका पुत्र ? वासना पिता बनाती है और वासना ही पुत्र बनाती है। जीव का ईश्वर के साथ सम्बन्ध ही सच्चा है। पिताजी मेरे पीछे नहीं, परमात्मा के पीछे पड़िए। शुकदेवजी वृक्षों द्वारा ऐसा ज्ञान देकर वन में चले गए। वे समाधि में लीन होकर निर्गुण ब्रह्म का अनुभव करने लगे। पिता महर्षि वेदव्यास पुत्र-वियोग से अत्यन्त दुःखी हुए। वे बार-बार पुत्र को याद करते और उनका नाम लेकर पुकारते—“हे शुक! हे शुक!” परन्तु शुकदेवजी माया-मोह से सर्वथा मुक्त थे, अतः लौटकर नहीं आए। इस बीच महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना पूर्ण की, परन्तु उनके मन में एक प्रकार की अपूर्णता और अशान्ति बनी रही। देवर्षि नारदजी ने आकर व्यासजी को समझाया कि केवल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन पर्याप्त नहीं है। भगवत्-भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किए बिना हृदय तृप्त नहीं होता। नारदजी के उपदेश से प्रेरित होकर व्यासजी ने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की—वह परम रसपूर्ण, भगवत्-लीलाओं से ओत-प्रोत, अठारह हजार श्लोकों वाला दिव्य ग्रन्थ। अब व्यासजी की तीव्र इच्छा हुई कि यह अमृत-स्वरूप भागवत उनके पुत्र शुकदेवजी को अवश्य सुनाया जाए। परन्तु शुकदेवजी तो वन में समाधिस्थ थे। व्यासजी ने एक युक्ति निकाली। उन्होंने भागवत के कुछ अत्यन्त मधुर श्लोक—विशेषकर श्रीकृष्ण की गोपाल-लीला, वंशी-नाद और गोचारण से लौटते समय के वर्णन वाले श्लोक—अपने शिष्यों को सिखा दिए। वे शिष्य प्रतिदिन वन में समिधा (लकड़ियाँ) लाने जाते और उन श्लोकों को गाते हुए निकलते। एक दिन वे शिष्य शुकदेवजी के समीप से गुजरे और वे दिव्य श्लोक उच्चारण करने लगे— *अहो बकी यं स्तनकालकूटं ....* ( श्रीकृष्ण की बाल-लीला का वर्णन ) अथवा वन से लौटते हुए श्रीकृष्ण का वह रूप—मयूर-मुकुट, वंशी अधरों पर, गोप-मित्रों के साथ, गो-धूलि से सुशोभित.”शुकदेवजी उस समय निर्गुण ब्रह्म की निर्विकल्प समाधि में लीन थे। परन्तु भगवत्-लीला के उन मधुर वर्णनों ने उनकी समाधि को भंग कर दिया। रूप-माधुरी और लीला-रस का आकर्षण इतना प्रबल था कि निर्गुण में स्थित होकर भी उनका चित्त कृष्ण- लीला की ओर खिंच गया। उन्होंने शिष्यों से पूछा—“ये श्लोक कहाँ से आए? इन्हें किसने रचा है?” शिष्यों ने बताया—“यह आपके पिता महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत के श्लोक हैं।श्रीकृष्ण-लीला के अद्भुत आकर्षण से बँध कर शुकदेवजी तुरन्त अपने पिता के आश्रम की ओर दौड़े। व्यासजी ने पुत्र को लौटा देखकर अपार आनन्द का अनुभव किया। उन्होंने शुकदेवजी को सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण का विधिवत् अध्ययन कराया। शुकदेवजी ने पिता से यह दिव्य कथा सुनी और उसे पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया।बाद में जब राजा परीक्षित को तक्षक के दंश से सात दिन में मृत्यु का शाप मिला और वे गंगा तट पर उपवास करके बैठ गए, तब शुकदेवजी वहाँ पहुँचे और सात दिनों में सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई। उसी कथा के प्रभाव से परीक्षित महाराज भगवद्धाम को प्राप्त हुए। इस प्रकार महर्षि वेदव्यास ने पहले पुत्र को जन्म दिया, फिर उसे वैराग्य और ज्ञान का उपदेश दिया, और अन्त में भगवत्-प्रेम का परम रस—श्रीमद्भागवत—सुनाकर उसे जगत का सबसे बड़ा भागवताचार्य बना दिया। यही है वह ज्ञानवर्धक परम्परा जो आज भी मोहग्रस्त जीवों को कल्याण का मार्ग दिखा रही है। 🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण05 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराण ।। ‼️कल के पोस्ट में हम सभी ने महर्षि वेदव्यास और शुकदेवजी के ज्ञानवर्धक संवाद तथा श्रीमद्भागवतमहापुराण की दिव्य उत्पत्ति की कथा पढ़ी। उस कथा से यह स्पष्ट हुआ कि केवल ज्ञान, वैराग्य या कर्मकांड पर्याप्त नहीं हैं—भगवत्-प्रेम और भगवान की लीलाओं का रस ही हृदय को पूर्ण तृप्ति देता है।‼️ ⁉️*अब प्रश्न उठता है कि—* _*हमसभी को श्रीमद्भागवत महापुराण क्यों पढ़नी चाहिए?*⁉️ 👩‍❤️‍👩बहुत से लोग यह मानते हैं कि धर्मग्रंथ केवल वृद्धावस्था में समय काटने के लिए होते हैं। वे भी श्रीमद्भागवतमहापुराण जैसे दिव्य ग्रंथ को दूर रखते हैं। परंतु सत्य बिल्कुल विपरीत है—श्रीमद्भागवत हर मनुष्य का पथप्रदर्शक ग्रंथ है और जीवन के हर चरण में मार्गदर्शन देने वाला अमृत है। यह ग्रंथ जीवन की गहन कहानी है। इसमें जीवन-प्रबंधन के गूढ़ सूत्र छिपे हैं जो प्रत्येक मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। महर्षि वेदव्यास ने इसकी रचना करते समय समस्त मानव जाति को केंद्र में रखा। इसीलिए इस पूरे ग्रंथ के दो मुख्य सूत्रधार भी मनुष्य ही हैं:-👩‍❤️‍👩 🚩- राजा परीक्षित, जिन्होंने यह कथा सुनी, और महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेवजी, जिन्होंने यह कथा सुनाई।🚩 📕श्रीमद्भागवत को पढ़ने से यह संदेश मिलता है कि यदि मनुष्य अपने लक्ष्य को सही समय पर पहचान ले, तो वह कम समय में महान सफलता प्राप्त कर सकता है और जीवन के सारे सुखों का अनुभव भी कर सकता है। *आज जब मन में अशांति हो, सही रास्ता न सूझ रहा हो या जीवन के सामान्य डर घेर रहे हों, तब श्रीमद्भागवत का पाठ और उसमें छिपे सूत्रों का चिंतन अद्भुत परिवर्तन लाता है। इससे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित होती है, जो जीवन को पूर्णतया बदल देती है।* 📕 🙏इसीलिए श्रीमद्भागवत सभी को क्यों पढ़नी चाहिए, यह स्पष्ट हो जाता है ऊपर लिखी हुई बातों से और ये भी कह सकते हैं कि *युवा* - कैसे रहे ये जानने के लिए ? *वृद्ध* - कैसे मरे ये जानने के लिए ? *अज्ञानी* - ज्ञान के लिए। *सीखा हुआ* - विनम्रता के लिए। *अमीर* - करुणा के लिए।*गरीब* - आराम के लिए। *स्वप्नहार* - आकर्षण के लिए। *व्यावहारिक* - वकील के लिए। *कमजोर* - शक्ति के लिए। *मजबूत* - दिशा के लिए। *अभिमानी* - चेतावनी के लिए। *विनम्र* - उदात्त के लिए। *परेशान* - शांति के लिए। *थके हुए* - आराम के लिए। *संदेह* - आश्वासन के लिए। *पापी* - मुक्ति के लिए। *मानव* - मार्गदर्शन के लिए।🙏 🚩कहां भी गया है -🚩 *मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।* *सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥* 🌍जल में प्रतिदिन किया हुआ स्नान मनुष्य के केवल शारीरिक मल का ही नाश करता है। परंतु यदि कोई श्रीमद्भागवतमहापुराण रूपी दिव्य जल में एक बार भी स्नान कर ले, तो उसके संसार रूपी मल का पूर्ण नाश हो जाता है।🌍 👩‍❤️‍👩प्रत्येक जीव, प्रत्येक आत्मा इस संसार में अज्ञानता और अपने कर्मों के कारण जन्म-मरण के चक्र में फँसा हुआ है। उसे न चाहते हुए भी बार-बार जन्म लेना पड़ता है, मरना पड़ता है, वृद्धावस्था को प्राप्त करना पड़ता है और व्याधि-रोगों को सहना पड़ता है। जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि का यह बारंबार चलने वाला चक्र ही *संसार-मल कहलाता है।* 👩‍❤️‍👩 🛐बस आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रीमद्भागवत को आज के संदर्भ में समझें और इसके दिव्य संदेश को जन-जन तक पहुँचाएँ।इसलिए हे सभी मनुष्यो! श्रीमद्भागवतमहापुराण अवश्य पढ़ें। यह केवल कथा नहीं, जीवन को सफल, शांत और दिव्य बनाने का सनातन मार्ग है।🛐 🍀*नोट -* प्रभु की असीम कृपा से श्रीमद्भागवतमहापुराण का शुभारंभ हो चुका है। मंगलाचरण का दिव्य पाठ आप सभी तक पहले ही पहुँचा दिया गया है। अब कल से हम सभी मिलकर प्रथम स्कन्ध के प्रथम अध्याय का पावन अध्ययन आरंभ करेंगे। आइए, इस दिव्य यात्रा में सम्मिलित हों और भगवान की लीलाओं के अमृत का रसास्वादन करें।🍀 🙏 जय श्रीकृष्ण 🙏
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###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागवत्_महापुराण04 ।। श्रीमद्भागवतमहापुराण ।। 🧘( महर्षि वेदव्यास और शुकदेव जी का ज्ञानवर्धक संवाद ) 🧘 ( भाग - 1 ) ⁉️अब प्रश्न उठता है कि महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र शुकदेवजी को श्रीमद्भागवत महापुराण कब और कैसे सुनाया? और शुकदेव जी का जन्म कैसे हुआ था?⁉️ 🛐ज्ञान, सदाचार और वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप शुकदेवजी महर्षि वेदव्यास के तपस्याजनित पुत्र हैं। संसार में किस प्रकार की संतान की सृष्टि करनी चाहिए, यह बताने के लिए ही व्यासजी ने घोर तप किया था वरना महाभारत की कथा साक्षी है कि उनकी दृष्टिमात्र से ही कई महापुरुषों का जन्म हुआ था। सुकदेवजी की जन्म- कथा और पिता-पुत्र के बीच हुआ वह अद्भुत संवाद आज भी मोहग्रस्त प्राणियों के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।🛐 ‼️*आइए, अब उसी दिव्य कथा को विस्तार से जानें—* ‼️ 🧘महर्षि वेदव्यास जाबलि मुनि की कन्या वटिका से विवाह कर वन में आश्रम बनाकर रहने लगे । वृद्धावस्था में व्यासजी को पुत्र की इच्छा हुई। व्यासजी ने भगवान गौरी शंकर की विहारस्थली में घोर तपस्या की। भगवान शंकर के प्रसन्न होने पर व्यासजी ने कहा–’भगवन् ! समाधि में जो आनन्द आप पाते हैं, उसी आनन्द को जगत को देने के लिए आप मेरे घर में पुत्र रूप में पधारिए। पृथ्वी, जल, वायु और आकाश की भांति धैर्यशाली तथा तेजस्वी पुत्र मुझे प्राप्त हो।’ व्यासजी की इच्छा भगवान शंकर ने स्वीकार कर ली। शिवकृपा से व्यास पत्नी वाटिका जी गर्भवती हुईं। शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान उनका गर्भ बढ़ने लगा और गर्भ बढ़ते-बढ़ते बारह वर्ष बीत गए परन्तु प्रसव नहीं हुआ। व्यासजी की कुटिया में सदैव हरिचर्चा हुआ करती थी जिसे गर्भस्थ बालक सुनकर स्मरण कर लेता। इस तरह उस बालक ने गर्भ में ही वेद, स्मृति, पुराण और समस्त मुक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। वह गर्भस्थ शिशु बातचीत भी करता था ।🧘 ‼️*महर्षि व्यास और गर्भस्थ शुकदेव संवाद!!!!!!* ‼️ 🤹गर्भस्थ बालक के बहुत बढ़ जाने और प्रसव न होने से माता को बड़ी पीड़ा होने लगी। एक दिन व्यासजी ने आश्चर्यचकित होकर गर्भस्थ बालक से पूछा— *तू मेरी पत्नी की कोख में घुसा बैठा है, कौन है और बाहर क्यों नहीं आता है ? क्या गर्भिणी स्त्री की हत्या करना चाहता है ?* 🤹 👩‍❤️‍👩गर्भ ने उत्तर दिया —‘मैं राक्षस, पिशाच, देव, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बकरी सब कुछ बन सकता हूँ, क्योंकि मैं चौरासी हजार योनियों में भ्रमण करके आया हूँ; इसलिए मैं यह कैसे बतलाऊँ कि मैं कौन हूँ ? हां, इस समय मैं मनुष्य होकर गर्भ में आया हूँ । मैं इस गर्भ से बाहर नहीं निकलना चाहता क्योंकि इस दु:खपूर्ण संसार में सदा से भटकते हुए अब मैं भव बंधन से छूटने के लिए गर्भ में योगाभ्यास कर रहा हूँ। जब तक मनुष्य गर्भ में रहता है तब तक उसे ज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मों की स्मृति बनी रहती है। गर्भ से बाहर आते ही भगवान की माया के स्पर्श से ज्ञान और वैराग्य छिप जाते हैं; इसलिए मैं गर्भ में ही रहकर यहीं से सीधे मोक्ष की प्राप्ति करुंगा।👩‍❤️‍👩 🧘व्यासजी ने कहा—‘तुम इस नरक रूप गर्भ से बाहर आ जाओ, नहीं तो तुम्हारी मां मर जाएगी। तुम पर वैष्णवी माया का असर नहीं होगा। मुझे अपना मुखकमल दिखला कर पितृऋण से मुक्त करो।🧘 👩‍❤️‍👩गर्भ ने कहा—‘मुझ पर माया का असर नहीं होगा, इस बात के लिए यदि आप भगवान वासुदेव की जमानत दिला सकें तो मैं बाहर निकल सकता हूँ, अन्यथा नहीं।’ इस बहाने शुकदेवजी ने जन्म के समय ही भगवान श्रीकृष्ण को अपने पास बुला लिया । व्यासजी तुरन्त द्वारका गए और भगवान वासुदेव को अपनी कहानी सुनाई। भक्ताधीन भगवान जमानत देने के लिए तुरन्त व्यासजी के साथ चल दिए और आश्रम में आकर गर्भस्थ बालक से बोले—‘हे बालक ! गर्भ से बाहर निकलने पर मैं तुझे माया-मोह से दूर करने की जिम्मेदारी लेता हूँ, अब तू शीघ्र बाहर आ जा।’👩‍❤️‍👩 🕉️भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर बालक गर्भ से बाहर आकर भगवान व माता-पिता को प्रणाम कर वन की ओर चल दिया। प्रसव होने पर बालक बारह वर्ष का जवान दिखायी पड़ता था। उसके श्यामवर्ण के सुगठित, सुकुमार व सुन्दर शरीर को देखकर व्यासजी मोहित हो गए। पुत्र को वन जाते देखकर व्यासजी ने कहा—‘पुत्र घर में रह , जिससे मैं तेरा जात-कर्मादि संस्कार कर सकूँ।’🕉️ 🤹बालक ने उत्तर दिया—‘अनेक जन्मों में मेरे हजारों संस्कार हो चुके हैं, इसी से मैं संसार-सागर में पड़ा हुआ हूँ।’🤹 🕉️भगवान ने व्यासजी से कहा—‘आपका पुत्र शुक की तरह मधुर बोल रहा है इसलिए पुत्र का नाम ‘शुक’ रखिये। यह मोह- मायारहित शुक आपके घर में नहीं रहेगा, इसे इसकी इच्छानुसार जाने दीजिए। इससे मोह न बढ़ाइए । पुत्रमुख देखते ही आप पितृऋण से मुक्त हो गये हैं।’ ऐसा कहकर भगवान द्वारका चले गए।🕉️ क्रमशः .......
sn vyas
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7 days ago
###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 ‼️।। श्रीमद्भागवत महापुराण ।।‼️ 🛐श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का शुभारम्भ कर दिया गया है। मंगलाचरण भेज दिया गया है। अब कथा आरम्भ करने से पहले संक्षेप में यह जान लेना आवश्यक है कि श्रीमद्भागवत महापुराण क्या है और इसकी पृष्ठभूमि क्या है ? 🛐 📕श्रीमद्भागवत महापुराण अठारह महापुराणों में सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र ग्रंथ है। इसे भगवान श्रीकृष्ण का वाङ्मय स्वरूप कहा गया है। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और भगवान की दिव्य लीलाओं का अत्यंत मधुर वर्णन है।📕 🧘 रचयिता और परंपरा 🧘 ✍️इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं। वेदव्यास को श्रीमद्भागवत की रचना क्यों करनी पड़ी? महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया, महाभारत ( जिसमें भगवद्गीता भी है ), ब्रह्मसूत्र और अन्य पुराणों की रचना की। इतना विशाल कार्य करने के बाद भी उनका मन संतुष्ट नहीं हुआ। वे खिन्न और अधूरे महसूस कर रहे थे। इसी समय उनके गुरु देवर्षि नारद उनके पास आए। नारदजी ने पूछा — “आप इतने बड़े-बड़े ग्रंथ लिखने के बाद भी उदास क्यों हैं?” ✍️ 🛐वेदव्यास ने अपनी बेचैनी बताई। तब नारदजी ने कारण स्पष्ट किया -“आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का तो वर्णन किया है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के निर्मल यश, गुण और लीलाओं का पर्याप्त गान नहीं किया। शुद्ध भक्ति का पूर्ण वर्णन नहीं किया। इसलिए आपका हृदय संतुष्ट नहीं हो रहा।”नारदजी ने आगे कहा कि केवल कर्मकांड, ज्ञान या मोक्ष की चर्चा से हृदय पूर्ण नहीं होता। भगवान की भक्ति और उनकी लीलाओं का श्रवण -कीर्तन ही जीव को सच्ची शांति और आनंद देता है।🛐 🙏नारदजी के उपदेश के बाद वेदव्यासजी ने गहन समाधि लगाई। समाधि में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण और माया का दर्शन हुआ। उन्होंने देखा कि जीव माया के बंधन में दुखी हैं और भक्ति ही उनका एकमात्र उपाय है। इसी प्रेरणा से उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की। रचना करने के उपरांत उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका पूर्ण ज्ञान दिया। 🙏 🤹महाराज परीक्षित को जब सर्प-दंश से सात दिन में मृत्यु का शाप मिला, तब उन्होंने पूछा — “मृत्यु के समीप बैठे मनुष्य का परम कर्तव्य क्या है?” इसी प्रश्न के उत्तर में शुकदेवजी ने उन्हें सात दिनों तक श्रीमद्भागवत सुनाई। बाद में सूतजी ( उग्रश्रवा, रोमहर्षण के पुत्र ) ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों के सत्संग में यह सम्पूर्ण भागवत सुनाई।सूतजी का वास्तविक नाम उग्रश्रवा है। वे रोमहर्षण के पुत्र थे। वे पुराणों के अत्यंत विद्वान कथावाचक थे और महर्षि वेदव्यास की शिष्य- परंपरा से जुड़े हुए थे। उन्होंने स्वयं शुकदेवजी से श्रीमद्भागवत सुनी थी ( जब शुकदेवजी परीक्षित को सुना रहे थे )।🤹 ⁉️*अब प्रश्न यहां पे ये उठता हैं कि सूतजी ने शौनकादि ऋषियों को भागवत क्यों सुनाई?* ⁉️ 🌍कलियुग के आरंभ में शौनक आदि लगभग अठासी हजार ऋषि नैमिषारण्य में एक बहुत बड़ा यज्ञ ( सहस्र वर्ष का सत्र ) कर रहे थे। वे ऋषि कलियुग के दुष्प्रभावों से बहुत चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि अब लोगों की आयु कम हो जाएगी, बुद्धि मंद हो जाएगी और धर्म का पालन कठिन हो जाएगा। इसलिए उन्होंने सूतजी से पूछा :- - मनुष्य का परम कल्याण क्या है?- सभी शास्त्रों का सार क्या है?- भगवान श्रीकृष्ण क्यों अवतार लेते हैं और उनकी लीलाएँ क्या हैं?- भगवान श्रीकृष्ण के धाम जाने के बाद धर्म का आश्रय अब कहाँ है?🌍 ✍️इन प्रश्नों के उत्तर में सूतजी ने उन्हें वही श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाई, जो शुकदेवजी ने महाराज परीक्षित को सुनाई थी। आज हमें जो भागवत प्राप्त है, वह उसी परंपरा से आई है। इसमें कुल 12 स्कन्ध, 335 अध्याय और लगभग 18000 श्लोक हैं। *कहां गया हैं कि जब किसी का सौभाग्य सर्वोच्च शिखर पर होता है तब उसे श्रीमद्भागवतमहापुराण कहने, सुनने और पढ़ने को मिलता है।* हमारे भीतर जो रहस्य भरा हुआ है उसको उजागर करने के लिए भागवत एक अध्यात्म दीप है जैसे हम भोजन करते हैं तो हमको संतुष्टि मिलती है। उसी प्रकार भागवत मन का भोजन है। जब मन को ऐसा शुद्ध भोजन मिलेगा तो मन संतुष्ट होगा, पुष्ट होगा और तृप्त होगा और जिसका मन तृप्त है उसके जीवन में शांति है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रीमद् भागवत को आज के संदर्भ में समझें और जन-जन को इसके संदेश से परिचित कराएं।✍️ जय श्री कृष्ण🙏
sn vyas
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8 days ago
###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873 #2026श्रीमद्भागत्_महापुराण02 श्रीमद्भागवतमहापुराण प्रथम स्कन्ध पहला अध्याय ( पोस्ट - 02 ) ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्र गत पोस्ट से आगे .... मङ्गलाचरण धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां। वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्‍भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः। सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिः तत् क्षणात्॥ २ ॥ महामुनि व्यासदेव के द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवतमहापुराण में मोक्ष पर्यन्त फल की कामना से रहित परम धर्म का निरूपण हुआ है। इसमें शुद्धान्त:करण सत्पुरुषों के जानने योग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है, जो तीनों तापों का जड़ से नाश करने वाली और परम कल्याण देने वाली है । अब और किसी साधन या शास्त्र से क्या प्रयोजन । जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदय में आकर बन्दी बन जाता है ॥ २ ॥ निगमकल्पतरोर्गलितं फलं।शुकमुखाद् अमृतद्रवसंयुतम्।पिबत भागवतं रसमालयं।मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३ ॥ रस के मर्मज्ञ भक्तजन ! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है। श्री शुकदेवरूप तोते के मुख का सम्बन्ध हो जाने से यह परमानन्दमयी सुधा से परिपूर्ण हो गया है। इस फल में छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है। यह मूर्तिमान् रस है। जब तक शरीर में चेतना रहे, तब तक इस दिव्य भगवद्-रस का निरन्तर बार-बार पान करते रहो। यह पृथ्वी पर ही सुलभ है॥ *यह प्रसिद्ध है कि तोते का काटा हुआ फल अधिक मीठा होता है। 🙏हरिः ॐ तत्सत् 🙏🙌🙇 क्रमशः .....
sn vyas
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9 days ago
#@श्रीमद्भागत्_महापुराण01 📕श्रीमद्भागवतमहापुराण कथा का शुभारम्भ 📢।।*_ 📕 ( दुख से मुक्ति का मार्ग ) 🛐भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा से *आज से श्रीमद्भागवत महापुराण की दिव्य कथा का पवित्र आरम्भ होने जा रहा हैं।* व्हाट्सएप्प पर चलने वाला विश्वविख्यात अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक समूह *आध्यात्मिक ज्ञान*को आज ही ज्वाइन करे। जो लोग दुख, क्लेश, पीड़ा, अनहोनी, दरिद्रता जैसे दु:खज्वर की ज्वाला से दग्ध हो रहे हैं, जिन्हें माया-पिशाची ने रौंद डाला है तथा जो संसार-समुद्र में डूब रहे हैं, उनका कल्याण करने के लिये *श्रीमद्भागवतमहापुराण* सिंहनाद कर रहा है।🛐 👩‍❤️‍👩आइए, इस दिव्य अवसर का लाभ उठाएँ। जो पहले से समूह में हैं, वे बने रहें और अपने परिचितों को भी जोड़ें ( खासकर अपने बच्चों को अवश्य जोड़ें )। कृपया अपने मित्रों, परिचितों और रिश्तेदारों को इस समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित करें, ताकि वे भी इस अमृत वाणी का लाभ उठा सकें। इस पोस्ट को यथावत शेयर करते रहें और उन्हें नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके समूह से जुड़ने के लिए कहें। ************************** 📕श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध*_ 📕 _पहला अध्याय ( पोस्ट - 01 )_ ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। ⁉️श्रीसूतजी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्र ⁉️ 🪴*मङ्गलाचरण* 🪴 _जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्।_ _तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः।_ _तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा।_ _धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि । १ ॥_ ✍️जिससे इस जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं—क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से पृथक् है; जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वयं प्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं प्रत्युत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेद ज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान-सत्ता से सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णत: मुक्त रहने वाले परम सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं ॥ १ ॥✍️ 🙏हरिः ॐ तत्सत्🙏 *क्रमशः ......* ###श्रीमद्भागवत् महापुराण@sn7873
sn vyas
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28 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/६ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚 🔥 (बुद्धि कर्मानुसारिणी)🔥 *न निर्मित: केन न दृष्टपूर्वं* *न श्रूयते हेम मय कुरंग:।* *तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *सोने का मृग ब्रह्मा की सृष्टि में किसी जगह निर्माण हुआ, किसी ने देखा भी नहीं और सुना भी नहीं । फिर भी उस में भगवान राम को तृष्णा जगी,,, इसलिए कि मारीच रावण और तमाम राक्षसों के विनाश के लिए भगवान राम को ऐसी बुद्धि सूझी।* *केवो हतो रावण तत्व बेत्ता* *नवे ग्रहों निकट मां रहेता।* *हरी सीता कष्ट लह्युं कुबुद्धि* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *(अर्थात् ) -- कैसा था रावण तत्व बेत्ता,, नौ ग्रह उसके निकट रहते थे ,,, सीता का हरण करके कुबुद्धि से कष्ट मोल ले लिया ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि ।* *रावण महान ज्ञानी था ,, तमाम वेदों में वह पारंगत था,, भगवान शंकर का परम भक्त था ,, पुलस्त्य कुल का पवित्र ब्राह्मण था ,, महा शक्तिशाली था,, नौ ग्रह उसकी सेवा में रहते थे । वायु देवता उसके महल में झाड़ू लगाते थे । वरुण देवता उसके महल में पानी भरते थे । ऐसा ज्ञानी और शक्तिशाली राजा होने पर भी उसकी बुद्धि विपरीत हो गई । प्रारब्ध वश होकर उसकी बुद्धि सीता के हरण में नियुक्त हुई ।* *कैसे थे कौरव काल ज्ञानी,, द्वेष के साथ क्रोध से ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि। कौरव मूर्ख नहीं थे ,, गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य थे ,,, युधिष्ठिर-- अर्जुन के साथ पढ़ते थे ,,, धर्म माने क्या ? और अधर्म माने क्या ? उसकी उनको अक्ल थी ,,, खुद दुर्योधन ने महाभारत में कबूल किया है कि ---* *जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:* *जानामि अधर्मंम् न च मे निवृत्ति:।* *केनापि देवेन ह्यदि स्थितेन* *यथा नियुक्तो अस्मि तथा करोमि॥* *धर्म और अधर्म का ज्ञान होने पर भी अंतःकरण में पड़ी हुई कामना और वासना प्रारब्ध भोगने के लिए बुद्धि को उल्टी विपरीत घुमा देती है।* क्रमश: आगे अब सातवां भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙